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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 30 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 30/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - विश्वे देवाः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायुप्राप्ति सूक्त
    212

    विश्वे॑ देवा॒ वस॑वो॒ रक्ष॑ते॒ममु॒तादि॒त्या जा॑गृ॒त यू॒यम॒स्मिन्। मेमं सना॑भिरु॒त वान्यना॑भि॒र्मेमं प्राप॒त्पौरु॑षेयो व॒धो यः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    विश्वे॑ । दे॒वा॒: । वस॑व: । रक्ष॑त । इ॒मम् । उ॒त । आ॒दि॒त्या: । जा॒गृ॒त । यू॒यम् । अ॒स्मिन् । मा । इ॒मम् । सऽना॑भि: । उ॒त । वा॒ । अ॒न्यऽना॑भि: । मा । इ॒मम् । प्र । आ॒प॒त् । पौरु॑षेय: । व॒ध: । य: ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विश्वे देवा वसवो रक्षतेममुतादित्या जागृत यूयमस्मिन्। मेमं सनाभिरुत वान्यनाभिर्मेमं प्रापत्पौरुषेयो वधो यः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विश्वे । देवा: । वसव: । रक्षत । इमम् । उत । आदित्या: । जागृत । यूयम् । अस्मिन् । मा । इमम् । सऽनाभि: । उत । वा । अन्यऽनाभि: । मा । इमम् । प्र । आपत् । पौरुषेय: । वध: । य: ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 30; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    राजतिलक-यज्ञ के उपदेश।

    पदार्थ

    (वसवः) हे श्रेष्ठ (विश्वे) सब (देवाः) प्रकाशमान महात्माओ ! (इमम्) इस पुरुष की (रक्षत) रक्षा करो, (उत) और (आदित्याः) हे सूर्यसमान तेजवाले विद्वानो ! (यूयम्) तुम (अस्मिन्) इस राजा के विषय में (जागृत) जागते रहो। (सनाभिः) अपने बन्धु का, (उत वा) अथवा (अन्यनाभिः) अबन्धु का, अथवा (पौरुषेयः) किसी और पुरुष का किया हुआ, (यः) जो (वधः) वध का यत्न है [वह] (इमम्) इस (इमम्) इस पुरुष को (मा मा) कभी न (प्रापत्) पहुँच सके ॥१॥

    भावार्थ

    राजा अपने सुपरीक्षित न्याय, मन्त्री और युद्धमन्त्री आदि कर्मचारी शूरवीरों को राज्य की रक्षा के लिये सदा चेतन्य करता रहे कि कोई सजाती वा स्वदेशी वा विदेशी पुरुष प्रजा में अराजकता न फैलावे ॥१॥

    टिप्पणी

    १−देवाः। १।७।१। विजयिनः पुरुषाः। वसवः। १।९।१। निवासयितारः। प्रशस्ताः श्रेष्ठाः। रक्षत। पालयत। इमम्। माम् राजानम्। आदित्याः। १।९।१। विद्यादिशुभगुणानां रसस्य आदातारो ग्रहीतारः। अथवा आदित्यवत् तेजस्विनः महाविद्वांसः। जागृत। जागृ निद्राक्षये−लोट्। प्रबुद्धा रक्षार्थम् अवहिताः संनद्धा भवत। मा। निषेधे। स−नाभिः। नहो भश्च। उ० ४।१२६। इति णह बन्धने−कर्मणि इञ् समानस्य सः। समानेन स्वकीयेन संबद्धः। स्वजातिकृतो वधः। अन्य-नाभिः। अन्येन संबद्धः। अज्ञातिकृतो वधः प्र+आपत्। आप्लृ व्याप्तौ−लुङि। प्राप्नोतु। पौरुषेयः। सर्वपुरुषाभ्यां णढञौ। पा० ५।१।१०। इत्यत्र। पुरुषाद् वधविकारसमूहतेनकृतेषु। वार्तिकम्। इति पुरुष-ढञ्। पुरुषकृतः। वधः। १।२०।२। हननम्। हिंसनप्रयोगः ॥

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    विषय

    दीर्घ जीवन के लिए

    पदार्थ

    १. (विश्वेदेवाः) = सब प्राकृतिक शक्तियो! (बसवः) = निवास के कारणभूत तत्वो! (इमम्) = इस व्यक्ति का (रक्षत) = तुम रक्षण करो। सब प्राकृतिक शक्तियों की अनुकूलता में ही मनुष्य के स्वास्थ्य का रक्षण होता है। जल-वायु आदि को प्रतिकूलता ही स्वास्थ्य का विकृत करती है। २. इन प्राकृत शक्तियों के अतिरिक्त माता-पिता, आचार्य आदि की सावधानता भी बालक के उत्तम निर्माण में बड़ा महत्व रखती है, अत: मन्त्र में कहा है कि (उत) = और (आदित्या:) = हे गुणों का

    आदान करनेवाले पुरुषो। (यूयम्) = आप सब (अस्मिन्) = इसके विषय में (जागृत) = जागते रहो सावधान रहो। आपकी जागरूकता ही इसके जीवन को विकृत होने से बचाएगी। ३. राष्ट्रीय व्यवस्था भी इसप्रकार उत्तम हो कि (इमम्) = इस पुरुष को (स-नाभिः) = समान बन्धनवाला कोई रिश्तेदार (उत वा) = अथवा (अन्यनाभि:) = अबन्धु (मा) = नष्ट करनेवाला न हो। (इमम्) = इसे (यः पौरुषेयः वध:) = जो किसी पुरुष से प्राप्त होनेवाला वध है, वह (मा प्रापत्) = मत प्राप्त हो। कोई चोर-डाकू भी इसका हनन करनेवाला न हो।

    भावार्थ

    दीर्घ जीवन के लिए आवश्यक है कि [क] जल-वायु आदि देव अनुकूल हों, [ख] माता-पिता, आचार्य आदि जागरूक रहकर बालक का निर्माण करें, [ग] पारिवारिक व सामाजिक सम्बन्ध ठीक हों, [घ] राष्ट्रीय व्यवस्था उत्तम हो।

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    भाषार्थ

    (विश्वे देवाः) हे सब देवो! (वसवः) तथा वसुओ ! (इमम् ) इसकी (रक्षत) रक्षा करो, (उत) तथा (आदित्याः) हे आदित्यो! (यूयम्) तुम (अस्मिन्) इस आयुष्काम पुरुष के सम्बन्ध में (जागृत) जागरूक अर्थात् सावधान रहो। (इमम्) इसे (सनाभिः ) सम्बन्धी (उत वा) अथवा (अन्यनाभिः) असम्बन्धी, (य:) जोकि (पौरुषेयः) पुरुष द्वारा प्राप्त (वधः) वध है उसे (मा प्रापत् ) न गिराए, प्राप्त कराए।

    टिप्पणी

    [उपनयन कर्म में सूक्त का विनियोग हुआ है ( सायण )। वसु और आदित्य कोटि में गुरु विवक्षित है। रुद्रकोटि के गुरु भी अभिप्रेत हैं। इन सबको सम्बोधित कर ब्रह्मचारी का पिता ब्रह्मचर्याश्रम के निवासियों के प्रति ब्रह्मचारी को सुपुर्द कर इसकी रक्षा के लिये प्रार्थना करता है। सनाभि: =समानो नाभिः गर्भाशयो यस्यासौ सनाभि: (सायण), एक परिवार या कुल का सम्बन्धी। नाभिः= णह बन्धने (दिवादिः)। "पौरुषेयः वधः" द्वारा यह भी ब्रह्मचारी का पिता प्रार्थना करता है कि इस पर किसी भी पुरुष द्वारा की गई चोट न पहुंचे। ओषधीषु पशुषु अप्सु अन्तः देवाः= ओषधियों, पशुओं, जलों के मध्य में काम करनेवाले व्यवहारी अर्थात् व्यापारी लोग "दिवु क्रीडा विजिगीषा व्यवहार" आदि (दिवादिः)। ओषधियों के व्यवहारी हैं वन्य तथा कृषिजन्य पदार्थों के व्यापारी; पशुओं के व्यवहारी हैं पशुपालक तथा इनके क्रयविक्रय करनेवाले; अप्सु के व्यापारी हैं नौकाओं द्वारा व्यापार करनेवाले, व्यवहारी।]

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    भाषार्थ

    (विश्वे देवाः) हे सब देवो! (वसवः) तथा वसुओ ! (इमम् ) इसकी (रक्षत) रक्षा करो, (उत) तथा (आदित्याः) हे आदित्यो! (यूयम्) तुम (अस्मिन्) इस आयुष्काम पुरुष के सम्बन्ध में (जागृत) जागरूक अर्थात् सावधान रहो। (इमम्) इसे (सनाभिः ) सम्बन्धी (उत वा) अथवा (अन्यनाभिः) असम्बन्धी, (य:) जोकि (पौरुषेयः) पुरुष द्वारा प्राप्त (वधः) वध है उसे (मा प्रापत् ) न गिराए, प्राप्त कराए।

    टिप्पणी

    [उपनयन कर्म में सूक्त का विनियोग हुआ है ( सायण )। वसु और आदित्य कोटि में गुरु विवक्षित है। रुद्रकोटि के गुरु भी अभिप्रेत हैं। इन सबको सम्बोधित कर ब्रह्मचारी का पिता ब्रह्मचर्याश्रम के निवासियों के प्रति ब्रह्मचारी को सुपुर्द कर इसकी रक्षा के लिये प्रार्थना करता है। सनाभि: =समानो नाभिः गर्भाशयो यस्यासौ सनाभि: (सायण), एक परिवार या कुल का सम्बन्धी। नाभिः= णह बन्धने (दिवादिः)। "पौरुषेयः वधः" द्वारा यह भी ब्रह्मचारी का पिता प्रार्थना करता है कि इस पर किसी भी पुरुष द्वारा की गई चोट न पहुंचे।]

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    विषय

    प्रजा का राजा के प्रति कर्तव्य।

    भावार्थ

    हे ( विश्वदेवाः ) समस्त विद्वानो ! और हे ( वसवः ) राष्ट्र में बसने हारो ! आप लोंग ( इमम् ) इस राष्ट्र, एवं राष्ट्रपति की (रक्षत) उत्तम रूप से रक्षा करो । ( उत् ) और हे (आदित्याः) आदान प्रतिदान करने हारे, कर और शुल्क संग्रह करने वाले अध्यक्ष पुरुषो ! (यूयम्) तुम लोग (अस्मिन्) इस राष्ट्र में (जागृत) सदा सावधान, जागृत रहो, अथवा सूर्य के समान कभी आलस्य न करने हारे विद्वानो !

    टिप्पणी

    ( प्र०, द्वि०, तृ० ) ‘असपत्नः सपत्नहाभिराष्ट्रो विषासहिः । यथा हमेषां भूतानां’ इति ऋ० ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    आयुष्कामोऽथर्वा ऋषिः। विश्वेदेवाः देवताः। वस्वादिदेवस्तुतिः । १, २, ४ त्रिष्टुभः। ३ शाकरगर्भा विराड् जगती । चतुर्ऋचं सूक्तम् ।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Health and Full Age

    Meaning

    O Vishvedevas, divinities of nature, leading powers of humanity, O Vasus, sustainers of life, protect and promote this man, this leader, this ruler. O Adityas, brilliancies of nature and leading lights of humanity, keep awake and alert in this living system both individual and social. Let no danger or fatal weapon, human or natural, shot by our own people from within or by an alien power, reach and touch him. (The system at the individual level is the human being, and at the social level it is the socio-political organisation, and the person to be protected and promoted is the ruler.)

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    Subject

    Visve-devih-All Bounties of Nature

    Translation

    O Nature’s all bounties, O heavenly planets may you offer protection to this man. O months (the Adityas= months), may you or stars keep a watchful eye on him. May no one , whether related or unrelated, bring to him death caused by human weapons.

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    Translation

    O Ye enlightened persons of all ranks; and O Ye inhabitants of the country all of you guard and protect this ruler or man O' Ye Adityas; (master-minds) you always remain watchful in this nation. The enemy whether be from kinsmen or be from aliens may not have reach to him. The weapon aimed by the men may not come to him.

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    Translation

    O noble, saintly persons, guard and protect this man. Over him keep Ye Watch and ward, O brilliant scholars, let not death reach him from the hands of brothers, from hands of aliens, or of human beings.

    Footnote

    Him refers to the king. The hymn refers to the coronation of the king.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−देवाः। १।७।१। विजयिनः पुरुषाः। वसवः। १।९।१। निवासयितारः। प्रशस्ताः श्रेष्ठाः। रक्षत। पालयत। इमम्। माम् राजानम्। आदित्याः। १।९।१। विद्यादिशुभगुणानां रसस्य आदातारो ग्रहीतारः। अथवा आदित्यवत् तेजस्विनः महाविद्वांसः। जागृत। जागृ निद्राक्षये−लोट्। प्रबुद्धा रक्षार्थम् अवहिताः संनद्धा भवत। मा। निषेधे। स−नाभिः। नहो भश्च। उ० ४।१२६। इति णह बन्धने−कर्मणि इञ् समानस्य सः। समानेन स्वकीयेन संबद्धः। स्वजातिकृतो वधः। अन्य-नाभिः। अन्येन संबद्धः। अज्ञातिकृतो वधः प्र+आपत्। आप्लृ व्याप्तौ−लुङि। प्राप्नोतु। पौरुषेयः। सर्वपुरुषाभ्यां णढञौ। पा० ५।१।१०। इत्यत्र। पुरुषाद् वधविकारसमूहतेनकृतेषु। वार्तिकम्। इति पुरुष-ढञ्। पुरुषकृतः। वधः। १।२०।२। हननम्। हिंसनप्रयोगः ॥

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    बंगाली (3)

    पदार्थ

    (বসবঃ) হে শ্রেষ্ঠ (বিশ্বে) সব (দেবাঃ) প্রকাশমান মহাপুরুষ! (ইমং) এই পুরুষের (রক্ষত) রক্ষা কর (উত) এবং (আদিত্যাঃ) হে সব সূর্য তুল্য তেজস্বী বিদ্বান! (য়ূয়ং) তোমরা (অস্মিন্) এই রাজ্য বিষয়ে! (জাগৃত) জাগ্রত থাক। (সনাভিঃ) স্বীয় বন্ধুর (উত বা) অথবা (অন্য নাভিঃ) অবন্ধুর (পৌরুষেয়ঃ) বা অন্য পুরুষের (য়ঃ) যে (বধঃ) হত্যার চেষ্টা তাহা (ইমং) এই পুরুষকে (মা মা প্রাপং) যেন কখনো প্রাপ্ত না হয়।।

    भावार्थ

    হে শ্রেষ্ঠ প্রকাশমান মহাপুরুষগণ ! এই রাজপুরুষকে রক্ষা কর। হে সূর্য তুল্য বিদ্বানগণ! তোমরা এই রাজ্য বিষয়ে জাগ্রত থাক। বন্ধু অবন্ধু বা অন্য পুরুষের পক্ষ হইতে যে হত্যার প্রচেষ্টা তাহা এই রাজ পুরুষকে যেন প্রাপ্ত না হয়।।

    मन्त्र (बांग्ला)

    বিশ্বে দেবা বসবো রক্ষতে মমুতাদিত্যা জাগৃত য়ূয়মন্মিন্ মেমং সনাভিরুত বান্য নাভি মেমং প্রাপৎ পৌরুষেয়ো বধো য়ঃ।

    ऋषि | देवता | छन्द

    অথবা (আয়ুষ্কামঃ)। বিশ্বে দেবাঃ। ত্রিষ্টুপ্

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    मन्त्र विषय

    (রাজসূয়যজ্ঞোপদেশঃ) রাজতিলক যজ্ঞের জন্য উপদেশ।

    भाषार्थ

    (বসবঃ) হে শ্রেষ্ঠ (বিশ্বে) সব (দেবাঃ) প্রকাশমান মহাত্মাগণ ! (ইমম্) এই পুরুষের (রক্ষত) রক্ষা করুন, (উত) এবং (আদিত্যাঃ) হে সূর্যসমান তেজস্বী বিদ্বানগণ ! (যূয়ম্) তোমরা (অস্মিন্) এই রাজার বিষয়ে (জাগৃত) জাগ্রত থাকো। (সনাভিঃ) নিজের বন্ধুর, (উত বা) অথবা (অন্যনাভিঃ) অবন্ধুর, অথবা (পৌরুষেয়ঃ) কোনো অন্য পুরুষের কৃত, (যঃ) যে (বধঃ) বধের কর্ম আছে[সেগুলো] (ইমম্) এই (ইমম্) এই পুরুষের কাছে যেন (মা মা) কখনো না (প্রাপৎ) পৌঁছাতে পারে ॥১॥

    भावार्थ

    রাজা নিজের সুপরীক্ষিত ন্যায়, মন্ত্রী এবং যুদ্ধমন্ত্রী আদি কর্মচারী বীদেরকে রাজ্যের রক্ষার জন্য সদা চেতন রাখবেন যে কোনো সজাতী বা স্বদেশী বা বিদেশী পুরুষ প্রজাদের মধ্যে যেন অরাজকতা না সৃষ্টি করে ॥১॥

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    भाषार्थ

    (বিশ্বে দেবাঃ) হে সমস্ত দেবগণ ! (বসবঃ) এবং বসুগণ ! (ইমম্) এর (রক্ষত) রক্ষা করো, (উত) এবং (আদিত্যাঃ) হে আদিত্যগণ ! (যূয়ম্) তোমরা (অস্মিন্) এই আয়ুষ্কাম পুরুষের বিষয়ে (জাগৃত) জাগরূক অর্থাৎ সাবধান থাকো। (ইমম্) একে (সনাভিঃ) সম্বন্ধী (উত বা) অথবা (অন্য নাভিঃ) অসম্বন্ধী, (যঃ) যে (পৌরুষেয়) পুরুষ দ্বারা প্রাপ্ত (বধ) বধ বা ক্ষতি হবার সম্ভাবনা রয়েছে তা (মা প্রাপৎ) যেন না প্রাপ্ত করাও।

    टिप्पणी

    [উপনয়ন কর্মে সূক্তের বিনিয়োগ হয়েছে (সায়ণ)। বসু ও আদিত্য কোটিতে গুরু অভিপ্রেত হয়েছে। রুদ্রকোটির গুরুও অভিপ্রেত হয়েছে। এই সকলকে সম্বোধিত করে ব্রহ্মচারীর পিতা ব্রহ্মচর্যাশ্রমের নিবাসীদের প্রতি ব্রহ্মচারীকে সমর্পিত করে তাঁর রক্ষার জন্য প্রার্থনা করে। সনাভিঃ=সমানো নাভিঃ গর্ভাশয়ো যস্যাসৌ সনাভিঃ (সায়ণ), একটি পরিবার বা কুলের সম্বন্ধিত। নাভিঃ=ণহ বন্ধনে (দিবাদিঃ)। "পৌরুষেয়ঃ বধঃ" দ্বারা এটাও ব্রহ্মচারীর পিতা প্রার্থনা করে যে, এর[এই ব্রহ্মচারীর] উপর কোনোও পুরুষ দ্বারা যেন ক্ষতি না হয়।]

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