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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 33 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 33/ मन्त्र 1
    ऋषि: - शन्तातिः देवता - चन्द्रमाः, आपः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - आपः सूक्त
    12

    हिर॑ण्यवर्णाः॒ शुच॑यः पाव॒का यासु॑ जा॒तः स॑वि॒ता यास्व॒ग्निः। या अ॒ग्निं गर्भं॑ दधि॒रे सु॒वर्णा॒स्ता न॒ आपः॒ शं स्यो॒ना भ॑वन्तु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    हिर॑ण्यऽवर्णा: । शुच॑य: । पा॒व॒का: । यासु॑ । जा॒त: । स॒वि॒ता । यासु॑ । अ॒ग्नि: । या: । अ॒ग्निम् । गर्भ॑म् । द॒धि॒रे । सु॒ऽवर्णा॑: । ता: । न॒: । आप॑: । शम् । स्यो॒ना: । भ॒व॒न्तु॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    हिरण्यवर्णाः शुचयः पावका यासु जातः सविता यास्वग्निः। या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    हिरण्यऽवर्णा: । शुचय: । पावका: । यासु । जात: । सविता । यासु । अग्नि: । या: । अग्निम् । गर्भम् । दधिरे । सुऽवर्णा: । ता: । न: । आप: । शम् । स्योना: । भवन्तु ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 33; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    [जो] (हिरण्यवर्णाः) व्यापनशील वा कमनीय रूपवाली (शुचयः) निर्मल स्वभाववाली और (पावकाः) शुद्धि की जतानेवाली हैं, (यासु) जिनमें (सविता) चलाने वा उत्पन्न करनेहारा सूर्य और (यासु) जिनमें (अग्निः) [पार्थिव] अग्नि (जातः) उत्पन्न हुई। (याः) जिन (सुवर्णाः) सुन्दर रूपवाली (आपः) तन्मात्राओं ने (अग्निम्) [बिजुलीरूप] अग्नि को (गर्भम्) गर्भ के समान (दधिरे) धारण किया था, (ताः) वे [तन्मात्राएँ] (नः) हमारे लिये (शम्) शुभ करनेहारी और (स्योनाः) सुख देनेवाली (भवन्तु) होवें ॥१॥

    भावार्थ - जैसे परमात्मा ने कामना के और खोजने के योग्य तन्मात्राओं के संयोग-वियोग से अग्नि, सूर्य और बिजुली, इन तीन तेजधारी पदार्थ आदि सब संसार को उत्पन्न किया है, उसी प्रकार मनुष्यों को शुभ गुणों के ग्रहण और दुर्गुणों के त्याग से आपस में उपकारी होना चाहिये ॥१॥ १−(आपः)=व्यापक तन्मात्राएँ−श्रीमद्दयानन्दभाष्य, यजुर्वेद २७।२५ ॥ २−(आपः) के विषय में सूक्त ४, ५ और ६ सूक्त ४ में मनु महाराज का श्लोक भी देखें ॥


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    Meaning -
    The golden hued, pure and purifying primeval waters, original plastic material of existential forms, wherein manifested Savita, divine creative will, and Agni, basic vitality of life, and which, like the womb of nature, held within the vital heat that sustains life, may, we pray, be beatific, peaceful and blissful for us. (In relation to Apah, reference may be made to ‘Samudro’ amavah’ of Rgveda 1, 190, 1, and ‘Salilam’ of Rgveda 1, 129, 3, Shatapatha Brahmana 7, 5, 2, 18, and Taittiriya Brahmana 1, 1, 3, 5.)


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