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अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 1
    ऋषिः - सिन्धुद्वीपम् देवता - अपांनपात् सोम आपश्च देवताः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - जल चिकित्सा सूक्त
    249

    आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ ऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आप॑: । हि । स्थ । म॒य:॒ऽभुव॑: । ता: । न॒: । ऊ॒र्जे । द॒धा॒त॒न॒ ।म॒हे । रणा॑य । चक्ष॑से ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आप: । हि । स्थ । मय:ऽभुव: । ता: । न: । ऊर्जे । दधातन ।महे । रणाय । चक्षसे ॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 1; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    बल की प्राप्ति के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (आपः) हे जलो ! [जल के समान उपकारी पुरुषों] (हि) निश्चय करके (मयोभुवः) सुखकारक (स्थ) होते हो, (ताः) सो तुम (नः) हमको (ऊर्जे) पराक्रम वा अन्न के लिये, (महे) बड़े-बड़े (रणाय) संग्राम वा रमण के लिये और (चक्षसे) [ईश्वर के] दर्शन के लिये (दधातन) पुष्ट करो ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे जल खान, पान, खेती, बाड़ी, कला, यन्त्र आदि में उपकारी होता है, वैसे मनुष्यों को अन्न, बल और विद्या की वृद्धि से परस्पर वृद्धि करनी चाहिये ॥१॥ मन्त्र १-३ ऋग्वेद १०।९।१-३ ॥ यजुर्वेद ११।५०-५२, तथा ३६।१४-१६ सामवेद उत्तरार्चिक प्रपा० ९ अर्धप्र० २ सू० १० ॥

    टिप्पणी

    १−आपः। १।४।३। हे व्यापयित्र्यः। जलधाराः। जलवत् उपकारिणः, पुरुषाः। हि निश्चयेन। स्थ। अस सत्तायां-लट्। भवथ। मयः−भुवः। मयः+भू सत्तायां−क्विप्। मिञ् हिंसायाम्-असुन्। मिनोति हिनस्ति दुःखम्। मयः सुखम् निघं० ३।६। सुखस्य भावित्र्यः कर्त्र्यः। ताः। आपो यूयम्। नः। अस्मान्। ऊर्जे। क्विप् च। पा० ३।२।७६। इति ऊर्ज बलप्राणनयोः−क्विप्। बलार्थम् अन्नार्थं वा। दधातन। तप्तनप्तनथनाश्च। पा० ७।१।४५। इति डुधाञ् धारणपोषणयोः−लोट्, तकारस्य तनप् आदेशः। धत्त, पोषयत। महे। मह पूजायां−क्विप्। महते। विशालाय। रणाय। रण रवे−घञर्थे क। युद्धाय। यद्वा। रमतेर्भावे−ल्युट् मकारलोपश्छान्दसः। रमणाय। क्रीडनाय। रणाय रमणीयाय−निरु० ९।२७। यत्रायं मन्त्रो भगवता यास्केन व्याख्यातः। चक्षसे। चक्षेर्बहुलं शिच्च। उ० ४।२३३। इति चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि दर्शने च-भावे असुन्। दर्शनाय ॥

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    विषय

    मयोभुवः आपः

    पदार्थ

    १. (आप:) = जल (हि) = निश्चय से (मयोभुवः)= कल्याण-जनक (स्थ) = हैं [ठा-स्थ]। इनके ठीक प्रयोग से शरीर, मन व मस्तिष्क सभी ठीक होते हैं और हमारा जीवन कल्याणमय होता है। २. (ता:) = ये जल (न:) = हमें (ऊर्जे) = बल और प्राणशक्ति के लिए (दधातन) = धारण करें। साथ ही महे-महत्त्व के लिए, उचित भार के लिए, हमें धारण करें। इनके प्रयोग से हम शरीर को यथोचित्त भार [Standard Weight] में स्थापित कर सकते हैं। (रणाय) = रमणीयता के लिए अथवा [रण शब्दे] शब्द-शक्ति के लिए ये हमें स्थापित करें। इनके ठीक प्रयोग से हमारी वाणी की शक्ति बढ़ती है। (चक्षसे) = ये जल हमें दृष्टिशक्ति के लिए धारण करें। इनके ठीक प्रयोग से ही हमारी दृष्टि की शक्ति स्थिर रहेगी।

    भावार्थ

    जल नीरोगता देते हैं, बल बढ़ाते हैं, उचित भार प्राप्त कराते हैं, वाक्शक्ति को ठीक रखते हैं और दृष्टि को तीन करते हैं।

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    भाषार्थ

    (आपः) हे व्याप्त अर्थात् विस्तृत जलो ! (मयोभुवः) सुखोत्पादक (हि) निश्चय से (ष्ठाः) तुम हो, (ताः) वे तुम (नः) हमें (ऊर्जे) बल के लिए (दधातन) परिपुष्ट करो। (महे रणाय चक्षसे) तथा महारमणीय दृष्टि के लिये परिपुष्ट करो, या होओ।

    टिप्पणी

    [आपः=आप्लृ व्याप्तौ (स्वादिः) अर्थात् विस्तृत [शुद्ध] जल। विस्तृत जल= (अथर्व० १।६।४)। ऊर्जे= ऊर्ज बलप्राणनयोः (चुरादिः)। मयः सुखनाम (निघं० ३।६) दधातन= डुधाञ् धारणपोषणयोः (जुहोत्यादिः)। जलचिकित्सा द्वारा दृष्टि रमणीय होती है।]

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    विषय

    जलों का वर्णन

    भावार्थ

    हे ( आपः ) जलो ! ( मयोभुवः ) आप सुख शांति के देने वाले ( स्थ ) हो, ( ताः ) वे आप ( नः ) हमें (ऊर्जे) बलशक्ति और प्राणशक्ति के लिये ( दधातन ) पुष्ट करो । और (महे ) महा ( रणाय ) शब्द अर्थात् उच्च कण्ठस्वर के लिये तथा ( चक्षसे ) उत्तम दृष्टि शक्ति के लिये तुम होओ।

    टिप्पणी

    पञ्चमं षष्ठं च सूक्तं शम्भुमयोभुसूक्तमुच्यते ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अपोनप्त्रीयम्। सिन्धुद्वीपः कृतिश्च ऋषी। ऋग्वेदे त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धुद्वीपो वाऽम्बरीष ऋषिः। आगे देवताः। गायत्री छन्दः। चतुर्ऋचं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Blessings of Water

    Meaning

    Apah, liquid energies of nature, you are creators and givers of peace and joy. Pray inspire us for the achievement of food and energy for body, mind and soul so that we may realise and enjoy the mighty splendour of divinity within and without.

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    Subject

    Apah

    Translation

    Since, waters, you are the source of happiness, grant to us - energy giving food, and an insight to enjoy your divine splendour. (also Rg. X.9.1)

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    Translation

    The waters are the sources of; happiness, may be they helpful for us in attaining grain and may they help us to have nice sight.

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    Translation

    Ye, waters, truly bring us bliss, so help ye us to strength and power, that we may succeed in big life's struggle, and look on God.

    Footnote

    See Yajur 11-50. There the interpretation is quite different. Pt. Khem Karan Das Trivedi translates आपः as noble disinterested persons.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−आपः। १।४।३। हे व्यापयित्र्यः। जलधाराः। जलवत् उपकारिणः, पुरुषाः। हि निश्चयेन। स्थ। अस सत्तायां-लट्। भवथ। मयः−भुवः। मयः+भू सत्तायां−क्विप्। मिञ् हिंसायाम्-असुन्। मिनोति हिनस्ति दुःखम्। मयः सुखम् निघं० ३।६। सुखस्य भावित्र्यः कर्त्र्यः। ताः। आपो यूयम्। नः। अस्मान्। ऊर्जे। क्विप् च। पा० ३।२।७६। इति ऊर्ज बलप्राणनयोः−क्विप्। बलार्थम् अन्नार्थं वा। दधातन। तप्तनप्तनथनाश्च। पा० ७।१।४५। इति डुधाञ् धारणपोषणयोः−लोट्, तकारस्य तनप् आदेशः। धत्त, पोषयत। महे। मह पूजायां−क्विप्। महते। विशालाय। रणाय। रण रवे−घञर्थे क। युद्धाय। यद्वा। रमतेर्भावे−ल्युट् मकारलोपश्छान्दसः। रमणाय। क्रीडनाय। रणाय रमणीयाय−निरु० ९।२७। यत्रायं मन्त्रो भगवता यास्केन व्याख्यातः। चक्षसे। चक्षेर्बहुलं शिच्च। उ० ४।२३३। इति चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि दर्शने च-भावे असुन्। दर्शनाय ॥

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    बंगाली (3)

    पदार्थ

    (আপঃ) জল (হি) নিশ্চয়ই (ময়োভুবঃ) সুখকর (স্থ) হয়। (তাঃ) ইহা (নঃ) আমাদিগকে (উর্জে) পরাক্রম ও অন্নের জন্য (মহে) বৃহৎ (রণায়) সংগ্রামের জন্য, (চক্ষসে) দর্শনের জন্য (দধাতন) পুষ্ট করে।।

    भावार्थ


    জল নিশ্চিত রূপে আমাদের নিকট সুখকর। পরাক্রম ও অন্নের জন্য, সংগ্রাম ও ঈশ্বর দর্শনের জন্য ইহা আমাদিগকে পুষ্ট দান করে।।

    मन्त्र (बांग्ला)

    আপো হি ষ্ঠা ময়োভুব স্তা ন উর্জে দধাতন ৷ মহে রণায় চক্ষসে।

    ऋषि | देवता | छन्द

    সিন্ধুদ্বীপঃ কৃতিৰ্বা। আপঃ। গায়ত্রী

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    मन्त्र विषय

    (বলপ্রাপ্ত্যুপদেশঃ) বল­ প্রাপ্তির জন্য উপদেশ

    भाषार्थ

    (আপঃ) হে জলসমূহ! [জলের সমান উপকারী পুরুষগণ] (হি) নিশ্চিতরূপে (ময়োভুবঃ) সুখদায়ক (স্থ) হও, (তাঃ) তোমরা (নঃ) আমাদের (ঊর্জে) পরাক্রম বা অন্নের জন্য, (মহে) বৃহৎ-বৃহৎ (রণায়) সংগ্রামের জন্য এবং (চক্ষসে) [ঈশ্বরকে] দর্শনের জন্য (দধাতন) পুষ্ট করো ॥১॥

    भावार्थ

    যেভাবে জল খাওয়া, পান করা, কৃষিকাজ, সেচ, যন্ত্র আদিতে উপকারী হয়, তেমনই মনুষ্যকে অন্ন, বল এবং বিদ্যার বৃদ্ধির মাধ্যমে পরস্পরের বৃদ্ধি করা উচিত ॥১॥ মন্ত্র ১-৩ ঋগ্বেদ ১০।৯।১-৩ ॥ যজুর্বেদ ১১।৫০-৫২, তথা ৩৬।১৪-১৬ সামবেদ উত্তরার্চিক প্রপা০ ৯ অর্ধপ্র০ ২ সূ০ ১০ ॥

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    भाषार्थ

    (আপঃ) হে ব্যাপ্ত অর্থাৎ বিস্তৃত জলসমূহ ! (ময়োভুবঃ) সুখোৎপাদক (হি) নিশ্চিতরূপে (ষ্ঠাঃ) তোমরা হও, (তাঃ) সেই তোমরা (নঃ) আমাদের (ঊর্জে) বলের জন্য (দধাতন) পরিপুষ্ট করো। (মহে রণায় চক্ষসে) এবং মহারমণীয় দৃষ্টির জন্য পরিপুষ্ট করো, বা হও।

    टिप्पणी

    [আপঃ=আপ্লৃ ব্যাপ্তৌ (স্বাদিঃ) অর্থাৎ বিস্তৃত [শুদ্ধ] জল। বিস্তৃত জল= (অথর্ব০ ১।৬।৪)। ঊর্জে= ঊর্জ বলপ্রাণনয়োঃ (চুরাদিঃ)। ময়ঃ সুখনাম (নিঘং০ ৩।৬) দধাতন= ডুধাঞ্ ধারণপোষণয়োঃ (জুহোত্যাদিঃ)। জলচিকিৎসা দ্বারা দৃষ্টি রমণীয় হয়।]

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    हिंगलिश (1)

    Subject

    जल का महत्व

    Word Meaning

    उत्तम जल जीवन को सुखमय और (स्वस्थ शरीर से) बल पराक्रम के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं. जिस से हमारा जीवन में रमणीयताके दर्शन करने के लिए स्वस्थता प्रदान करते हैं |

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