अथर्ववेद के काण्ड - 1 के सूक्त 7 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 1/ सूक्त 7/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - चातनः देवता - अग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - यातुधाननाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (अग्ने) हे अग्ने ! [अग्निसमान प्रतापी] (स्तुवानम्) [तेरी] स्तुति करते हुए (यातुधानम्) पीडा देनेहारे (किमीदिनम्) यह क्या, यह क्या हो रहा है, ऐसा कहनेवाले लुतरे को (आवह) ले आ। (हि) क्योंकि (देव) हे राजन् (त्वम्) तू (वन्दितः) स्तुति को प्राप्त करके (दस्योः) चोर वा डाकू का (हन्ता) हनन कर्ता (बभूविथ) हुआ था ॥१॥

    भावार्थ -

    जब अग्नि के समान तेजस्वी और यशस्वी राजा दुःखदायी लुतरों [चुग़लख़ोरों] और डाकुओं और चोरों को आधीन करता है, तो शत्रु लोग उसके बल और प्रताप की प्रशंसा करते हैं और राज्य में शान्ति फैलती है ॥१॥ (किमीदिन्) शब्द का अर्थ भगवान् यास्क ने अब क्या हो रहा है वा यह क्या यह क्या हो रहा है, ऐसा कहते हुए छली, सूचक वा चुग़लख़ोर का किया है, निरु० ६।११ ॥

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