अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 10 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 10/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - कश्यपः देवता - वशा छन्दः - ककुम्मत्यनुष्टुप् सूक्तम् - वशागौ सूक्त
    पदार्थ -

    (ते जायमानायै) तुझ प्रकट होती हुई को (नमः) नमस्कार (उत) और (ते जातायै) तुझ प्रकट हो चुकी को (नमः) नमस्कार है। (अघ्न्ये) हे न मारनेवाली [परमेश्वरशक्ति !] (बालेभ्यः) बलों के लिये और (शफेभ्यः) शान्तिव्यवहारों के लिये (ते) तेरे (रूपाय) स्वरूप [फैलाव] को (नमः) नमस्कार है ॥१॥

    भावार्थ -

    परमेश्वर के जिन गुणों को बुद्धिमान् लोग जानते जाते हैं और जिनको जान चुके हैं, विवेकी जन उन अद्भुत गुणों को साक्षात् करके बल वृद्धि और शान्तिप्रचार के लिये परमेश्वर को सदा नमस्कार करें ॥१॥

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