अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 22
ऋषिः - कुत्सः
देवता - आत्मा
छन्दः - पुरउष्णिक्
सूक्तम् - ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
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भोग्यो॑ भव॒दथो॒ अन्न॑मदद्ब॒हु। यो दे॒वमु॑त्त॒राव॑न्तमु॒पासा॑तै सना॒तन॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठभोग्य॑: । भ॒व॒त् । अथो॒ इति॑ । अन्न॑म् । अ॒द॒त् । ब॒हु । य: । दे॒वम् । उ॒त्त॒रऽव॑न्तम् । उ॒प॒ऽआसा॑तै । स॒ना॒तन॑म् ॥८.२२॥
स्वर रहित मन्त्र
भोग्यो भवदथो अन्नमदद्बहु। यो देवमुत्तरावन्तमुपासातै सनातनम् ॥
स्वर रहित पद पाठभोग्य: । भवत् । अथो इति । अन्नम् । अदत् । बहु । य: । देवम् । उत्तरऽवन्तम् । उपऽआसातै । सनातनम् ॥८.२२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।
पदार्थ
वह (भोग्यः) [सुखों से] अनुभवयोग्य (भवत्) होगा (अथो) और भी (बहु) बहुत (अन्नम्) अन्न [जीवनसाधन] (अदत्) भोगेगा। (यः) जो [मनुष्य] (उत्तरवन्तम्) अति उत्तम गुणवाले (सनातनम्) सनातन [नित्य स्थायी] (देवम्) देव [स्तुतियोग्य परमेश्वर] को (उपासातै) पूजेगा ॥२२॥
भावार्थ
वह मनुष्य अनेक सुखों से युक्त होकर बहुत अन्नवान् होगा, जो जगत्पिता परमेश्वर की उपासना करेगा ॥२२॥
टिप्पणी
२२−(भोग्यः) सुखैरनुभवनीयः (भवत्) लेट्। भूयात् (अथो) अपि च (अन्नम्) जीवनसाधनम् (अदत्) लेट्। अद्यात् (बहु) (यः) पुरुषः (देवम्) स्तुत्यं परमात्मानम् (उत्तरवन्तम्) अ० ४।२२।५। अतिश्रेष्ठगुणयुक्तम् (उपासातै) आस उपवेशने−लेट्। पूजयेत् (सनातनम्) सायंचिरंप्राह्णेप्रगे०। पा० ४।३।२३। इति सना−ट्युल् तुट् च। सदाभवम्। नित्यं परमेश्वरम् ॥
पदार्थ
शब्दार्थ = ( यः ) = जो ज्ञानी पुरुष ( उत्तरावन्तम् ) = अत्युत्तम गुणवाले ( सनातनम् ) = सदा एक रस ( देवम् ) = स्तुति के योग्य परमेश्वर को ( उपासातै ) = उपासना करता है वह ( भोग्यः ) = भाग्यशील ( भवत् ) = है ( अथ ) = और ( अन्नम् ) = जीवन के साधन अन्नादि पदार्थों को ( अदत् ) = उपयोग में ( बहु ) = बहुत प्राप्त करता है ।
भावार्थ
भावार्थ = जो महानुभाव, उस परम प्यारे सर्वगुणालंकृत सनातन परमात्मा की प्रेम से भक्ति करता है वही भाग्यवान् है, उसी को परमात्मा, अन्नादि भोग्य पदार्थ प्राप्त कराता है, वह महापुरुष अन्नादि पदार्थों को अतिथि आदि के सत्कार रूप परोपकार में लगाता हुआ और आप भी उन पदार्थों को भोगता हुआ सुखी होता है ।
विषय
'उत्तरावान् सनातन' देव का उपासन
पदार्थ
१. (यः) = जो पुरुष (देवम्) = उस प्रकाशमय (उत्तरावन्तम्) = श्रेष्ठ गुणों की चरम सीमारूप [प्रत्येक गुण absolute निरपेक्षरूप से प्रभु में ही तो है] (सनातनम्) = सदा से विद्यमान प्रभु को (उपासातै) = पूजता है, वह भी (भोग्य:) = उत्तम भोगवाला (भवत्) = होता है, (अथो) = और (बहु अन्नम् अदत्) = बड़े लम्बे काल तक अन्न खानेवाला होता है, अर्थात् सुदीर्घ जीवन प्राप्त करता है।
भावार्थ
'उत्तरावान् सनातन' देव का स्मरण पुरुष को उत्तम भोक्ता व सुदीर्घ काल तक अन्न खानेवाला बनाता है।
भाषार्थ
(यः) जो व्यक्ति, (उत्तरावन्तम्) सर्वोपरि वर्तमान, (सनातनं देवम्) सनातन अर्थात् सदा वर्तमान देव [स्कम्भ-परमेश्वर] की (उपासातै) उपासना करे, [वह] (भोग्यः) भक्तों द्वारा सेवनीय (भवत्) हो जाय, (अथो) तथा (बहु) बहुत (अन्नम्) अन्नरूप परमेश्वर के आनन्द रस का (अदत्) भक्षण करे, पान करे।
टिप्पणी
[उत्तरावन्तम् = "अतिशयितात्कर्षवन्तम्" (सायण अथर्व० ४।२२।५)। अन्नम् = परमेश्वर, (मन्त्र २१)। जो परमेश्वर की बहुत उपासना करेगा वह उस के आनन्दरस का बहु-पान या भोग करेगा ही। "अन्नं बहु१ अदत्" प्राकृतिक अन्न का बहुभक्षण उपासना में उपकारी "लघुत्व" (श्वेता० उप०, अध्याय २। खण्ड १३) का विरोधी है, अतः उपासना में अनुपकारी है]। [१. अथवा इस का अभिप्राय यह है कि ऐसे उपासक को, भक्तजन बहुत अन्न प्रदान करते हैं, उस के पास खान-पान की सामग्री का अतिशय हो जाता है (देखो अथर्व० २०।१३१।४,५)]
विषय
ज्येष्ठ ब्रह्म का वर्णन।
भावार्थ
वह पुरुष भी (भोग्यः) समस्त संसार को अपना भोग्य बनाने वाला होकर (अभवत्) सबका प्रभु होकर विराजता है। वह ही (बहु) बहुत सा (अन्न) अन्न खाने का पदार्थ जीवों को भी (अदद) प्रदान करता है (यः) जो (उत्तरावन्तं) सब से उत्कृष्ट पद को प्राप्त (सनातनम्) सनातन (देवम्) देव को (उपासातै) उपासना करता है।
टिप्पणी
(प्र०) ‘भाग्यो’ इति पाठः प्रामादिकः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कुत्स ऋषिः। आत्मा देवता। १ उपरिष्टाद् बृहती, २ बृहतीगर्भा अनुष्टुप, ५ भुरिग् अनुष्टुप्, ७ पराबृहती, १० अनुष्टुब् गर्भा बृहती, ११ जगती, १२ पुरोबृहती त्रिष्टुब् गर्भा आर्षी पंक्तिः, १५ भुरिग् बृहती, २१, २३, २५, २९, ६, १४, १९, ३१-३३, ३७, ३८, ४१, ४३ अनुष्टुभः, २२ पुरोष्णिक्, २६ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुब्, ५७ भुरिग् बृहती, ३० भुरिक्, ३९ बृहतीगर्भा त्रिष्टुप, ४२ विराड् गायत्री, ३, ४, ८, ९, १३, १६, १८, २०, २४, २८, २९, ३४, ३५, ३६, ४०, ४४ त्रिष्टुभः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Jyeshtha Brahma
Meaning
Whoever worships and meditates on Eternal Brahma, highest object of worship, would receive unbounded food of life and joy, and indeed Brahma itself would reveal its presence as food for his joyous experience in meditation.
Translation
Capable of enjoyment (bhogyah) shall he become, and also he shall eat plenty of food (annamadad), whoever worships the eternal (sanātanam) the bestower of superiority (uttarāvantam).
Translation
The man who worships the Almighty Divinity who is eternal rarest of the matter and souls, will get useful things and will attain plenty of eatables.
Translation
The man who humbly worshippeth the Eternal and Victorious God, prospers in life and gives great store of food in charity.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२२−(भोग्यः) सुखैरनुभवनीयः (भवत्) लेट्। भूयात् (अथो) अपि च (अन्नम्) जीवनसाधनम् (अदत्) लेट्। अद्यात् (बहु) (यः) पुरुषः (देवम्) स्तुत्यं परमात्मानम् (उत्तरवन्तम्) अ० ४।२२।५। अतिश्रेष्ठगुणयुक्तम् (उपासातै) आस उपवेशने−लेट्। पूजयेत् (सनातनम्) सायंचिरंप्राह्णेप्रगे०। पा० ४।३।२३। इति सना−ट्युल् तुट् च। सदाभवम्। नित्यं परमेश्वरम् ॥
बंगाली (1)
পদার্থ
ভোগ্যো ভবদথো অন্নমদদ্বহু।
য়ো দেবমুত্তারাবন্তমুপাসাতৈ সনাতনম্।।৪৩।।
(অথর্ব ১০।৮।২২)
পদার্থঃ (য়ঃ) যে জ্ঞানী পুরুষ (উত্তরাবন্তম্) অতি উত্তম গুণশালী, (সনাতনম্) সদা একরস অর্থাৎ অপরিবর্তনীয়, (দেবম্) স্তুতিযোগ্য পরমেশ্বরের (উপাসাতৈ) উপাসনা করে, সে (ভোগ্যঃ) ভাগ্যশীল (ভবৎ) হয়ে যায়। (অথ) এবং (অন্নম্) জীবন সাধনের হেতু অন্নাদি পদার্থ (বহু অদৎ) বহুলভাবে প্রাপ্ত হয়।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ যে মহানুভব সেই পরমপ্রিয় সর্বগুণে অলঙ্কৃত সনাতন পরমাত্মাকে প্রেম দ্বারা ভক্তি করে, সে মহাভাগ্যবান। তাকে পরমাত্মা অন্নাদি ভোগ্য পদার্থ প্রদান করেন। সেই মহাপুরুষ অন্নাদি পদার্থ দ্বারা অতিথির ন্যায় সকলের সৎকার রূপ পরোপকারের মাধ্যমে সেসকল পদার্থ ভোগ করে এবং সুখ লাভ করে ।।৪৩।।
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