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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 23
    ऋषिः - कुत्सः देवता - आत्मा छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
    987

    स॑ना॒तन॑मेनमाहुरु॒ताद्य स्या॒त्पुन॑र्णवः। अ॑होरा॒त्रे प्र जा॑येते अ॒न्यो अ॒न्यस्य॑ रू॒पयोः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒ना॒तन॑म् । ए॒न॒म् । आ॒हु॒: । उ॒त । अ॒द्य । स्या॒त् । पुन॑:ऽनव: । अ॒हो॒रा॒त्रे इति॑ । प्र । जा॒ये॒ते॒ इति॑ । अ॒न्य: । अ॒न्यस्य॑ । रू॒पयो॑: ॥८.२३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सनातनमेनमाहुरुताद्य स्यात्पुनर्णवः। अहोरात्रे प्र जायेते अन्यो अन्यस्य रूपयोः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सनातनम् । एनम् । आहु: । उत । अद्य । स्यात् । पुन:ऽनव: । अहोरात्रे इति । प्र । जायेते इति । अन्य: । अन्यस्य । रूपयो: ॥८.२३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 8; मन्त्र » 23
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।

    पदार्थ

    (एनम्) इस [सर्वव्यापक] को (सनातनम्) सनातन [नित्य स्थायी परमात्मा] (आहुः) वे [विद्वान्] कहते हैं, (उत) और वह (अद्य) आज [प्रतिदिन] (पुनर्णवः) नित्य नवा (स्यात्) होता जावे। (अहोरात्रे) दिन और रात्रि दोनों (अन्यो अन्यस्य) एक दूसरे के (रूपयोः) दो रूपों में से (प्र जायेते) उत्पन्न होते हैं ॥२३॥

    भावार्थ

    नित्यस्थायी परमात्मा के गुण जिज्ञासुओं को नित्य नवीन विदित होते जाते हैं, जैसे दिन रात्रि से और रात्रि दिन से नित्य नवीन उत्पन्न होते हैं ॥२३॥

    टिप्पणी

    २३−(सनातनम्) म० २२। सदा वर्तमानम् (एनम्) सर्वव्यापकं परमात्मानम् (आहुः) कथयन्ति विद्वांसः (उत) अपि (अद्य) वर्तमाने दिने। प्रतिदिनम् (स्यात्) (पुनर्णवः) वारं वारं नवीनः (अहोरात्रे) रात्रिदिने (प्र जायेते) उत्पद्येते (अन्योऽन्यस्य) कर्मव्यतिहारे सर्वनाम्नो द्वे वाच्ये समासवच्च बहुलम्। इति द्वित्त्वम्। असमासवद्भावे पूर्वपदस्थस्य सुपः सुर्वक्तव्यः। वा० पा० ८।१।१२। इति पूर्वपदात् सुपः सुः। परस्परस्य (रूपयोः) स्वरूपयोः सकाशात् ॥

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    विषय

    अहोरात्र

    व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्ण दत्त जी महाराज

    बेटा! रात्रि और दिवस दोनों एक सूत्र में परणित हो जाते हैं, वह रात्रि और दिवस मानो देखो, ज्ञान और अज्ञान के रूप में रात्रि दिवस होते हैं, मानो देखो, यह तो सूर्य की आभा में रात्रि आ गई है, दिवस आ गया है, सम्वतसर बन गएं हैं, मानो देखो, इसी से अहोरात्र बन गएं हैं, परन्तु जब इसी का दूसरा रूप लिया जाता है, क्या मानो देखो, अन्धकार रात्रि है, प्रकाश दिवस है, सूर्य का मिलन होना ही दिवस कहलाता है, परमाणुओं से दिवस वही है, सूर्य का मिलन होता है, मेरे प्यारे! रात्रि वही जहाँ मानो देखो, चन्द्रमा का दिवस ले करके और रात्रि को अपने में धारण करके वह प्रकाशमयी बन जाता हैतो मानो देखो, रात्रि भी प्रकाश है, और यह दिवस भी प्रकाश है, दोनो ही प्रकाश रूप में बेटा! योगी दोनों को एक ही सूत्र में पिरो देता है, मेरे प्यारे! देखो, जब योगेश्वर दोनों को एक रूप में पिरो देता है

    मुनिवरों! यह तो तुमने जान ही लिया होगा कि एक चतुर्युगी में तैतालिस लाख बीस सहस्त्र (४३२००००वर्ष) वर्ष होते हैंइक्हत्तर (७१) चतुर्युगियों का एक मन्वन्तर होता हैऐसे चौदह (१४) मन्वन्तरों का सृष्टिकाल या ब्रह्म दिन होता हैतो चौदह मन्वन्तरों के पश्चात् एक प्रलयकाल हो जाता हैइस प्रलयकाल को ब्रह्म की रत्रि कहते हैएक सृष्टिकाल और एक प्रलयकाल को मिलाकर ब्रह्म का अहोरात्र कहलाता हैअर्थात् दो सहस्त्र चतुर्युगियों का ब्रह्मा का अहोरात्र बनता हैमुनिवरों! देखो, ऐसे ऐसे ३६० अहोरात्र का, ब्रह्म का एक वर्ष हो जाता हैऐसे ऐसे ब्रह्मा के सौ वर्ष व्यतीत होते है, तो ब्रह्म की शतायु हो जाती है

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    पदार्थ

    शब्दार्थ = ( एनम् ) = इस परमात्मा को  ( सनातनम् ) = विद्वान् पुरुष सनातन  ( आहुः ) = कहते हैं।  ( उत ) = और  ( अद्य ) = आज  ( पुनर्णवः ) =  नित्य नया  ( स्यात् ) = होता जाता है।  ( अहोरात्रे ) =  दिन और रात्रि दोनों  ( अन्यो अन्यस्य ) = एक दूसरे के  ( रूपयो: ) = दो रूपों में से  ( प्रजायेते ) =  उत्पन्न होते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ = उस परमप्यारे प्रभु के उपासक महानुभावों को नित्य नये-से-नये प्रभु के अनन्त गुण प्रतीत होते हैं, जैसे दिन से रात और रात से दिन, नये-से-नये प्रतीत होते हैं ।

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    विषय

    सनातन:-पुनर्णवः

    पदार्थ

    १. (एनम्) = इस प्रभु को (सनातनं आहुः) = सनातन कहते हैं, परन्तु (उत अद्य) = वह तो आज भी (पुनर्णव:) = फिर नये-का-नया ही है। जैसे (अहोरात्रे) = दिन व रात (अन्यः अन्यस्य रूपयो:) = एक दूसरे के रूपों में से (प्रजायेते) = उत्पन्न होते हैं। २. दिन से रात्रि पैदा होती है और रात्रि से दिन पैदा होता है। ये रात और दिन नित्य नये-ही-नये लगते हैं। इसी प्रकार सनातन भी वे प्रभु नित नये-ही नये हैं।

    भावार्थ

    सनातन होते हुए भी वे प्रभु नबीन-हो-नवीन हैं। वे कभी जीर्ण नहीं होते।

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    भाषार्थ

    (एनम्) इस [स्कम्भ-परमेश्वर] को (सनातनम्) सदावर्ती (आहुः) कहते हैं, (उत) तथा (अद्य) वर्तमान काल में बहु (पुनर्णवः) पुनः-पुनः नया भी (स्यात्) होता रहता है। जैसे कि (अहोरात्रे) दिन और रात [अनादिकाल से वर्तमान होते हुए भी] (अन्यो अन्यस्य) अपने-अपने भिन्न भिन्न (रूपयोः) रूपों में या एक-दूसरे के रूप में (प्रजायेते) पुनः पुनः प्रकट होते रहते हैं।

    टिप्पणी

    [भूतकाल की सृष्टियों में तथा वर्तमान काल की सृष्टि में (अद्य), और भविष्यत् काल की सृष्टियों में दिन-रात की सत्ता सदा रहती है। परन्तु फिर भी दिन के पश्चात् रात, और रात के पश्चात् दिन, दृष्टिगोचर होते हैं। ये अनादि होते हुए पुनः-पुनः नए-नए प्रकट होते हैं, इसी प्रकार परमेश्वर के सनातन होते हुए भी वह प्रतिसृष्टि नए-नए रूपों में प्रकट होता रहता है। अहोरात्रे यथा— "अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्"।( ऋ० १०/१९०/२,३) में "यथापूर्वम्" द्वारा "अहोरात्र " आदि की सनातन सत्ता कही है, और ये पुनः पुनः नए-नए रूपों में भी प्रकट होते रहते हैं]

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    इंग्लिश (5)

    Subject

    Jyeshtha Brahma

    Meaning

    They say this Brahma is Sanatana, Eternal, beyond time and age, and yet it arises ever anew in time and presence, as the day and night arise anew and follow each other in relation to the form and time of the occasion.

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    Word Meaning

    (सनातनम्) Forever (एनम्) This (आहुः) is called (उत) and (अद्य) now (स्यात्) may (पुनर्णवः) renew (अहोरात्रे) day and night (प्रजायेते) give birth (अन्य: अन्यस्य) to each other (रूपयोः) [just] in two different forms

    Mantra Meaning

    This is called Sanatan, This may renew itself now.

    Day and night give birth to each other, you know it how.

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    Translation

    They proclaim Him to be eternal. But He may become new again even today. Day and night are reproduced, each one from the two forms which the other wears.

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    Translation

    The learned men call the soul eternal though it is new again (by assuming birth). The birth and death like day and night occur in the form which one and the other of them does wear.

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    Translation

    The sages call God immemorial, but He is ever fresh and new. Day and Night reproduce themselves anew, each from the form the other wears.

    Footnote

    God, though old and immemorial is ever new and fresh, just as Day and Night, though ancient come fresh and new daily. Day comes out of Night, and Night out of day.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २३−(सनातनम्) म० २२। सदा वर्तमानम् (एनम्) सर्वव्यापकं परमात्मानम् (आहुः) कथयन्ति विद्वांसः (उत) अपि (अद्य) वर्तमाने दिने। प्रतिदिनम् (स्यात्) (पुनर्णवः) वारं वारं नवीनः (अहोरात्रे) रात्रिदिने (प्र जायेते) उत्पद्येते (अन्योऽन्यस्य) कर्मव्यतिहारे सर्वनाम्नो द्वे वाच्ये समासवच्च बहुलम्। इति द्वित्त्वम्। असमासवद्भावे पूर्वपदस्थस्य सुपः सुर्वक्तव्यः। वा० पा० ८।१।१२। इति पूर्वपदात् सुपः सुः। परस्परस्य (रूपयोः) स्वरूपयोः सकाशात् ॥

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    बंगाली (1)

    পদার্থ

    সনাতনমেনমাহুরুতাদ্য স্যাৎপুনর্ণবঃ।

    অহোরাত্রে প্রজায়েতে অন্যো অন্যস্য রূপয়োঃ ।।৩৮।।

    (অথর্ব ১০।৮।২৩)

    পদার্থঃ (এনম্) এই পরমাত্মাকে বিদ্বান পুরুষেরা (সনাতনম্) সনাতন (আহুঃ) বলে ডাকে। (উত) তিনি (অদ্য) আজও (পুনর্ণবঃ) নিত্য নবীনরূপে (স্যাৎ) বিরাজিত। যেমন (অহোরাত্রে) দিন ও রাত উভয়ে (অন্যঃ অন্যস্য) একে অপর হতে (রূপয়ো) নতুন রূপে (প্র জায়েতে) উৎপন্ন হয়।

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ সেই পরমপ্রিয় ভগবানের উপাসকের কাছে নিত্য নবীন সনাতন ঈশ্বরের অনন্ত গুণ প্রতীত হয়, যেভাবে দিন থেকে রাত ও রাত থেকে দিন নতুনরূপে প্রকটিত হয় ।।৩৮।।

     

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