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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 26
    ऋषिः - कुत्सः देवता - आत्मा छन्दः - द्व्यनुष्टुब्गर्भानुष्टुप् सूक्तम् - ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
    81

    इ॒यं क॑ल्या॒ण्यजरा॒ मर्त्य॑स्या॒मृता॑ गृ॒हे। यस्मै॑ कृ॒ता शये॒ स यश्च॒कार॑ ज॒जार॒ सः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒यम् । क॒ल्या॒णी । अ॒जरा॑ । मर्त्य॑स्य । अ॒मृता॑ । गृ॒हे । यस्मै॑ । कृ॒ता । शये॑ । स: । य: । च॒कार॑ । ज॒जार॑ । स: ॥८.२६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इयं कल्याण्यजरा मर्त्यस्यामृता गृहे। यस्मै कृता शये स यश्चकार जजार सः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इयम् । कल्याणी । अजरा । मर्त्यस्य । अमृता । गृहे । यस्मै । कृता । शये । स: । य: । चकार । जजार । स: ॥८.२६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 8; मन्त्र » 26
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    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।

    पदार्थ

    (इयम्) यह (कल्याणी) कल्याणी [आनन्दकारिणी, प्रकृति जगत् की सामग्री] (अजरा) अजर, (अमृता) अमर होकर (मर्त्यस्य) मरणधर्मी [मनुष्य] के (गृहे) घर में है। (यस्मै) जिस के लिये [जिस ईश्वर की आज्ञा मानने के लिये] (कृता) वह सिद्ध की गई है, (सः) वह [परमेश्वर, उस प्रकृति में] (शये) सोता है, (यः) जिसने [उस प्रकृति को] (चकार) सिद्ध किया था, (सः) वह [परमेश्वर] (जजार) स्तुतियोग्य हुआ ॥२६॥

    भावार्थ

    प्रकृति जगत् का कारण प्रत्येक मनुष्य आदि प्राणी के शरीर में है। परमेश्वर ने प्रकृति को अनेक उपकारों के लिये कार्यरूप जगत् में परिणत किया है, वह परमात्मा सबका उपास्य देव है ॥२६॥

    टिप्पणी

    २६−(इयम्) दृश्यमाना प्रकृतिः (कल्याणी) माङ्गलिका (अजरा) जराशून्या। अनिर्बला (मर्त्यस्य) मरणधर्मणो मनुष्यस्य (अमृता) मरणरहिता। पुरुषार्थशीला (गृहे) शरीर इत्यर्थः (यस्मै) परमेश्वराय। तदाज्ञापालनाय (कृता) निष्पादिता (शये) शेते। वर्तते प्रकृतौ (सः) परमेश्वरः (यः) (चकार) कृतवान् प्रकृतिं कार्यरूपेण (जजार) जॄ स्तुतौ-लिट्। जरा स्तुतिर्जरतेः स्तुतिकर्मणः-निरु० १०।८। जजरे। स्तुत्यो बभूव (सः) ईश्वरः ॥

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    पदार्थ

    शब्दार्थ = ( इयं कल्याणी ) = यह कल्याण करनेवाली देवता परमात्मा  ( अजरा ) = जरा रहित  ( अमृता ) = अमर है ।  ( मर्त्यस्य गृहे ) = मर्त्य के हृदय रूपी घर में निवास करता है ।  ( यस्मै ) = जिसके लिए  ( कृता ) = कार्य करता है  ( सः चकार ) = वह कार्य करने में समर्थ होता है और  ( यः शये ) = जो सोता है  ( सः जजार ) = वह जीर्ण हो जाता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ = परमात्मदेव सदा अजर-अमर हैं सबका कल्याण करनेवाले हैं वे मरणधर्मा मनुष्य के हृदय रूपी घर में निवास करते हैं जिसके ऊपर इस प्रभु की कृपा होती है वह कृतकार्य और यशस्वी होता है, परन्तु जो सोता है अर्थात् परमात्मा के ध्यान और भक्ति आदि साधनों से विमुख होता है वह शीघ्र जीर्ण हो कर नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है ।

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    विषय

    मर्त्यस्य गृहे इयं कल्याणी अजरा अमृता

    पदार्थ

    १. (इयम्) = यह, गतमन्त्र में वर्णित, 'परिष्वजीयसी' देवता कल्याणी हमारा कल्याण करनेवाली है। (अजरा) = कभी जीर्ण नहीं होती, (मर्त्यस्य) = मरणधर्मा जीव के (गृहे) = इस शरीरगृह में (अ-मृता) = न मरनेवाली है। शरीर में आत्मा के साथ परमात्मा का भी निवास है। शरीर में ममत्व रखनेवाला आत्मा तो 'जन्म-मरण' के चक्र में फंसता है, परन्तु इसमें रहता हुआ भी परमात्मा जन्म-मरण के चक्र से ऊपर है। २. (यस्मै कृता) = जिस जीव के लिए, कर्मफल भोगने के लिए आधार रूप से, यह शरीर-नगरी बनायी जाती है, (सः शये) = वह इसमें ममत्वपूर्वक निवास करता है। (यः चकार) = जो परमात्मा इस नगरी को बनाता है, (सः जजार) = वह स्तुति के योग्य होता है [ज स्तुतौ]। इस शरीर की रचना में-अङ्ग-प्रत्यङ्ग की रचना के कौशल में उस प्रभु की महिमा काअनुभव करता हुआ स्तोता उस प्रभु का स्तवन करता है।

    भावार्थ

    शरीर में आत्मा व परमात्मा दोनों का निवास है। आत्मा इसमें रहता हुआ कर्मफल भोगता है। इसका निर्माता प्रभु स्तुति का विषय बनता है।

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    भाषार्थ

    (इयम्) यह (कल्याणी) कल्याण करने वाली [देवता, मन्त्र २५] (अजरा) जरारहित है, जीर्ण नहीं होती। (अमृता) यह अमृता देवता, (मर्त्यस्य) मरणधर्मा मनुष्य के (गृहे) शरीर या हृदयगृह में विद्यमान है। (कृता) वह कृतिशक्तिरूपिणी (यस्मै) जिसके लिये (शये) मर्त्य शरीर या हृदय में शयन किये हुए है (सः सः) वह है वह (सः) जो कि (चकार) कर्म करता है और (जजार) जीर्ण होता रहता है।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Jyeshtha Brahma

    Meaning

    This infinitely benevolent, unaging, immortal Divinity, this creative power, lies there in the heart core: for whom? For that soul which does its karma and grows from childhood to ripe old age.

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    Translation

    This auspicious one (woman) is unaffected by age; an immortal in the home of a mortal. For whom she was made, he (sleeps); he, who made her, has grown old.

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    Translation

    This auspicious and fair prakriti (the matter) untouched by old age is immortal and eternal in home, the world of mortality. He for whom it lies to yield the pleasure etc. and who has attachment with it, becomes old and attered.

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    Translation

    This lovely Matter is untouched by age, being immortal it resides in the body of the mortal man. God, for Whose obedience it was made lies hidden in Matter. God, Who converted Matter from the invisible into the visible shape, is worthy of adoration.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २६−(इयम्) दृश्यमाना प्रकृतिः (कल्याणी) माङ्गलिका (अजरा) जराशून्या। अनिर्बला (मर्त्यस्य) मरणधर्मणो मनुष्यस्य (अमृता) मरणरहिता। पुरुषार्थशीला (गृहे) शरीर इत्यर्थः (यस्मै) परमेश्वराय। तदाज्ञापालनाय (कृता) निष्पादिता (शये) शेते। वर्तते प्रकृतौ (सः) परमेश्वरः (यः) (चकार) कृतवान् प्रकृतिं कार्यरूपेण (जजार) जॄ स्तुतौ-लिट्। जरा स्तुतिर्जरतेः स्तुतिकर्मणः-निरु० १०।८। जजरे। स्तुत्यो बभूव (सः) ईश्वरः ॥

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    बंगाली (1)

    পদার্থ

    ইয়ং কল্যাণ্যজরা মর্ত্যস্যামৃতা গৃহে।

    য়স্মৈ কৃতা শয়ে স য়শ্চকার জজার সঃ।।৮৪।।

    (অথর্ব ১০।৮।২৬)

    পদার্থঃ (ইয়ং কল্যাণি) যে কল্যাণকারী দেবতা পরমাত্মা (অজরা) জরারহিত ও (অমৃতা) অমর, (মর্ত্যস্য গৃহে) তিনি মরণশীল জীবের হৃদয় রূপী ঘরে নিবাস করেন । (য়স্মৈ) সেই পরমাত্মার জন্য যে (কৃতা) কাজ করে, (সঃ চকার) সে কাজে সিদ্ধি লাভ করে। (য়ঃ শয়ে) সেই পরমাত্মা সর্বত্রই নিবাস করেন, (সঃ জজার) তিনিই স্তুতির যোগ্য ।

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ পরমাত্মাদেব সদা জরারহিত ও অমর। তিনি সকলের কল্যাণকারী। মরণশীল মানুষের হৃদয় রূপী ঘরে তিনি নিবাস করেন। যার উপর তাঁর কৃপা হয়, সে কৃতকার্য ও যশস্বী হন। তিনি সমস্ত জগতেই নিবাস করছেন এবং তাঁকেই একমাত্র স্তুতি করতে হয় ।।৮৪।।

     

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