अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 40
ऋषिः - कुत्सः
देवता - आत्मा
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - ज्येष्ठब्रह्मवर्णन सूक्त
64
अ॒प्स्वासीन्मात॒रिश्वा॒ प्रवि॑ष्टः॒ प्रवि॑ष्टा दे॒वाः स॑लि॒लान्या॑सन्। बृ॒हन्ह॑ तस्थौ॒ रज॑सो वि॒मानः॒ पव॑मानो ह॒रित॒ आ वि॑वेश ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒प्ऽसु । आ॒सी॒त् । मा॒त॒रिश्वा॑ । प्रऽवि॑ष्ट: । प्रऽवि॑ष्टा: । दे॒वा: । स॒लि॒लानि॑ । आ॒स॒न् । बृ॒हन् । ह॒ । त॒स्थौ॒ । रज॑स: । वि॒ऽमान॑: । पव॑मान: । ह॒रित॑: । आ । वि॒वे॒श॒ ॥८.४०॥
स्वर रहित मन्त्र
अप्स्वासीन्मातरिश्वा प्रविष्टः प्रविष्टा देवाः सलिलान्यासन्। बृहन्ह तस्थौ रजसो विमानः पवमानो हरित आ विवेश ॥
स्वर रहित पद पाठअप्ऽसु । आसीत् । मातरिश्वा । प्रऽविष्ट: । प्रऽविष्टा: । देवा: । सलिलानि । आसन् । बृहन् । ह । तस्थौ । रजस: । विऽमान: । पवमान: । हरित: । आ । विवेश ॥८.४०॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा और जीवात्मा के स्वरूप का उपदेश।
पदार्थ
(मातरिश्वा) आकाश में चलनेवाला [वायु वा सूत्रात्मा] (अप्सु) अन्तरिक्ष [वा तन्मात्राओं] में (प्रविष्टः) प्रवेश किये हुए (आसीत्) था, (देवः) [अन्य] दिव्य पदार्थ (सलिलानि) समुद्रों में [अगम्य कारणों में] (प्रविष्टाः) प्रवेश किये हुए (आसन्) थे। (रजसः) संसार का (बृहन् ह) बड़ा ही (विमानः) विविध प्रकार नापनेवाला [वि विमानरूप आधार, परमेश्वर] (तस्थौ) खड़ा था और (पवमानः) शुद्धि करनेवाले [परमेश्वर] ने (हरितः) सब दिशाओं में (आ विवेश) प्रवेश किया था ॥४०॥
भावार्थ
प्रलय में वायु और अन्य सब पदार्थ अपने-अपने कारणों में लीन थे, उस समय एक ही परमेश्वर का अनुभव होता था ॥४०॥ मन्त्र का तीसरा पाद ऊपर मन्त्र ३ में आया है ॥
टिप्पणी
४०−(अप्सु) म० ३५। अन्तरिक्षे तन्मात्रासु वा (आसीत्) (मातरिश्वा) म० ३९। वायुः सूत्रात्मा वा (प्रविष्टः) (प्रविष्टाः) (देवाः) अन्ये दिव्यपदार्थाः (सलिलानि) समुद्रान्। अगम्यकारणानि (आसन्) (बृहन्) महान् (ह) एव (तस्थौ) स्थितवान् (रजसः) लोकस्य (विमानः) विशेषेण मानकर्ता। विमानतुल्याधारः परमेश्वरः (पवमानः) संशोधकः परमात्मा (हरितः) पूर्वादिदिशाः-निघ० १।६ (आ विवेश) प्रविष्टवान् ॥
विषय
'बृहन् पवमानः' प्रभु
पदार्थ
१. प्रलय के समय सब कार्यजगत् नष्ट होकर कारणरूप में चला जाता है, यह कारणरूप प्रकृति ही आपः' कहलाती है-सर्वत्र एक समान [साम्यावस्था] फैला हुआ तत्त्व। यही 'सलिल' कहलाती है [सत् लीनम् अस्मिन्]-जिसमें यह सब दृश्य [सत्] जगत् लीन हो जाता है। (मातरिश्वा) = वह (सूत्रात्मा अप्सु) = इस एक-समान फैले हुए परमाणुरूप प्रकृतितत्व में (प्रविष्टः आसीत्) = प्रविष्ट हुआ-हुआ था। (देवा:) = सूर्य आदि सब देव भी (सलिलानि) = इन सलिलों में ही-कारणभूत परमाणुओं में ही (प्रविष्टाः आसन्) = प्रविष्ट हुए-हुए थे। २. उस समय (ह) = निश्चय से (बृहन्) = महान् प्रभु (ह) = ही (रजस: विमान:) = सब लोकों का वि-मान-कारणरूप में अलग-अलग करनेवाला-[निर्माण से विपरीत विमान करनेवाला] (तस्थौ) = स्थित था। यह (पवमानः) = पवित्रीकरणवाला [सब ब्रह्माण्ड का सफाया कर देनेवाला] प्रभु (हरित:) = सब दिशाओं में (आविवेश) = प्रविष्ट हो रहा था। उस समय चारों ओर प्रभु-ही-प्रभु थे-अन्य कोई सत्ता प्रतीत न होती थी।
भावार्थ
प्रलय के समय प्रभु कारणरूप व्यापक परमाणुओं में प्रविष्ट थे। सूर्यादि ये सब देव भी कारणरूप परमाणुओं में चले गये थे। एक प्रभु ही इस ब्रह्माण्ड का विमान [Disman tling] करते हुए स्थित थे। वे सफाया कर देनेवाले प्रभु ही सब ओर विद्यमान थे।
भाषार्थ
(मातरिश्वा) "अन्तरिक्ष में फैली हुई" वायु (अप्सु) "आपः" में (प्रविष्टः आसीत्) प्रविष्ट थी, (देवाः) देव (सलिलानि) सलिलों में (प्रविष्टाः आसन्) प्रविष्ट थे। (ह) निश्चय से (बृहन्) महान् परमेश्वर (तस्थौ) स्थित था, (रजसो विमानः) जो कि लोकों का निर्माण करता है (पवमानः) पवित्र करने वाला वह परमेश्वर (हरितः) हरी-भरी दिशाओं में (आ विवेश) प्रविष्ट हुआ।
टिप्पणी
[मन्त्र में, मन्त्र ३९ के अनुसार "अप्सु" का अर्थ "आकाश” प्रतीत होता है। प्रलय में मातरिश्वा आकाश में प्रविष्ट थी। इसी प्रकार सूर्यादि देव भी "सलिलानि” अर्थात् "अप्सु" में प्रविष्ट थे। "अप्सु" में बहुवचन के अनुसार "सलिलानि" में बहुवचन का प्रयोग हुआ है। प्रलयावस्था में महान्-परमेश्वर स्थित था जो कि लोकों का निर्माण करता है वह पुनः सृष्टिरचना करता हुआ हरी भरी दिशाओं में प्रकट होता है। इस प्रकार मन्त्र ३९ और ४० में आर्थिक समन्वय हो जाता है]।
विषय
ज्येष्ठ ब्रह्म का वर्णन।
भावार्थ
(मातरिश्वा) वायु उस समय (अप्सु प्रविष्टः) अपः=प्रकृति सूक्ष्म परमाणुओं में (प्रविष्टः) प्रविष्ट रहता है और (देवाः) अन्य देव, भी (सलिलानि प्रविष्टाः आसन्) प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं में ही प्रविष्ट हो जाते हैं। उस समय वह (वृहन्) महान् (पवमानः) सब का संचालक परमेश्वर (रजसः) लोकों को (विमानः) रचना करता हुआ (तस्थौ) विद्यमान रहता है और वह (हरितः आविवेश) समस्त जाज्वल्यमान दिशाओं में भी व्यापक रहता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कुत्स ऋषिः। आत्मा देवता। १ उपरिष्टाद् बृहती, २ बृहतीगर्भा अनुष्टुप, ५ भुरिग् अनुष्टुप्, ७ पराबृहती, १० अनुष्टुब् गर्भा बृहती, ११ जगती, १२ पुरोबृहती त्रिष्टुब् गर्भा आर्षी पंक्तिः, १५ भुरिग् बृहती, २१, २३, २५, २९, ६, १४, १९, ३१-३३, ३७, ३८, ४१, ४३ अनुष्टुभः, २२ पुरोष्णिक्, २६ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुब्, ५७ भुरिग् बृहती, ३० भुरिक्, ३९ बृहतीगर्भा त्रिष्टुप, ४२ विराड् गायत्री, ३, ४, ८, ९, १३, १६, १८, २०, २४, २८, २९, ३४, ३५, ३६, ४०, ४४ त्रिष्टुभः। चतुश्चत्वारिंशदृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Jyeshtha Brahma
Meaning
Matarishva there was, entered in the quarters of space, so were all dynamics and divine forces of nature entered in space. Brhad-Brahma was there comprehending all dynamics and spaces, and so was the all-sanctifying Brahma pervasive in all quarters of space. (All were in Brahma, and Brahma was in them.)
Translation
Into the waters the atmospheric wind had entered. The bounties of Nature had entered the floods. The great one stood as the measurer of the space; the purifying wind entered the green vegetation.
Translation
The wind then remains hidden in the atoms of the worldy objects or the soul then remains hidden in material atoms. All the physical forces enter in their respective causes. There stood only one pure refulgent mighty measurer of all the world who pervaded all the regions of the space.
Translation
At the time of dissolution the air enters the subtle atoms of Matter, other forces of Nature resolve themselves into subtle Matter. At that time God alone, the Purifier, and Creator of different worlds, exists pervading all regions.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४०−(अप्सु) म० ३५। अन्तरिक्षे तन्मात्रासु वा (आसीत्) (मातरिश्वा) म० ३९। वायुः सूत्रात्मा वा (प्रविष्टः) (प्रविष्टाः) (देवाः) अन्ये दिव्यपदार्थाः (सलिलानि) समुद्रान्। अगम्यकारणानि (आसन्) (बृहन्) महान् (ह) एव (तस्थौ) स्थितवान् (रजसः) लोकस्य (विमानः) विशेषेण मानकर्ता। विमानतुल्याधारः परमेश्वरः (पवमानः) संशोधकः परमात्मा (हरितः) पूर्वादिदिशाः-निघ० १।६ (आ विवेश) प्रविष्टवान् ॥
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