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  • अथर्ववेद - काण्ड 12/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - भूमिः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - भूमि सूक्त

    स॒त्यं बृ॒हदृ॒तमु॒ग्रं दी॒क्षा तपो॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञः पृ॑थि॒वीं धा॑रयन्ति। सा नो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य॒ पत्न्यु॒रुं लो॒कं पृ॑थि॒वी नः॑ कृणोतु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒त्यम् । बृ॒हत् । ऋ॒तम् । उ॒ग्रम् । दी॒क्षा । तप॑: । ब्रह्म॑ । य॒ज्ञ: । पृ॒थि॒वीम् । धा॒र॒य॒न्ति॒ । सा । न॒: । भू॒तस्य॑ । भव्य॑स्य । पत्नी॑ । उ॒रुम् । लो॒कम् । पृ॒थि॒वी । न॒: । कृ॒णो॒तु॒ ॥१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सत्यम् । बृहत् । ऋतम् । उग्रम् । दीक्षा । तप: । ब्रह्म । यज्ञ: । पृथिवीम् । धारयन्ति । सा । न: । भूतस्य । भव्यस्य । पत्नी । उरुम् । लोकम् । पृथिवी । न: । कृणोतु ॥१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 1; मन्त्र » 1

    पदार्थ -
    (बृहत्) बढ़ा हुआ (सत्यम्) सत्य कर्म, (उग्रम्) उग्र (ऋतम्) सत्यज्ञान, (दीक्षा) दीक्षा [आत्मनिग्रह], (ब्रह्म) ब्रह्मचर्य [वेदाध्ययन, वीर्यनिग्रह रूप] (तपः) तप [व्रतधारण] और (यज्ञः) यज्ञ [देवपूजा, सत्सङ्ग और दान] (पृथिवीम्) पृथिवी को (धारयन्ति) धारण करते हैं। (नः) हमारे (भूतस्य) बीते हुये और (भव्यस्य) होनेवाले [पदार्थ] की (पत्नी) पालन करनेवाली (सा पृथिवी) वह पृथिवी (उरुम्) चौड़ा (लोकम्) स्थान (नः) हमारे लिये (कृणोतु) करे ॥१॥

    भावार्थ -
    सत्यकर्मी, सत्यज्ञानी, जितेन्द्रिय, ईश्वर और विद्वानों से प्रीति करनेवाले चतुर पुरुष पृथिवी पर उन्नति करते हैं। यह नियम भूत और भविष्यत् के लिये समान है ॥१॥ इस सूक्त का नाम “पृथिवीसूक्त” है। इसमें वर्णित धर्म और नीति के पालने से राजा प्रजा और प्रत्येक गृहस्थ और मनुष्यमात्र का कल्याण होता है ॥ इस सूक्त का संस्कृत और भाषा में सविस्तार भाष्य “वैदिक राष्ट्रगीत” नामक श्रीयुत पं० श्रीपाद दामोदर सातवलेकर सुखप्रकाश, अनारकली लाहौर का बनाया बड़ा उत्तम है। पाठकवृन्द उसे भी पढ़ें, मैं उनका बहुत धन्यवाद करता हूँ ॥

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