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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वाचार्यः देवता - ब्रह्मगवी छन्दः - प्राजापत्यानुष्टुप् सूक्तम् - ब्रह्मगवी सूक्त
    1480

    श्रमे॑ण॒ तप॑सा सृ॒ष्टा ब्रह्म॑णा वि॒त्तर्ते श्रि॒ता ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    श्रमे॑ण । तप॑सा । सृ॒ष्टा । ब्रह्म॑णा । वि॒त्ता । ऋ॒ते । श्रि॒ता ॥५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्तर्ते श्रिता ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    श्रमेण । तपसा । सृष्टा । ब्रह्मणा । वित्ता । ऋते । श्रिता ॥५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 12; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

    पदार्थ

    [जो वेदवाणी] (श्रमेण) प्रयत्न के साथ और (तपसा) तप [ब्रह्मचर्य आदि धर्मानुष्ठान] के साथ (सृष्ट्वा) उत्पन्न की गयी, (ब्रह्मणा) ब्रह्मचारी करके (वित्ता) पायी गयी, (ऋते) सत्यज्ञान में (श्रिता) ठहरी हुई है ॥१॥ १−(श्रमेण) प्रयत्नेन। पुरुषार्थेन (तपसा) ब्रह्मचर्यादिधर्मानुष्ठानेन (सृष्ट्वा) उत्पादिता (ब्रह्मणा) ब्राह्मणेन। ब्रह्मचारिणा (वित्ता) लब्धा (ऋते) सत्यज्ञाने (श्रिता) स्थिता ॥

    भावार्थ

    जिस वेदवाणी की प्रवृत्ति से संसार में सब प्राणी आनन्द पाते हैं, उस वेदवाणी को जो कोई अन्यायी राजा प्रचार से रोकता है, उसके राज्य में मूर्खता फैलती है और वह धर्महीन राजा संसार में निर्बल और निर्धन हो जाता है ॥१-६॥ टिप्पणी १−मन्त्र १, २, ३ महर्षि दयानन्दकृत, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदोक्तधर्मविषय पृष्ठ १०१−२ में तथा संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात हैं ॥ १−(श्रमेण) प्रयत्नेन। पुरुषार्थेन (तपसा) ब्रह्मचर्यादिधर्मानुष्ठानेन (सृष्ट्वा) उत्पादिता (ब्रह्मणा) ब्राह्मणेन। ब्रह्मचारिणा (वित्ता) लब्धा (ऋते) सत्यज्ञाने (श्रिता) स्थिता ॥

    टिप्पणी

    टिप्पणी १−मन्त्र १, २, ३ महर्षि दयानन्दकृत, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदोक्तधर्मविषय पृष्ठ १०१−२ में तथा संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात हैं ॥ १−(श्रमेण) प्रयत्नेन। पुरुषार्थेन (तपसा) ब्रह्मचर्यादिधर्मानुष्ठानेन (सृष्ट्वा) उत्पादिता (ब्रह्मणा) ब्राह्मणेन। ब्रह्मचारिणा (वित्ता) लब्धा (ऋते) सत्यज्ञाने (श्रिता) स्थिता ॥

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    विषय

    सत्यं यशः श्री:

    पदार्थ

    १. यह ब्रह्मगवी [वेदधनु] श्(रमेण तपसा सष्टा) = श्रम और तप के द्वारा उत्पन्न होती है। आलसी व आरामपसन्द को यह वेदवाणी प्राप्त नहीं होती। ब्रह्मचारी को परिश्रमी व तपस्वी होना ही चाहिए। यह वेदवाणी (ब्रह्मणा वित्ता) = ज्ञान के द्वारा प्राप्त होती है-समझदार विद्यार्थी ही इसे प्राप्त कर पाता है। (ऋते श्रिता) = यह ऋत में आश्रित है-जहाँ जीवन सूर्य व चन्द्र की भांति व्यवस्थित होता है, वहीं वेदज्ञान भी आश्रय करता है। २. यह ब्रह्मगवी (सत्येन आवृता) = सत्य से आवृत है, (श्रिया प्रावृता) = श्री से प्रावृत-खूब ही आवृत है और (यशसा परीवृता) = यश से चारों दिशाओं में आच्छादित है, अर्थात् ब्रह्मगवी को अपनानेवाला व्यक्ति सत्यवादी, श्रीसम्पन्न व यशस्वी बनता है।

    भावार्थ

    वेदज्ञान को प्राप्त करने के लिए 'श्रम, तप, ब्रह्म-ज्ञान-समझदारी व अस्त-व्यवस्थित जीवन' की आवश्कता है और यह वेदज्ञान हमें 'सत्य, यश व श्री' को प्राप्त कराता है।

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    भाषार्थ

    [ब्रह्मगवी अर्थात् वेदवाणी] (श्रमेण) श्रम द्वारा तथा (तपसा) तप द्वारा (सृष्टा) प्रकट की गई है, (ब्रह्मणा) ब्रह्म के अनुग्रह से (वित्ता) प्राप्त हुई, (ऋते) यथार्थ नियमों पर (श्रिता) आश्रित है।

    टिप्पणी

    [मन्त्र ५ में ब्रह्मगवी पद पठित है। उसी का वर्णन इस मन्त्र में किया गया है। ब्रह्म का अर्थ है सर्वोपरि शक्ति परमेश्वर, और गो का अर्थ है वाणी, यथा गौः वाङ्नाम (निघं० १।११)। अतः ब्रह्मगवी का अर्थ है "ब्रह्म की गौ" अर्थात् वेदवाणी। वेदवाणी ब्रह्म द्वारा प्रकट हुई है, देखो (ऋ० १०।७१।१,३)। वेदवाणी ब्रह्म के श्रम तथा तप द्वारा सृष्ट हुई है। ब्रह्म का श्रम है मानसिक श्रम अर्थात् कामना, यथा "सोऽकामयत (वृहदा० उप० १।२।४)। प्रलयावस्था में ब्रह्म निष्काम होता है। सर्जनावस्था में उसमें सृष्टि के सर्जन की कामना होती है। ब्रह्म के लिये यह कामना ही श्रमरूप है। तपः के सम्बन्ध में कहा है कि "यस्य ज्ञानमयं तपः" अर्थात् ब्रह्म का तपः है ज्ञानमय अर्थात् ज्ञान, सृष्टि किस प्रकार करनी है, एतद्विषयक ज्ञान। प्रथम कामना पैदा हुई कि मैं सृष्टि का सर्जन करू; तत्पश्चात्मालोचन हुआ, ज्ञान प्रकट हुआ कि इस विधि से मैं सृष्टि का संर्जन करूँ। प्राकृतिक सृष्टि की रचना के पश्चात् मनुष्य सृष्टि के काल में ब्रह्मगवी अर्थात् वेदवाणी की सृष्टि हुई ऋषियों के माध्यम से (ऋ० १०।७१।३)। वेदवाणी को ब्रह्मगवी कह कर यह सूचित किया है कि वेदवाणी ब्रह्म की वाणी है, मनुष्य की नहीं। ब्रह्मणा वित्ता = वेदवाणी तपश्चर्या और पुण्यकर्मों के प्रभाव से ब्रह्म की प्रसन्नता तथा अनुग्रह द्वारा ऋषियों को प्राप्त हुई है। ऋते श्रिता = सत्य है ज्ञानरूप; और ऋत है नियमरूप। सृष्टि परमेश्वरीय नियमों तथा व्यवस्था पूर्वक रची गई और चल रही है। वेदवाणी में इन नियमों तथा व्यवस्था का वर्णन है। इन्हीं नियमों तथा व्यवस्था के प्रतिपादन के लिये वेदवाणी की रचना की गई है। अतः वैदिक वर्णनों और सृष्टि के नियमों में परस्पर विरोध नहीं, अपितु ये दोनों परस्पर के यर्थार्थ स्वरूपों के जानने में सहायक हैं]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Divine Cow

    Meaning

    The Divine Cow is the Voice of the Veda, brought into being by Divinity with intense thought and spiritual heat, received by the devotee of Divinity, sustained by the law of truth and righteousness,

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    Subject

    The Brahman’s cow

    Translation

    By toil, by penance (is she) created, acquired by brahman, supported on righteousness.

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    Translation

    [N.B. : The hymn under question inculcates the subject Brahmagavi meaning the cow of Brahmana. This also means broadly the Vani of Brahman, the Supreme Being. If the first meaning is accepted the whole hymn will speak of one subject, the cow of Brahmana. If the second meaning is taken the theme thus, will be many. Vedvani is the vani of Brahman. All Mantras(Verses) may give description of different grains of knowledge.] O men and women I(God) ordain you that you should be united with labour, austerity, the knowledge of the veda and Divinity. You always be engaged in earning wealth and remain active in impartial conduct, the justice.

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    Translation

    Vedic knowledge is mastered through toil and holy fervor, and obtained by a devoted Brahmchari. It rests in God, the Embodiment of Truth.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    टिप्पणी १−मन्त्र १, २, ३ महर्षि दयानन्दकृत, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदोक्तधर्मविषय पृष्ठ १०१−२ में तथा संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात हैं ॥ १−(श्रमेण) प्रयत्नेन। पुरुषार्थेन (तपसा) ब्रह्मचर्यादिधर्मानुष्ठानेन (सृष्ट्वा) उत्पादिता (ब्रह्मणा) ब्राह्मणेन। ब्रह्मचारिणा (वित्ता) लब्धा (ऋते) सत्यज्ञाने (श्रिता) स्थिता ॥

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