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  • अथर्ववेद - काण्ड 13/ सूक्त 1/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
    पदार्थ -

    (वाजिन्) हे बलवान् ! [सेनापति] (उदेहि) ऊँचा हो, (सूनृतावत्) सुनीत से युक्त (इदम्) इस (राष्ट्रम्) राज्य में (प्रविश) प्रवेश कर। (यः) जो (रोहितः) सबका उत्पन्न करनेवाला [परमेश्वर] (अप्सु अन्तः) प्रजाओं के भीतर है, और (यः) जिस [परमेश्वर] ने (इदम्) यह (विश्वम्) विश्व [जगत्] (जजान) उत्पन्न किया है, (सः) वह [परमेश्वर] (सुभृतम्) बड़े पोषण करनेवाले (त्वा) तुझको (राष्ट्राय) राज्य करने के लिये (बिभर्त्तु) धारण करे ॥१॥

    भावार्थ -

    जिस पराक्रमी धर्मात्मा राजा को प्रजागण स्वीकार करें, वह राज्यकार्य्य ग्रहण करके सर्वव्यापक, सर्वजनक, सर्वपोषक परमात्मा के आश्रय से अपना बल बढ़ावे और प्रजा का पालन करे ॥१॥

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