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अथर्ववेद के काण्ड - 13 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 13/ सूक्त 2/ मन्त्र 2
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - रोहितः, आदित्यः, अध्यात्मम् छन्दः - जगती सूक्तम् - अध्यात्म सूक्त
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    दि॒शां प्र॒ज्ञानां॑ स्व॒रय॑न्तम॒र्चिषा॑ सुप॒क्षमा॒शुं प॒तय॑न्तमर्ण॒वे। स्तवा॑म॒ सूर्यं॒ भुव॑नस्य गो॒पां यो र॒श्मिभि॒र्दिश॑ आ॒भाति॒ सर्वाः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दि॒शाम् । प्र॒ऽज्ञाना॑म् । स्व॒रय॑न्तम् । अ॒र्चिषा॑ । सु॒ऽप॒क्षम् । आ॒शुम् । प॒तय॑न्तम् । अ॒र्ण॒वे । स्तवा॑म् । सूर्य॑म् । भुव॑नस्य । गो॒पाम् । य: । र॒श्मिऽभि॑: । दिश॑: । आ॒ऽभाति॑: । सर्वा॑: ॥2.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    दिशां प्रज्ञानां स्वरयन्तमर्चिषा सुपक्षमाशुं पतयन्तमर्णवे। स्तवाम सूर्यं भुवनस्य गोपां यो रश्मिभिर्दिश आभाति सर्वाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    दिशाम् । प्रऽज्ञानाम् । स्वरयन्तम् । अर्चिषा । सुऽपक्षम् । आशुम् । पतयन्तम् । अर्णवे । स्तवाम् । सूर्यम् । भुवनस्य । गोपाम् । य: । रश्मिऽभि: । दिश: । आऽभाति: । सर्वा: ॥2.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 13; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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    पदार्थ -
    (प्रज्ञानाम्) बड़े ज्ञान करानेवाली (दिशाम्) दिशाओं का (अर्चिषा) अपने पूजनीय कर्म से (स्वरयन्तम्) उपदेश करनेवाले (सुपक्षम्) सुन्दर रीति से ग्रहण करनेवाले, (आशुम्) सर्वव्यापक, (अर्णवे) समुद्ररूप संसार में (पतयन्तम्) ऐश्वर्य करनेवाले (भुवनस्य) संसार के (गोपाम्) रक्षक (सूर्यम्) सबके नायक परमेश्वर की (स्तवाम) हम स्तुति करें। (यः) जो [परमेश्वर] (सर्वाः) सब (दिशः) दिशाओं में (रश्मिभिः) अपनी व्याप्तियों से (आभाति) निरन्तर चमकता है ॥२॥

    भावार्थ - मनुष्यों को उचित है कि सर्वव्यापक, सर्वरक्षक परमेश्वर की उपासना कर के अपनी उन्नति करें ॥२॥


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    Meaning -
    We celebrate in song the Sun, protector and sustainer of the world, who, with his rays, irradiates, illumines and enlightens all quarters of space, with his light he proclaims the relative position of the lighted directions, and, like a celestial bird, instantly flies over the infinite oceans of time and space (the self-refulgent lord being omnipresent and eternally existent).


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