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अथर्ववेद के काण्ड - 15 के सूक्त 15 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 15/ मन्त्र 6
    ऋषिः - अध्यात्म अथवा व्रात्य देवता - भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
    47

    तस्य॒व्रात्य॑स्य। योऽस्य॑ चतु॒र्थः प्रा॒णो वि॒भूर्नामा॒यं स पव॑मानः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । च॒तु॒र्थ: । प्रा॒ण: । वि॒ऽभू: । नाम॑ । अ॒यम् । स: । पव॑मान: ॥१५.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तस्यव्रात्यस्य। योऽस्य चतुर्थः प्राणो विभूर्नामायं स पवमानः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तस्य । व्रात्यस्य । य: । अस्य । चतुर्थ: । प्राण: । विऽभू: । नाम । अयम् । स: । पवमान: ॥१५.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 15; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (चतुर्थः) चौथा (प्राणः) प्राण [श्वास] (विभूः) विभू [व्यापक] (नाम) नाम है, (सः) सो (अयं पवमानः) यह पवमान [शोधक वायु] है [अर्थात् वह बताता है कि वायुक्या है और उस का प्रभाव सब जीवों, सब पृथिवी, सूर्य आदि लोकों पर क्या होता है]॥६॥

    भावार्थ

    मन्त्र ९ पर देखो॥६॥

    टिप्पणी

    ६−(विभूः) व्यापकः (पवमानः) शोधकवायुविद्या। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥

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    विषय

    पवमानः, आपः, पशवः, प्रजा:

    पदार्थ

    १. (तस्य व्रात्यस्य) = उस व्रात्य का, (य:) = जो (अस्य) = इसका (चतुर्थः प्राण:) = चतुर्थ प्राण है, वह (विभूः नाम) = विभू नामवाला है-वैभवसम्पन्न-शक्तिशाली। (अयं स:) = यह वह (पवमान:) = वायु है-जीवन को गति देने के द्वारा पवित्र रखनेवाला है। पवित्रता के साथ शक्ति भी देने के कारण यह 'विभू' है। २. (तस्य व्रात्यस्य) = उस व्रात्य का (यः अस्य) = जो इसका (पञ्चमः प्राण:) = पाँचवा प्राण है, (योनिः नाम) = वह योनि नामवाला है-उत्तम सन्तति को जन्म देनेवाला-उत्पत्ति का कारण ताः इमाः आपः वे ये रेत:कण ही हैं। प्राणायाम द्वारा सुरक्षित रेत:कण ही सन्तान को जन्म देने का साधन बनते हैं। ३. (तस्य व्रात्यस्य) = उस व्रात्य का (यः अस्य) = जो इसका (षष्ठः प्राण:) = षष्ठ प्राण है, वह (प्रियः नाम) = प्रिय नामवाला है-प्रीति को उत्पन्न करनेवाला। (ते इमे पशव:) = वे ये पश ही हैं। 'पश्यन्ति इति' जो ज्ञान-प्राप्ति का साधन बनती है, अर्थात ज्ञानेन्द्रियाँ ही यहाँ पशु कही गई हैं। प्राणशक्ति की वृद्धि में इनकी भी वृद्धि है। ये ज्ञान का वर्धन करती हुई प्रीति का कारण बनती हैं। ४. (तस्य व्रात्यस्य) = उस व्रात्य का (यः) = जो इसका (सप्तमः प्राण:) = सातवाँ प्राण है, वह (अपरिमितः नाम) = अपरिमित नामवाला है। यह मनुष्य को बड़ी व्यापक वृत्तिवाला बनाता है। (ताः इमाः प्रजा:) = वे ही ये शक्तियों के प्रादुर्भाव हैं। प्राणायाम से अद्भुत शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है-इसी को यहाँ 'प्रजाः' [जनी प्रादुर्भावे] इस रूप में कहा गया है।

    भावार्थ

    प्राणसाधना से शक्तियों का जन्म होकर जीवन की पवित्रता उत्पन्न होती है। शरीर में सुरक्षित रेत:कण उत्तम सन्तति को जन्म देने का साधन बनाते हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ सशक्त होकर ज्ञानसम्पादन करती हुई प्रीति उत्पन्न करती हैं और सब शक्तियों का प्रादुर्भाव होकर हम अपरिमित लोकों [ब्रह्मलोक] को प्राप्त करनेवाले बनते हैं।

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    भाषार्थ

    (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रतपति तथा प्राणिवर्गों के हितकारी परमेश्वर की [सृष्टि में], (यः) जो (अस्य) इस परमेश्वर का (चतुर्थः प्राणः) चौथाः प्राण है, वह (विभूः नाम) "विभू" नाम वाला है, (अयम्) यह है (सः) वह (पवमानः) वायु।

    टिप्पणी

    [पवमानः= गतिमान तथा पवित्र करने वाला वायु। यह आकाश में व्यापक होने से "विभू" है]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vratya-Prajapati daivatam

    Meaning

    The fourth pranic energy of this Vratya is ‘Vibhu’ by name, and that is Pavamana, cosmic wind, the purifier.

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    Translation

    Of that Vratya; what is his fourth in-breath, called Vibhüh (pervading), that is the purifying wind (or Soma)

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    Translation

    The fourth vital air of that vratya called vibhuh pervading is this Pavamana, the wind.

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    Translation

    His fourth vital breath, called Pervading is this purifying air.

    Footnote

    It is the manifestor of the science of air.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(विभूः) व्यापकः (पवमानः) शोधकवायुविद्या। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥

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