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अथर्ववेद के काण्ड - 15 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 18/ मन्त्र 5
    ऋषिः - अध्यात्म अथवा व्रात्य देवता - साम्नी उष्णिक् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - अध्यात्म प्रकरण सूक्त
    84

    अह्ना॑प्र॒त्यङ्व्रात्यो॒ रात्र्या॒ प्राङ्नमो॒ व्रात्या॑य ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अह्ना॑ । प्र॒त्यङ् । व्रात्य॑: । रात्र्या॑ । प्राङ् । नम॑: । व्रात्या॑य ॥१८.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अह्नाप्रत्यङ्व्रात्यो रात्र्या प्राङ्नमो व्रात्याय ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अह्ना । प्रत्यङ् । व्रात्य: । रात्र्या । प्राङ् । नम: । व्रात्याय ॥१८.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 15; सूक्त » 18; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (व्रात्यः) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] (अह्ना) दिन के साथ (प्रत्यङ्) सामने जानेवाला और (रात्र्या) रात्रि के साथ (प्राङ्) आगे को चलनेवाला है, (व्रात्याय) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] के लिये (नमः) नमस्कार [अर्थात् सत्कार होवे] ॥५॥

    भावार्थ

    जो विद्वान् अतिथि दिन-रात्रि पुरुषार्थ से विघ्नों को हटा कर उन्नति करता और कराता है, सब गृहस्थ लोगउसका निरन्तर आदर सत्कार करें ॥५॥ इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥ इति त्रिंशः प्रपाठकः ॥इति पञ्चदशं काण्डम्॥इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिमश्रीसयाजीरावगायकवाड़ाधिष्ठितबड़ोदेपुरीगतश्रावणमासदक्षिणापरीयाक्षाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेनश्रीपण्डितक्षेमकरणदासत्रिवेदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये पञ्चदशं काण्डंसमाप्तम् ॥

    टिप्पणी

    ५−(अह्ना) दिनेन सह (प्रत्यङ्) प्रति+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्।प्रतिगतः। अभिमुखः (व्रात्यः) सत्यव्रतधारी पुरुषः (रात्र्या) (प्राङ्)प्र+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्। प्रकर्षेण गतः। अग्रगामी (नमः) सत्कारः (व्रात्याय) सत्यव्रतधारिणे विदुषे ॥

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    विषय

    व्रात्याय नमः

    पदार्थ

    १. (तस्य व्रात्यस्य) = उस व्रात्य की-अमृतत्व को प्राप्त करनेवाले तथा प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले व्रात्य की (यत् अस्य दक्षिणम् अक्षि) = जो इसकी दाहिनी आँख है (असौ स आदित्यः) = वही आदित्य है। (यत् अस्य सव्य अक्षि) = जो इसकी बायौं आँख है (असौ स चन्द्रमा:) = वही चन्द्रमा है। दाहिनी आँख ज्ञान का आदान करनेवाली है तो बायीं आँख सबको चन्द्र-शीतल ज्योत्स्ना की भाँति प्रेम से देखनेवाली है। (यः) = जो (अस्य दक्षिण: कर्ण:) = इसका दाहिना कान है (अयं स:) = वह ये (अग्नि:) = अग्नि है, (यः अस्य सव्यः कर्ण:) = जो इसका बायौँ कान है, (अयं सः) = वह यह (पवमानः) = पवमान है। दाहिने कान से यह अग्रगति [उन्नति] की बातों को सुनता है तो बाएँ कान से उन्हीं ज्ञानचर्चाओं को सुनता है जो उसे पवित्र बनानेवाली हैं। २. इसके (अहोरात्रे नासिके) = नासिका-छिद्र अहोरात्र हैं। दाहिना छिद्र अहन् है तो बायाँ रात्रि। दाहिना सूर्यस्वरवाला [दिन] है तो बायाँ चन्द्रस्वरवाला [रात] है। दाहिना प्राणशक्ति का संचार करता है तथा बायाँ अपान के द्वारा दोषों को दूर करता है। इसी दृष्टि से यह दिन-रात प्राणसाधना का ध्यान करता है। इस व्रात्य के (दितिः च अदितिः च शीर्षकपाले) = दिति और अदिति सिर के दो कपाल हैं [Cerebrum, cerebelium] प्रकृति विद्या ही दिति है, आत्मविद्या अदिति । यह विविध प्रकार का ज्ञान प्राप्त करता है। संवत्सरं शिर:-इसका संवत्सर ही सिर है। सम्पूर्ण वर्ष उसी ज्ञान को प्राप्त करने का यह प्रयत्न करता है, जोकि उसके निवास को उत्तम बनाने के लिए आवश्यक है। ३. इस प्रकार अपने जीवन को बनाकर वह व्रात्यः-व्रतमय जीवनवाला पुरुष अह्नः-दिनभर के कार्यों को करने के द्वारा दिन की समाप्ति पर (प्रत्यङ्) = अपने अन्दर आत्मतत्त्व को देखने का प्रयत्न करता है और रात्र्या सम्पूर्ण रात्रि के द्वारा अपने जीवन में शक्ति का संचार करके प्राङ् [प्र अञ्च] अपने कर्तव्य-कर्मों में आगे बढ़ता है। (व्रात्याय नम:) = इस व्रात्य के लिए हम नमस्कार करते हैं।

    भावार्थ

    व्रतमय जीवनवाले पुरुष की दाहिनी आँख ज्ञान का आदान करती है तो बायीं आँख सबको प्रेम से देखती है। इसका दाहिना कान अग्रगति की बातों को सुनता है तो बायाँ कान पवित्रता की। इसके नासिका-छिद्र दिन-रात दीर्घश्वास लेनेवाले होते हैं। यह प्रकृतिविद्या व आत्मविद्या को प्राप्त करता है। कालज्ञ बनता है-सब कार्यों को ठीक स्थान व ठीक समय पर करता है। दिनभर के कार्य के पश्चात् आत्मचिन्तन करता है और रात्रि विश्राम के बाद कर्तव्यों में प्रवृत्त होता है। यह व्रात्य नमस्करणीय है।

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    भाषार्थ

    (अह्ना) दिन में (व्रात्यः) व्रात्य (प्रत्यङ्) पश्चिम की ओर (रात्र्या) रात्रि में (आङ्) पूर्व को ओर गति करता है, (व्रात्याय) व्रात्य के लिए (नमः) नमस्कार हो।

    टिप्पणी

    [मन्त्र ४ और ५ में आदित्य के वर्णन द्वारा, आदित्य का तथा आदित्य के अधिष्ठाता परमेश्वर का ग्रहण होता है। दिन के समय, आदित्य की उपस्थिति में, नासिका के दाहिने छिद्र द्वारा श्वास प्रश्वास चलना चाहिये, और रात्रिकाल में, आदित्य की अनुपस्थिति में, नासिका के बांएं छिद्र द्वारा श्वास प्रश्वास चलना चाहिए। यह स्वास्थ्य का चिह्न है। श्वास-प्रश्वास की इस से विपरीत गति रोग का चिह्न है। इस प्रकार श्वास-प्रश्वास को अहोरात्र कहा है। चूंकि श्वास-प्रश्वास का सम्बन्ध अहोरात्र के साथ है, तथा इन का सम्बन्ध नासिका के दो छिद्रों के भी साथ है, अतः परम्परया१ नासिका के छिद्रों का अहोरात्र के साथ सम्बन्ध, और तदद्वारा आदित्य का सम्बन्ध नासिका के दो छिद्रों के साथ भी, मन्त्र में दर्शाया है। दाएं नासिका छिद्र से चलने वाले श्वास-प्रश्वास को सूर्य स्वर तथा बाएं से चलने वाले को चन्द्र-स्वर कहते हैं। ये स्वर अहोरात्र में कई बार वारीवारी से बदलते रहते है। "हठयोग प्रदीपिका" आदि में इन गतियों का वर्णन है। मन्त्र में संवत्सर को आदित्य का तथा आदित्यस्थ पुरुष का सिर कहा है। आदित्य का संचालन कालाधीन है। यथा "कालेनोदेति सूर्यः काले निविशते पुनः" (अथर्व० १९।५४।१)। काल की इकाई संवत्सर है। क्योंकि प्रतिसंवत्सर की समाप्ति पर ऋतुएं तथा मास आदि पुनः पूर्ववत् चक्कर काटने लगते हैं। जैसे सिर के आश्रय समस्त शरीर अबलम्बित है, वैसे संवत्सर के आश्रय दिन-रात, मास तथा ऋतुएं अवलम्बित है। इसलिये संवत्सर को व्रात्य अर्थात आदित्य का, या आदित्यस्थ पुरुष का "शिर" कहा है। इस संवत्सर के दो बिभाग हैं, उत्तरायण तथा दक्षिणायन। ये दो मानो संवत्सर रूपी शिरः (सिर) के दो कपाल है, खोपड़ी के भी दो खण्ड है। इन में से उत्तरायण-भाग या खण्ड को अदिति कहा है, और दक्षिणायन-भाग या खण्ड को दिति कहा है। अदिति का सम्बन्ध है आदित्य से, और दिति का दैत्य से। उत्तरायण का सूर्य आदित्य है, और दक्षिणायन का सूर्य दैत्य है जो कि उत्तर भाग के ताप और प्रकाश को हर लेता है। दक्षिण भाग को असुर-भाग भी कहते हैं, तथा उत्तरभाग को देवभाग। दिन के समय व्रात्य-आदित्य पूर्व से पश्चिम की ओर गति करता है, और रात्रि के समय पश्चिम से पूर्व की ओर गति करता हुआ प्रातः काल पुनः पूर्व में उदित होता है, व्रात-आदित्य रथ है, आदित्य पुरुष का। मानो आदित्य-पुरुष, आदित्य-रथ द्वारा दिन-रात गति करता रहता है। व्रात्य-आदित्य की गति द्वारा व्रात्य-आदित्य-पुरुष की गति का औपचारिक वर्णन अभिप्रेत है, इसलिये व्रतपति तथा प्राणिवर्गों के हितकारी आदित्य-पुरुष को "नमः" द्वारा नमस्कार किया है। "योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्। ओ३म् खं व्रह्म" (यजु० ४०।१८)। मन्त्र में जड़-आदित्य को नमस्कार नहीं किया।] [१. नासिका के दो छिद्रों का श्वास-प्रश्वास के साथ सम्बन्ध, श्वास प्रश्वास का अहोरात्र के साथ, तथा अहोरात्र का व्रात्य-आदित्य के साथ, तथा व्रात्य-आदित्य का आदित्य-पुरुष के साथ सम्बन्ध है। "सूर्य व्रतपते व्रतं चरिष्यामि" (गोभिल २।१०।१६) द्वारा सूर्य भी व्रतपति होने से व्रात्य है।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Vratya-Prajapati daivatam

    Meaning

    By day, Vratya goes westwards, by night, it goes east ward. All homage to Vratya.

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    Translation

    During the day the Vrátya forces the west, during night, the east. Homage be to the Vratya.

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    Translation

    This Vratya keeps his face in the west at day and keeps his-Face east-word at night and let there be all praises for Vratya.

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    Translation

    The learned self-abnegating guest is worthy of adoration by everyone in the days, and of special homage at night. Worship to such a guest.

    Footnote

    A learned sacrificing guest works for the good of humanity and at night is absorbed In the contemplation. Such a guest should be adored and worshipped by all.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(अह्ना) दिनेन सह (प्रत्यङ्) प्रति+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्।प्रतिगतः। अभिमुखः (व्रात्यः) सत्यव्रतधारी पुरुषः (रात्र्या) (प्राङ्)प्र+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्। प्रकर्षेण गतः। अग्रगामी (नमः) सत्कारः (व्रात्याय) सत्यव्रतधारिणे विदुषे ॥

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