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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 2/ मन्त्र 1
    ऋषिः - यम, मन्त्रोक्त देवता - अनुष्टुप् छन्दः - अथर्वा सूक्तम् - पितृमेध सूक्त
    195

    य॒माय॒ सोमः॑पवते य॒माय॑ क्रियते ह॒विः। य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो॒ अरं॑कृतः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य॒माय॑ । सोम॑: । प॒व॒ते॒ । य॒माय॑ । क्रि॒य॒ते॒ । ह॒वि: । य॒मम् । ह॒ । य॒ज्ञ: । ग॒च्छ॒ति॒ । अ॒ग्निऽदू॑त: । अर॑म्ऽकृत: ॥२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यमाय सोमःपवते यमाय क्रियते हविः। यमं ह यज्ञो गच्छत्यग्निदूतो अरंकृतः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यमाय । सोम: । पवते । यमाय । क्रियते । हवि: । यमम् । ह । यज्ञ: । गच्छति । अग्निऽदूत: । अरम्ऽकृत: ॥२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 18; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    ईश्वर की भक्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (यमाय) यम [सर्वनियन्ता परमात्मा] के लिये (सोमः) ऐश्वर्यवान् [जीवात्मा] (पवते) अपने कोशुद्ध करता है, (यमाय) यम [न्यायकारी ईश्वर] के लिये (हविः) भक्तिदान (क्रियते)किया जाता है (यमम्) यम [परमेश्वर] को (ह) ही (यज्ञः) संगतिवाला संसार (गच्छति)चलता है, [जैसे] (अरंकृतः) पर्याप्त किया हुआ (अग्निदूतः) अग्नि से तपाया हुआ [जल आदि रस ऊपर जाता है] ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य शुद्ध अन्तःकरणसे ईश्वरभक्ति करके ऐश्वर्यवान् होवें। वह परमात्मा इतना बड़ा है कि यह सबसंसार उसी की आज्ञा में चलता है, जैसे अग्नि के पूरे ताप से भाप ऊँचा उठता है॥१॥मन्त्र १-३ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं−१०।१४।१३, १५, १४। ऋग्वेदपाठ महर्षिदयानन्दकृतसंस्कारविधि अन्त्येष्टिप्रकरण में उद्धृत है ॥

    टिप्पणी

    १−(यमाय)सर्वनियामकाय। न्यायकारिणे परमात्मने (सोमः) ऐश्वर्ययुक्तो जीवात्मा (पवते)आत्मानं शोधयति (यमाय) (क्रियते) अनुष्ठीयते (हविः) हु दानादानादनेषु-इसि।भक्तिदानम् (यमम्) परमेश्वरम् (ह) एव (यज्ञः) संयोगं प्राप्तः संसारः (गच्छति)प्राप्नोति (अग्निदूतः) टुदु उपतापे-क्त, दीर्घः। अग्निना परितापिता जलादिरसोयथा (अरंकृतः) पर्याप्तीकृतः ॥

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    विषय

    प्रभु-प्राप्ति के साधन

    पदार्थ

    १. (यमाय) = उस सर्वनियन्ता प्रभु की प्रासि के लिए (सोमः पवते) = [पूयते] सोम पवित्र किया जाता है। शरीर में सोम को-वीर्यशक्ति को वासना से मलिन व विनाश होने से बचाने पर ज्ञानाग्नि की दीप्ति के द्वारा प्रभुदर्शन होता है। (यमाय) = इस प्रभु की प्राप्ति के लिए ही (हवि:) = दानपूर्वक अदन-यज्ञशेष का सेवन (क्रियते) = किया जाता है। २. (यमम्) = उस सर्वनियन्ता प्रभु को (ह) = निश्चय से (यज्ञः) = देवपूजक, देव के साथ (संगतिकरण) = [मेल]-वाला, देव के प्रति अपना अर्पण करनेवाला व्यक्ति (गच्छति) = प्राप्त होता है। जो व्यक्ति (अग्निदूत:) = अग्निरूप दूतवाला है-उस अग्रणी प्रभु से ज्ञान के व स्वकर्तव्यों के संदेश को सुनता है तो (अरंकृतः) = सब दिव्यगुणों से अलंकृत जीवनवाला बनता है।

    भावार्थ

    प्रभु-प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि [१] हम शरीर में सोम का रक्षण करें, [२] दानपूर्वक अदन की वृत्तिवाले हों [३] प्रभुपूजक-प्रभुमेल व प्रभु के प्रति अर्पण की वृत्तिवाले हों, [४] प्रभु से वेद में उपदिष्ट स्वकर्तव्यों के सन्देश को सुनें, [५] जीवन को सद्गुणों से अलंकृत करें।

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    भाषार्थ

    (यमाय) जगन्नियामक परमेश्वर के लिये (सोमः) गौओं से दूध (पवते) क्षरित होता है। (यमाय) जगन्नियामक के लिये (हविः) हवि (क्रियते) तैय्यार की जाती है। (अग्निदूतः) अग्नि जिस यज्ञकार्य का साधक है, वह (यज्ञः) यज्ञ, (अरंकृतः) अलंकृत किया गया, (ह) निश्चय से (यमम्) जगन्नियामक को (गच्छति) पहुंचता है।

    टिप्पणी

    [सोमः= "सोमो दुग्धाभिरक्षाः" (ऋ० ९।१०७।९) में कहा है कि जब गौएं दुही जाती हैं, तब उनसे सोम क्षरित होता है, प्रवाहित होता है। अतः सोम का अभिप्राय है "दुग्ध"। अग्निहोत्र में दुग्धाहुति भी अभिमत है। तथा यज्ञ का साधन घृत भी दुग्ध से उत्पन्न होता है। इसलिये सोम द्वारा "दुग्ध और घृत" दोनों अभिमत हैं। देखो मन्त्र संख्या (६४); तथा "पयसा सर्वकामस्य" (श्रौतवैतानसूत्र ८।५ [४३]९)]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory, Freedom and Security

    Meaning

    For Yama, lord ordainer of the cosmic order, is Soma distilled and sanctified, and for Yama it flows. For Yama, the yajna havi is prepared. And to Yama goes the holy soma-yajna with all its beauty and power conducted by the holy fire, divine messenger between the yajamana and the air, sun and the lord ordainer of life and human karma.

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    Subject

    Yama

    Translation

    For Yama the soma purifies itself; for Yama is made the oblation; to Yama goes the sacrifice, messengered by Agni, made satisfactory.

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    Translation

    Soma, the juice of herbs is prepared for yama, the air or the sun, oblations are offered for the air, the oblational substance carried by the fire goes to the air or to the sun.

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    Translation

    Soul purifies itself for the attainment of God. To God is homage paid. To God sacrifice adorned with Vedic verses and heralded by fire goes.

    Footnote

    See Rig,, 10-14-13.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(यमाय)सर्वनियामकाय। न्यायकारिणे परमात्मने (सोमः) ऐश्वर्ययुक्तो जीवात्मा (पवते)आत्मानं शोधयति (यमाय) (क्रियते) अनुष्ठीयते (हविः) हु दानादानादनेषु-इसि।भक्तिदानम् (यमम्) परमेश्वरम् (ह) एव (यज्ञः) संयोगं प्राप्तः संसारः (गच्छति)प्राप्नोति (अग्निदूतः) टुदु उपतापे-क्त, दीर्घः। अग्निना परितापिता जलादिरसोयथा (अरंकृतः) पर्याप्तीकृतः ॥

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