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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 10 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 19/ सूक्त 10/ मन्त्र 10
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - मन्त्रोक्ताः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शान्ति सूक्त
    26

    शं नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता त्राय॑माणः॒ शं नो॑ भवन्तू॒षसो॑ विभा॒तीः। शं नः॑ प॒र्जन्यो॑ भवतु प्र॒जाभ्यः॒ शं नः॒ क्षेत्र॑स्य॒ पति॑रस्तु श॒म्भुः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    शम्। नः॒।दे॒वः। स॒वि॒ता। त्राय॑माणः। शम्। नः॒। भ॒व॒न्तु॒। उ॒षसः॑। वि॒ऽभा॒तीः। शम्। नः॒। प॒र्जन्यः॑। भ॒व॒तु॒। प्र॒ऽजाभ्यः॑। शम्। नः॒। क्षेत्र॑स्य। पतिः॑। अ॒स्तु॒। श॒म्ऽभुः ॥१०.१०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः। शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    शम्। नः।देवः। सविता। त्रायमाणः। शम्। नः। भवन्तु। उषसः। विऽभातीः। शम्। नः। पर्जन्यः। भवतु। प्रऽजाभ्यः। शम्। नः। क्षेत्रस्य। पतिः। अस्तु। शम्ऽभुः ॥१०.१०॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 10; मन्त्र » 10
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    पदार्थ -
    (देवः) प्रकाशमान (सविता) लोकों का चलानेवाला सूर्य (त्रायमाणः) रक्षा करता हुआ (नः) हमें (शम्) सुखदायक हो, (विभातीः) जगमगाती हुई (उषसः) प्रभात वेलाएँ (नः) हमें (शम्) सुखदायक (भवन्तु) हों। (पर्जन्य) सींचनेवाला मेघ (नः) हमें और (प्रजाभ्यः) प्रजाओं के लिये (शम्) सुखदायक (भवतु) हो, (शम्भुः) मङ्गलदाता (क्षेत्रस्य) खेत का (पतिः) स्वामी (नः) हमें (शम्) सुखदायक (अस्तु) हो ॥१०॥

    भावार्थ - मनुष्य सूर्य के ताप की अनुकूलता का और मेघ से वृष्टि आदि का विचार करके खेती आदि व्यवहार करें और अन्न आदि की वृद्धि से सुखी होवें ॥१०॥


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    Meaning -
    May the saviour of life giver Savita, self- refulgent sivine Sun, bless us with peace. May the radiant dawns bring us peace. May the cloud of showers be peaceful and inspiring to the people. And the master farmer of the field, harbinger of security and peace, bring us peace and prosparity.


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