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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 12 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 12/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - उषाः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सुवीर सूक्त
    81

    उ॒षा अप॒ स्वसु॒स्तमः॒ सं व॑र्तयति वर्त॒निं सु॑जा॒तता॑। अ॒या वाजं॑ दे॒वहि॑तं सनेम॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒षाः। अप॑। स्वसुः॑। तमः॑। सम्। व॒र्त॒य॒ति॒। व॒र्त॒निम्। सु॒ऽजा॒तता॑। अ॒या। वाज॑म्। दे॒वऽहि॑तम्। स॒ने॒म॒। मदे॑म। श॒तऽहि॑माः। सु॒ऽवीराः॑ ॥१२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उषा अप स्वसुस्तमः सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता। अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उषाः। अप। स्वसुः। तमः। सम्। वर्तयति। वर्तनिम्। सुऽजातता। अया। वाजम्। देवऽहितम्। सनेम। मदेम। शतऽहिमाः। सुऽवीराः ॥१२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 12; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (उषाः) प्रभात वेला (स्वसुः) [अपनी] बहिन [रात्रि] के (तमः) अन्धकार को (अप=अपवर्तयति) हटा देती है, और (सुजातता) [अपनी] भलमनसाहत से (वर्तनिम्) [उसके लिये] मार्ग (सम्) मिलकर (वर्तयति) बता देती है। (अया) इस [नीति] से (शतहिमाः) सौ वर्ष जीवते हुए और (सुवीराः) सुन्दर वीरों को रखते हुए हम (देवहितम्) विद्वानों के हितकारी (वाजम्) विज्ञान को (सनेम) बाँटें और (मदेम) आनन्द करें ॥१॥

    भावार्थ

    पृथिवी की गोलाई के कारण आधे भूगोल में एक साथ प्रकाश करने से उषा रात्रि को हटाकर जितनी आगे बढ़ती है, उतना ही स्थान रात्रि को पीछे से देती चलती है और दोनों प्रीतिपूर्वक मिलकर जगत् का उपकार करती हैं, इसी प्रकार सब मनुष्य ज्ञान के प्रचार से परस्पर उपकार करके बड़े-बड़े धैर्यवान् बलवानों सहित पूर्ण आयु भोगें ॥१॥

    टिप्पणी

    इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध ऋग्वेद में है १०।१७२।४। और उत्तरार्द्ध ऋग्० ६।१७।१५ और सामवेद पू० ५।७।७ ॥ १−(उषाः) प्रभातवेला (अप) अपवर्तयति। निवारयति (स्वसुः) भगिन्या रात्रेः (तमः) अन्धकारम् (सम्) परस्परम् (वर्तयति) प्रवर्तयति। प्रसारयति (वर्तनिम्) वृतेश्च। उ० २।—१०६। वृतु वर्तने-अनि। मार्गम् (सुजातता) सुजाततया। श्रेष्ठगुणवत्वेन (अया) अनया नीत्या (वाजम्) विज्ञानम् (देवहितम्) विद्वद्भ्यो हितकरम् (सनेम) विभजेम (मदेम) आनन्देम (शतहिमाः) शतवर्षजीविनः (सुवीराः) उत्तमवीरयुक्ताः ॥

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    विषय

    मार्गदर्शिका उषा

    पदार्थ

    १. (उषा:) = उषा (स्वसुः) = अपनी बहिन के समान इस रात्रि के (तमः) = अन्धकार को (अप) [वर्तयति] = दूर कर देती है और (सुजातता) = अपने उत्तम प्रादुर्भाव से (वर्तनिम्) = मार्ग को (संवर्तयति) = सम्यक् प्रवृत्त करती है-यह मार्ग दिखलाती है। २. मार्गों को दिखलाती हुई (अया) = [अनया] इस उषा से (देवहितम्) = देवों के अन्दर स्थापित किये गये (वाजम्) = बल को (सनेम) = प्राप्त करें। हमें शक्ति प्राप्त हो और यह देवों की शक्ति हो, न कि असुरों की [शक्तिः परेषां परिरक्षणाय, न तु परिपीडनाय]। इसप्रकार शक्ति को प्राप्त करके (सुवीरा:) = उत्तम वीर सन्तानोंवाले होते हुए (शतहिमा:) = शतवर्षपर्यन्त (मदेम) = आनन्द का अनुभव करें।

    भावार्थ

    उषा से मार्ग का ज्ञान प्राप्त करते हुए हम उस मार्ग का आक्रमण करें। इसप्रकार शान्ति प्राप्त करके, उत्तम वीर सन्तानोंवाले हम शतवर्षपर्यन्त आनन्दयुक्त जीवनवाले हों। यह शक्तिशाली व्यक्ति युद्ध में पराजित न होनेवाला 'अप्रतिरथ' [a match-less warrior] बनता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है।

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    भाषार्थ

    (उषाः) ज्योतिर्मयी प्रज्ञा (सुजातता) निज उत्तम उत्पत्ति के कारण, (स्वसुः) निज बहिन ज्योतिर्हीन रात्री के (तमः) अज्ञानान्धकार को, तथा (वर्तनिम्) उसके वर्ताव= व्यवहार को (अप संवर्तयति) हटा देती है। (अया) इस प्रज्ञा द्वारा हम (देवहितम्) देव बनने के लिए हितकर (वाजम्) बल (सनेम) प्राप्त करते हैं। और (सुवीराः) श्रेष्ठ धर्मवीर होकर (शतहिमाः) सौ वर्षों तक (मदेम) प्रसन्न रहते हैं।

    टिप्पणी

    [वाजः= बलनाम (निघं० २.९)। सुजातता=सुजाततया। उषा और उसकी स्वसा (बहिन) रात्री के वर्णन द्वारा, योगी को प्राप्त प्राथमिक ज्योति, और उस से पूर्व की ज्योतिर्हीन अवस्था का वर्णन हुआ है। जैसे उषा के आविर्भाव में रात्रि का अन्धकार, और रात्रि के वर्तन= व्यवहार दूर हो जाते हैं, वैसे ही योगाभ्यासी में जब ज्योतिर्मयी चित्तवृत्ति का आविर्भाव हो जाता है, तब उसकी राजसिक और तामसिक वृत्तियाँ और उनके व्यवहार लीन होने लगते हैं। इससे योगी को बल और उत्साह प्राप्त होकर उसके जीवन में प्रसन्नता व्याप्त हो जाती है। सूक्त ११, मन्त्र ६ के पश्चात् सूक्त १२ का मन्त्र है, इसलिए इसकी आध्यात्मिक व्याख्या है।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Shanti

    Meaning

    Usha, the dawn of light, removes the darkness of her sister night and opens up the path of day light by its noble rise every morning through the day-night succession. By this continuous rise of the dawn every morning, let us achieve food, energy and victory brought in by Divinity and enjoy life for a full hundred years with our youthful generations worthy of the brave.

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    Subject

    To Ushas (dawn)

    Translation

    The dawn drives away the gloom of her sister (the night) and through her noble birth illumines the pathway well. Through her, may we win the treasure, beneficial for the enlightened ones; blessed with brave progeny, may we revel through a hundred winters. (Rg.X.172.4; VI.17.15)

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    Translation

    Dawn drives away the darkness of. Svasuh, the night and through its excellent emergence makes the night retrace its path May through it we attain the wealth which is entrusted for the sake of Devas, the Yajna and learned ones and enjoy happiness for hundred autumns with our children and heroics.

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    Translation

    The dawn, driving away the darkness of the self-slipping away night, and thus being born well, sets the world on its path of duty. Let us get strength and vigour by her and thus being strong and brave, enjoy life of hundred years.

    Footnote

    cf. Rig, 6.17.15 and Rig, 10.172.4. To attain longevity of life, one should be up and doing at dawn and bathe in its life prolonging and invigorating rays.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध ऋग्वेद में है १०।१७२।४। और उत्तरार्द्ध ऋग्० ६।१७।१५ और सामवेद पू० ५।७।७ ॥ १−(उषाः) प्रभातवेला (अप) अपवर्तयति। निवारयति (स्वसुः) भगिन्या रात्रेः (तमः) अन्धकारम् (सम्) परस्परम् (वर्तयति) प्रवर्तयति। प्रसारयति (वर्तनिम्) वृतेश्च। उ० २।—१०६। वृतु वर्तने-अनि। मार्गम् (सुजातता) सुजाततया। श्रेष्ठगुणवत्वेन (अया) अनया नीत्या (वाजम्) विज्ञानम् (देवहितम्) विद्वद्भ्यो हितकरम् (सनेम) विभजेम (मदेम) आनन्देम (शतहिमाः) शतवर्षजीविनः (सुवीराः) उत्तमवीरयुक्ताः ॥

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