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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 17 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 17/ मन्त्र 5
    ऋषिः - अथर्वा देवता - मन्त्रोक्ताः छन्दः - अतिजगती सूक्तम् - सुरक्षा सूक्त
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    सूर्यो॑ मा॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॑ प्र॒तीच्या॑ दि॒शः पा॑तु॒ तस्मि॑न्क्रमे॒ तस्मि॑ञ्छ्रये॒ तां पुरं॒ प्रैमि॑। स मा॑ रक्षतु॒ स मा॑ गोपायतु॒ तस्मा॑ आ॒त्मानं॒ परि॑ ददे॒ स्वाहा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सूर्यः॑। मा॒। द्यावा॑पृथि॒वीभ्या॑म्। प्र॒तीच्याः॑। दि॒शः। पा॒तु॒। तस्मि॑न्। क्र॒मे॒। तस्मि॑न्। श्र॒ये॒। ताम्। पुर॑म्। प्र। ए॒मि॒। सः। मा॒। र॒क्ष॒तु॒। सः। मा॒। गो॒पा॒य॒तु॒। तस्मै॑। आ॒त्मान॑म्। परि॑। द॒दे॒। स्वाहा॑ ॥१७.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सूर्यो मा द्यावापृथिवीभ्यां प्रतीच्या दिशः पातु तस्मिन्क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि। स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाहा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सूर्यः। मा। द्यावापृथिवीभ्याम्। प्रतीच्याः। दिशः। पातु। तस्मिन्। क्रमे। तस्मिन्। श्रये। ताम्। पुरम्। प्र। एमि। सः। मा। रक्षतु। सः। मा। गोपायतु। तस्मै। आत्मानम्। परि। ददे। स्वाहा ॥१७.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 17; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    रक्षा करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (सूर्यः) सर्वप्रेरक परमात्मा (द्यावापृथिवीभ्याम्) दोनों सूर्य और पृथिवी के साथ (मा) मुझे (प्रतीच्याः) पश्चिम वा पीछेवाली (दिशः) दिशा से (पातु) बचावे, (तस्मिन्) उसमें..... [म०१] ॥५॥

    भावार्थ

    मन्त्र १ के समान है ॥५॥

    टिप्पणी

    ५−(सूर्य) सुवतेः क्यप्। सर्वप्रेरकः परमेश्वरः। (द्यावापृथिवीभ्याम्)। सूर्यभूमिभ्याम् (प्रतीच्याः) पश्चिमायाः। पश्चाद् भवायाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    द्यावापृथिवी के साथ 'सूर्य' पश्चिम में

    पदार्थ

    १. [सरति इति] (सूर्य:) = निरन्तर गतिवाले दीप्त प्रभु [ब्रह्म सर्वसमं ज्योतिः] (द्यावा पृथिवीभ्याम्) = द्युलोक व पृथिवीलोक के साथ-दीप्त मस्तिष्क [धुलोक] व दृढ़ शरीर [पृथिवी] के साथ (प्रतीच्याः दिश:) = पश्चिम दिशा से (मा) = मुझे (पातु) = रक्षित करें। २. (तस्मिन् क्रमे) = उन्हीं में मैं गति करूँ। शेष पूर्ववत्।

    भावार्थ

    पश्चिम में मैं सूर्यरूप प्रभु को उपस्थित देखू। वे मुझे दीप्त मस्तिष्क व दृढ़ शरीर प्राप्त कराते हैं। उन्हीं में मैं गति करूँ।

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    भाषार्थ

    (द्यावापृथिवीभ्याम्) द्युलोक और पृथिवीलोक के साथ वर्तमान (सूर्यः) सूर्य में स्थित परमेश्वर, सूर्यास्तकाल में (प्रतीच्याः दिशः) पश्चिम दिशा से (मा) मेरी (पातु) रक्षा करे। तस्मिन्....पूर्ववत्।

    टिप्पणी

    [सूर्यः= षू प्रेरणे। वेदों में परमात्मा की सूर्य में स्थिति का वर्णन हुआ है। यथा—“योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्। ओ३म् खं ब्रह्म” (यजुः ४०.१७)। सौर परिवार के ग्रह आदि का प्रेरक और शक्तिदाता सूर्य है, और सूर्य में शक्तिप्रदाता परमेश्वर है। सूर्य का अस्तगमन जब पश्चिम में होता है, तब स्वरक्षा निमित्त सूर्यों के सूर्य परमेश्वर से रक्षा की प्रार्थना की गई है।]

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    विषय

    रक्षा की प्रार्थना।

    भावार्थ

    (सूर्यः) सूर्य (मा) मुझे (प्रतीच्याः दिशः) प्रतीची, पश्चिम दिशा से (द्यावापृथिव्याम्) द्यौः और पृथिवी द्वारा (पातु) रक्षा करें। शेष पूर्ववत्।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता देवताः । १-४ जगत्यः। ५, ७, १० अतिजगत्यः, ६ भुरिक्, ९ पञ्चपदा अति शक्वरी। दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Protection and Security

    Meaning

    May the Surya, light of life, with heaven and earth, protect and promote me from the western direction. Therein I advance. Therein I rest for my mainstay. That same light and illumination I attain to. May that guard me. May that save me. To that I surrender myself life and soul in truth of word and deed.

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    Translation

    May Sun (god), along with the heaven and earth, guard me from the western quarter. I step in Him; in Him I take Shelter; to that castle do I go. May He defend me; may He protect me. To Him I totally surrender myself. Svaha.

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    Translation

    Surya, the All-impelling God guard me with heavenly region and earth from west......... soul to Him......... appreciation.

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    Translation

    May the All-shining God protect me, through the heavens and the earth from the west or the back side. I .... so on.

    Footnote

    Marutas: strong winds, vital breaths as well brave persons, cf. Atharva, 3.27. 1:6, and 12.3.24.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ५−(सूर्य) सुवतेः क्यप्। सर्वप्रेरकः परमेश्वरः। (द्यावापृथिवीभ्याम्)। सूर्यभूमिभ्याम् (प्रतीच्याः) पश्चिमायाः। पश्चाद् भवायाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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