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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 27 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 1
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - त्रिवृत् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सुरक्षा सूक्त
    83

    गोभि॑ष्ट्वा पात्वृष॒भो वृषा॑ त्वा पातु वा॒जिभिः॑। वा॒युष्ट्वा॒ ब्रह्म॑णा पा॒त्विन्द्र॑स्त्वा पात्विन्द्रि॒यैः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    गोभिः॑। त्वा॒। पा॒तु॒। ऋ॒ष॒भः। वृषा॑। त्वा॒। पा॒तु॒। वा॒जिऽभिः॑। वा॒युः। त्वा॒। ब्रह्म॑णा। पा॒तु॒। इन्द्रः॑। त्वा॒। पा॒तु॒। इ॒न्द्रि॒यैः ॥२७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    गोभिष्ट्वा पात्वृषभो वृषा त्वा पातु वाजिभिः। वायुष्ट्वा ब्रह्मणा पात्विन्द्रस्त्वा पात्विन्द्रियैः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    गोभिः। त्वा। पातु। ऋषभः। वृषा। त्वा। पातु। वाजिऽभिः। वायुः। त्वा। ब्रह्मणा। पातु। इन्द्रः। त्वा। पातु। इन्द्रियैः ॥२७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 27; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    आशीर्वाद देने का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे मनुष्य !] (ऋषभः) सर्वदर्शक परमेश्वर (गोभिः) गौओं के साथ (त्वा) तुझे (पातु) बचावे, (वृषा) वीर्यवान् [परमेश्वर] (वाजिभिः) फुरतीले घोड़ों के साथ (त्वा) तुझे (पातु) बचावे। (वायुः) सर्वत्रगामी [परमेश्वर] (ब्रह्मणा) बढ़ते हुए अन्न के साथ (त्वा) तुझे (पातु) बचावे, (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् [जगदीश्वर] (इन्द्रियैः) परम ऐश्वर्य के व्यवहारों के साथ (त्वा) तुझे (पातु) बचावे ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमात्मा के श्रेष्ठ गुणों का चिन्तन करके अनेक पुरुषार्थों के साथ रक्षा करे ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(गोभिः) धेनुभिः (त्वा) (पातु) (ऋषभः) ऋषिवृषिभ्यां कित्। उ०३।१२३। ऋष गतौ दर्शने च-अभच्, कित्। ऋषिर्दर्शनात्-निरु०२।११। सर्वदर्शकः परमेश्वरः (वृषा) वीर्यवान् (त्वा) (पातु) (वाजिभिः) वेगवद्भिरश्वैः (वायुः) सर्वत्रगामी परमेश्वरः (त्वा) (ब्रह्मणा) प्रवृद्धेनान्नेन-निघ०२।७ (पातु) (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान्। जगदीश्वरः (पातु) (इन्द्रियैः) परमैश्वर्यव्यवहारैः ॥

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    विषय

    ऋषभ, वृषा, वायु, इन्द्र

    पदार्थ

    १. [ऋष दर्शने] (ऋषभ:) = वह सर्वद्रष्टा (प्रभुत्वा) = तुझे (गोभि:) = उत्तम गौवों के द्वारा (पातु) = रक्षित करे। इन गौओं का दूध हमारी बुद्धियों का वर्धन करके हमारे ज्ञान को भी बढ़ाता है। (वृषा) = वह शक्तिशाली प्रभु (त्वा) = तुझे (वाजिभिः) = उत्तम घोड़ों के द्वारा (पातु) = रक्षित करे। ये घोड़े उचित व्यायामादि का साधन बनते हुए हमारी बल-वृद्धि का हेतु होते हैं। २. (वायु:) = [वा गति-ज्ञान] ज्ञान के द्वारा सब बुराइयों का विध्वंस करनेवाला वह (प्रभुत्वा) = तुझे (ब्रह्मणा) = ज्ञान के द्वारा (पातु) = रक्षित करे। (इन्द्रः) = वह सर्वशक्तिमान् परमैश्वर्यशाली (प्रभुत्वा) = तुझे (इन्द्रियैः) = उत्तम इन्द्रियों के द्वारा (पातु) = रक्षित करे।

    भावार्थ

    प्रभु हमें उत्तम गौवें व घोड़े, ज्ञान तथा इन्द्रियों को प्राप्त कराके सुरक्षित करें।

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    भाषार्थ

    हे मनुष्य! (ऋषभः) सर्वगत श्रेष्ठ परमेश्वर (गोभिः) वेदवाणियों द्वारा, अर्थात् उनके ज्ञान के प्रदान द्वारा (त्वा) तुझे (पातु) सुरक्षित करे। (वृषा) सुख-शान्ति की वर्षा करने वाला मन (वाजिभिः) शक्तिशाली इन्द्रियाश्वों द्वारा (त्वा) तुझे (पातु) सुरक्षित करे। (वायुः) प्राणायाम (ब्रह्मणा) ब्रह्मसाक्षात्कार द्वारा (त्वा) तुझे (पातु) सुरक्षित करे। (इन्द्रः) ऐश्वर्यसम्पन्न जीवात्मा (इन्द्रियैः) निज ऐन्द्रियिक अर्थात् आत्मिकशक्तियों द्वारा (त्वा) तुझे (पातु) सुरक्षित करे।

    टिप्पणी

    [गोभिः=गौः वाङ्नाम (निघं० १.११); तथा स्तोतृनाम (निघं० ३.१६)। ऋषभः=“ऋषति गच्छतीति। श्रेष्ठपर्यायो वा” (उणा० ३.१२३)। वृषा= सत्त्वगुणप्रधान मन, जो कि सुखों की वर्षा करता, और इन्द्रियाश्वों को नियन्त्रित कर रक्षा करता है। वायुः= इस पद द्वारा प्राणायाम का कथन किया है, जो कि यम-नियम आसन प्राणायाम आदि आठ योगाङ्गों में चतुर्थ अंग है। प्राणायाम के कारण प्रकाश का आवरण क्षीण होता है। “ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्” (योग० २.५२), तथा धारणा ध्यान समाधि के लिए मन में योग्यता पैदा हो जाती है, “धारणासु च योग्यता मनसः” (योग० २.५३), अन्ततः ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है। इन्द्रः=जीवात्मा। शरीर में जीवात्मा शरीर मन इन्द्रियादि में ऐश्वर्य का उत्पादक है। आत्मा के रहते शरीर ऐश्वर्यसम्पन्न रहता है। आत्मा से हीन हो जाने पर शरीर निश्चेष्ट और शोभा रहित हो जाता है। इन्द्रियैः= इन्द्र अर्थात् जीवात्मा की निज शक्तियाँ।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Protection

    Meaning

    Let ‘ Vrshabha’, generous Divinity, protect you with Vedic verses, let ‘Vrsha’, the abundant mind, protect and advance you with dynamic thoughts and emotions, let ‘Vayu’, pranic energy, protect you with divine vision in meditation through pranayama, and let ‘Indra’, the soul, protect you with its own potential of the mind and senses.

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    Subject

    For protection etc. : triple devices

    Translation

    May the breeding bull make you prosper with cows, may the stallion make you prosper with speedy steeds; may the vital air protect you with perception; may the resplendent self make you strong with sense-organs.

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    Translation

    O man, let the bull become source of protection with cows, let the stallion protect you with the horses, let the wind guard you with grain and let mighty soul.

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    Translation

    O man, let the powerful ox nourish you through cows by supplying milk. Let the strong horse serve you with fast horses. Let the wind protect you with food. Let electricity be of a great service to you, through electric machines or contrivances.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(गोभिः) धेनुभिः (त्वा) (पातु) (ऋषभः) ऋषिवृषिभ्यां कित्। उ०३।१२३। ऋष गतौ दर्शने च-अभच्, कित्। ऋषिर्दर्शनात्-निरु०२।११। सर्वदर्शकः परमेश्वरः (वृषा) वीर्यवान् (त्वा) (पातु) (वाजिभिः) वेगवद्भिरश्वैः (वायुः) सर्वत्रगामी परमेश्वरः (त्वा) (ब्रह्मणा) प्रवृद्धेनान्नेन-निघ०२।७ (पातु) (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान्। जगदीश्वरः (पातु) (इन्द्रियैः) परमैश्वर्यव्यवहारैः ॥

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