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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 48 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 48/ मन्त्र 4
    ऋषिः - गोपथः देवता - रात्रिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - रात्रि सूक्त
    49

    सा प॒श्चात्पा॑हि॒ सा पु॒रः सोत्त॒राद॑ध॒रादु॒त। गो॑पा॒य नो॑ विभावरि स्तो॒तार॑स्त इ॒ह स्म॑सि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सा। प॒श्चात्। पा॒हि॒। सा। पु॒रः। सा। उ॒त्त॒रात्। अ॒ध॒रात्। उ॒त। गो॒पाय॑। नः॒। वि॒भा॒व॒रि॒। स्तो॒तारः॑। ते॒। इ॒ह॒। स्म॒सि॒ ॥४८.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सा पश्चात्पाहि सा पुरः सोत्तरादधरादुत। गोपाय नो विभावरि स्तोतारस्त इह स्मसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सा। पश्चात्। पाहि। सा। पुरः। सा। उत्तरात्। अधरात्। उत। गोपाय। नः। विभावरि। स्तोतारः। ते। इह। स्मसि ॥४८.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 48; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    रात्रि में रक्षा का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे रात्रि !] (सा) सो तू (पश्चात्) पीछे से, (सा) सो तू (पुरः) सामने से, (सा) सो तू (उत्तरात्) ऊपर से (उत) और (अधरात्) नीचे से (पाहि) बचा। (विभावरि) हे चमकवाली ! (नः) हमारी (गोपाय) रक्षा कर, हम लोग (इह) यहाँ पर (ते) तेरी (स्तोतारः) स्तुति करनेवाले (स्मसि) हैं ॥४॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को रात्रि में सावधानी के साथ सब ओर से रक्षा का प्रबन्ध रखना चाहिये ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(सा) पूर्वोक्तलक्षणा त्वम् (पश्चात्) (पाहि) रक्ष (सा) सा त्वम् (पुरः) पुरस्तात् (सा) (उत्तरात्) उपरिदेशात् (अधरात्) अधोदेशात् (उत) अपि च (गोपाय) रक्ष (नः) अस्मान् (विभावरि) म० २। हे दीप्तिमति (स्तोतारः) स्तावकाः (ते) तव (इह) अत्र (स्मसि) स्मः। भवामः ॥

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    भाषार्थ

    (सा) वह तू (पश्चात्) पश्चिम से, (सा) वह तू (पुरः) सामने से या पूर्व से, (सा) वह तू (उत्तरात्) उत्तर से, (उत) और (अधरात्) दक्षिण से (पाहि) हमें सुरक्षित कर। (विभावरि) हे चमकीली रात्रि! (नः) हमें (गोपाय) सुरक्षित कर, (इह) यहाँ पर (ते) तेरे (स्तोतारः) स्तावक अर्थात् प्रशंसक (स्मसि) हैं। अथवा तेरी सुरक्षा में इस जीवन में हम परमेश्वर के स्तवन कीर्तन करनेवाले हों।

    टिप्पणी

    [विभावरि!= वि+भा+क्वनिप्+र्+ङीप् (वनो र च, अष्टा० ४.१.७), अर्थात् दीप्तिवाली। रात्रि में चाँद और तारागण द्वारा चमकीली।]

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    विषय

    सर्वतः रक्षण व्यवस्था

    पदार्थ

    १. हे (विभावरि) = तारों की दीप्तिवाली रात्रि! (सा) = वह तू (न:) = हमें (पश्चात् पाहि) = पीछे से रक्षित कर, (सा पुरः) = वह तू आगे से रक्षित कर । (सा उत्तरात्) = वह तु ऊपर से, (उत) = और (अधरात्) = नीचे से हमें (गोपाय) = रक्षित कर । २. हम (ते) = तेरे (इह) = इस रात्रि के प्रारम्भकाल में (स्तोतारः स्मसि) = स्तोता हैं।

    भावार्थ

    रात्रि के समय सब ओर से हमारे रक्षण की व्यवस्था हो। हम रात्रि प्रारम्भ में प्रभु-स्तवन करते हुए निद्रा की गोद में जाएँ।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Ratri

    Meaning

    May the night protect us from behind, may she protect us from the front, from above and from below. O splendid Night, protect us all round. We here are your admirers, we adore and celebrate you.

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    Translation

    As such may you protect us from behind, you from in fron: you from above and from underneath as well. O glowing one, do protect us. Here we are your praise- singers

    Comments / Notes

    Text is not clear in the book. If someone has a clearer copy, please edit this translation

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    Translation

    Let that night guard us from behind, let that guard us from the front, and let guard us from below and from north or above, let this splendid night protect us, in this we are the admirers of this night.

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    Translation

    Mayst thou, O bright night, guard us from behind, from the front side, from above and from below. Here we are the singers of thy praises.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(सा) पूर्वोक्तलक्षणा त्वम् (पश्चात्) (पाहि) रक्ष (सा) सा त्वम् (पुरः) पुरस्तात् (सा) (उत्तरात्) उपरिदेशात् (अधरात्) अधोदेशात् (उत) अपि च (गोपाय) रक्ष (नः) अस्मान् (विभावरि) म० २। हे दीप्तिमति (स्तोतारः) स्तावकाः (ते) तव (इह) अत्र (स्मसि) स्मः। भवामः ॥

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