अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 60/ मन्त्र 2
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - मन्त्रोक्ताः, वाक्
छन्दः - ककुम्मतीपुरउष्णिक्
सूक्तम् - अङ्ग सूक्त
86
ऊ॒र्वोरोजो॒ जङ्घ॑योर्ज॒वः पाद॑योः। प्र॑ति॒ष्ठा अरि॑ष्टानि मे॒ सर्वा॒त्मानि॑भृष्टः ॥
स्वर सहित पद पाठऊ॒र्वोः। ओजः॑। जङ्घ॑योः। ज॒वः। पाद॑योः। प्र॒ति॒ऽस्था। अरि॑ष्टानि। मे॒। सर्वा॑। आ॒त्मा। अनि॑ऽभृष्टः ॥६०.२॥
स्वर रहित मन्त्र
ऊर्वोरोजो जङ्घयोर्जवः पादयोः। प्रतिष्ठा अरिष्टानि मे सर्वात्मानिभृष्टः ॥
स्वर रहित पद पाठऊर्वोः। ओजः। जङ्घयोः। जवः। पादयोः। प्रतिऽस्था। अरिष्टानि। मे। सर्वा। आत्मा। अनिऽभृष्टः ॥६०.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
शरीर के स्वास्थ्य का उपदेश।
पदार्थ
(ऊर्वोः) दोनों जङ्घाओं में (ओजः) सामर्थ्य (जङ्घयोः) दोनों घुटनों [पिण्डलियों वा नीचे की जाँघों] में (जवः) वेग, (पादयोः) दोनों पैरों में (प्रतिष्ठा) जमाव [दृढ़ता], (मे) मेरे (सर्वा) सब [अङ्ग] (अरिष्टानि) निर्दोष और (आत्मा) आत्मा (अनिभृष्टः) बिना नीचे गिरा हुआ [होवे] ॥२॥
भावार्थ
मनुष्यों को उचित आहार-विहार, व्यायाम, योगाभ्यास आदि से अपने शरीर और आत्मा दृढ़ रखने चाहिएँ ॥१, २॥
टिप्पणी
मन्त्र २ में (प्रतिष्ठा अरिष्टानि) पदों में सन्धि न होने से जाना जाता है कि (पादयोः) पर अवसान होने के स्थान में (प्रतिष्ठा) पर अवसान होना चाहिये ॥ २−(ऊर्वोः) जानूपरिभागयोः (ओजः) सामर्थ्यम् (जङ्घयोः) गुल्फजान्वोरन्तरालयोः (जवः) वेगः (पादयोः) चरणयोः (प्रतिष्ठा) स्थिरता। दृढता (अरिष्टानि) निर्दोषाणि (मे) मम (सर्वा) सर्वाणि अङ्गानि (आत्मा) जीवात्मा (अनिभृष्टः) भृश अधःपतने-क्त। अनधोगतः ॥
व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्ण दत्त जी महाराज
व्याख्याः शृङ्गी ऋषि कृष्णदत्त जी महाराज-इन्द्रियों में शक्ति की प्रार्थना
सबसे पूर्व हम उस विधाता का गुणगान गाएं, जो विधाता हमारी वाणी का, श्रोत्रों का चक्षुओं का, त्वचा का, भुजों का, उपस्थ इन्द्रियों का, पदों का सबका महान पिता है, आज सबसे पूर्व विधाता से इन सबमें बल मांगने की इच्छा करें, यह ही मानव की सर्वप्रथम श्रेणी है परन्तु बल कैसे आएगा, आज मानव इसी को नहीं जान रहा है, गुरु जी तो सब वार्ताओं को उच्चारण कर चुके हैं, उनका वाक्य ऐसा है, जो प्रत्येक मानव, प्रत्येक देवकन्या के हृदय में स्थान किए जा रहा है, हम इतने योग्य तो नहीं, जो उनके सदृश अपने विचार प्रगट कर सकें, परन्तु आज हम गुरु जी के आदेश को लेकर, उस विधाता की याचना कर रहे हैं, जो प्रत्येक मानव के हृदय में विराजमान है, और हमारी सब इन्द्रियों का साथी है।-महर्षि लोमश
वाक् वाक्
सबसे प्रथम जब आत्म लोक में प्रवेश करता है, आत्म लोक में जब जाता है तो वह तीन आचमन करता है। आचमन का अभिप्राय त्रिविद्या को धारण करने वालों में नाना ब्रह्मवेत्ता हुए हैं। परन्तु आज का विचार क्या? मुनिवरों! देखो, तीन आचमन करता है। आचमन करने के पश्चात सर्वत्र जो इन्द्रियाँ हैं मानव के शरीर में, इन इन्द्रियों के ऊपर वह अपना अधिपथ्य करता है।
वह कहता है प्राणम् बृहिः रत्त्यम् देवाः। वाक् शक्ति मेरी पवित्र हो। वाक् शक्ति में जाता है। वाक् वाक् कहता है क्योंकि यह जो वाक् शक्ति है यह वाणी से शब्द उच्चारण कर रहा है उस शब्द की जो गति है वह कितनी विशाल है कितनी महान है। तो प्रभु! से आत्म लोक में जाने से पूर्व यह विचारता है कि मेरी वाक् शक्ति इतनी विचित्र हो। मेरा वाक्य, मेरा शब्द इतना महान हो कि उस शब्द के द्वारा मैं नाना लोकों में गति करने वाला बनूं। यह पृथ्वी की जो परिक्रमा होती है, यह शब्द पृथ्वी की परिक्रमा करता है। वेद का ऋषि तो यहाँ तक कहता है, आचार्यों ने तो यहाँ तक कहा है कि हमारे यहाँ जो वाक शक्ति है, वाक् शक्ति जो मानव उच्चारण करता है, उसकी रचना होती है। रचना हो करके वह शब्द पृथ्वी की गति करना आरम्भ करता है। आचार्यों ने कहा कि जो शब्द उच्चारण होता है वह एक क्षण समय में इस पृथ्वी की ११७ परिक्रमा कर जाता है। इसलिए आचार्यों ने कहा कि वाक शक्ति मेरी विचित्र होनी चाहिए। यह वाक् उत्तरायण में जाता है, उत्तरायण से यह दक्षिणायन को गति करता है। वाक्य की रचना कहाँ से होती है? आचार्यों ने कहा कि मानव कण्ठ में जब यह शब्द आता है अथवा तरंगें आती है तो इन तरङ्गों को प्रति अबृहा कण्ठ में आता है। जब यह प्रवाह आता है तो कण्ठ में आते ही वाक्य शक्ति की रचना हो जाती है। वही वाक्य बाह्य जगत में प्रवेश करता है, बाह्य जगत में चला जाता है। यह पृथ्वी की एक क्षण समय में परिक्रमा करता है।
परिणाम क्या? मुनिवरों! देखो, यह जो वाक्य है यह दो प्रकार का कहलाया जाता है। वास्तव में एक वाक्य जो बाह्य ऊपरी रूपों में परणित रहता है। एक आन्तरिक जगत से आता है जो अन्तर्हृदय रूपी गुफा से आता है वह आर्शीवाद बन करके रहता है और जो कण्ठ से रचना होती है वह रचना शब्द की एक लौकिक रचना है, एक पारलौकिक रचना है। जो लौकिक रचना है वह लोक में शब्द गति करता है। तो पारलौकिक रचना है, जो अन्तर्हृदयरूपी गुफा से तरंगें चलती है, कण्ठ में आ करके वह शब्द बनता है। शब्द के साथ में आकार बनता है और आकार बन करके पृथ्वी की परिक्रमा कर देता है, वह उत्तरायण से दक्षिणायन को गति करता है। दक्षिणायन से ऊर्ध्वा में गति करने वाला वह शब्द कहलाता है वह हृदय रूपी गुफा से एक शब्द चलता है।
विचार विनिमय यह करना है, हमें मनन करना है कि हम आत्म लोक में प्रवेश करना चाहते हैं। तो आत्म लोक में जाने से पूर्व हमें शब्द को विचारना होगा। इसलिए मुनिवरों! देखो, जो साधक पुरूष होते हैं, वह सबसे प्रथम वाक् कहते हैं और वाक् वाक् कहते हैं तो उस समय उच्चारण करते हैं, वाक् वाक् और वे क्योंकि कहते हैं? क्योंकि वाक् शक्ति मेरी पवित्र होनी चाहिए। हे परमात्मा! हे देव! मेरी वाक् शक्ति में इतना नृत्य होना चाहिए, इतना अहिंसा परमो धर्मः होना चाहिए कि मेरे वाक्य की शक्ति से जितने भी हिंसक प्राणी हैं जितने भी प्राणी मात्र हैं, मेरी वाणी मात्र से वे तृप्त होने वाले बनें। वाक् शक्ति विशाल शक्ति है जिससे मृगराज, सिंहराज ऋषियों के चरणों में ओत प्रोत रहते रहे हैं।
बेटा! मुझे बहुतसा काल स्मरण आता रहता है। त्रेता के काल में एक समय भंयकर वन में जब महाराज दिलीप नन्दिनी की सेवा कर रहे थे। उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ करना था और जब नन्दिनी की सेवा करते हुए भंयकर वन में पहुंचे तो भंयकर वन में झरने से जल नृत्य कर रहा था। महाराजा दिलीप उसे दृष्टिपात करने लगे। इतने में ही मृगराज ने, सिंहराज ने आ करके नन्दिनी पर आक्रमण किया तो महाराजा दिलीप दृष्टिपात करने लगे और महाराजा दिलीप ने कहा, यह क्या कर रहे हो मृगराज? उन्होंने कहा, महाराज यह मेरा भोज्य है, नन्दिनी मेरा भोज्य है, मैं इसे पान करूँगा। उन्होंने कहा कि नन्दिनी तो तुम्हारा भोज्य है, परन्तु मेरा कर्तव्य है, मैं इसकी रक्षा करने वाला हूँ, एक राजा हूँ। एक राजा होने के नाते मैं इसकी रक्षा करूँगा, रक्षार्थ आया हूँ।
महाराज दिलीप की वाणी बड़ी पवित्र और सुसज्जित थी। उनकी वाणी में एक तप था, एक महत्ता थी। मृगराज! सिंहराज ने नन्दिनी को त्याग करके वह एक स्थली पर विद्यमान हो गया। उन्होंने कहा, हे मृगराज! तुम्हें यह प्रतीत है कि नन्दिनी मेरी पूज्य है, और नन्दिनी से पूर्व मेरे प्राणों का हनन होना तो उत्तम कार्य है। नन्दिनी को उसके पश्चात कोई भी उसे अपना भोज्य बना सकता है। जब उन्होंने ऐसा कहा तो देखो, आत्मा सभी में विद्यमान है, आत्मा का जो नृत्य है वह जो सर्वत्र प्राणियों में होता रहता है। महाराज दिलीप की ये चर्चायें, जब मृगराज ने श्रवण की तो सिंहराज कहते हैं, हे राजन! धन्य है। हम तेरे राष्ट्र में गमन करते हैं। तेरे राष्ट्र में किसी प्राणी का भी हनन नही होगा।
मेरी वाक शक्ति पवित्र हो और कैसी वाक शक्ति हो? मेरी वाक शक्ति से प्रत्येक प्राणी मात्र वन्दना करने लगे, मन्त्रणा करने लगे जिससे उनके अन्तरात्मा में, जो हृदय में विराजमान होने वाली आत्मा को जो लोक है, उस लोक में विराजमान होने वाली पवित्र आत्मा है उस आत्म तत्त्व की आभा में रमण करता रहे।
मानव संध्या काल में विराजमान होता है सबसे प्रथम वह अपनी इन्द्रियों को स्पर्श करता हुआ अपनी इन्द्रियों के विषयों को जानता हुआ और परमात्मा से अपना तन्मय करता हुआ वह कहता है हे प्रभु! मेरी इन्द्रियाँ स्वस्थ हो, मेरी इन्द्रियाँ पवित्र हो, प्रभु! जिससे मैं आपके द्वार पर आ जाऊं, आपकी प्रतिभा को विचारने लगूं तो सबसे प्रथम मानव ब्रह्मयाग में परिणत हो जाता है। प्रथम ही वाक् वाक् कहता है और वाक् वाक् कह करके यही उच्चारण कर रहा है कि मेरी वाक् शक्ति पवित्र हो। वाक् शक्ति मेरी पवित्र हो। वाक् शक्ति में जाता है। वाकः वाकः कहता है क्योंकि यह जो वाक् शक्ति है, यह वाणी से शब्द उच्चारण कर रहा है, उस शब्द की जो गति है, वह कितनी विशाल है, कितनी महान है। तो प्रभु से आत्म लोक में जाने से पूर्व यह विचारता है कि मेरी वाक् शक्ति इतनी विचित्र हो। मेरा वाक्य, मेरा शब्द इतना महान हो कि उस शब्द के द्वारा मैं नाना लोकों में गति करने वाला बनूँ।
प्राणः प्राणः
द्वितीय वाक्य इसके पश्चात कहता है। प्राण प्राणम् प्रहवे वृत्तदेवाः। मेरा जहाँ वाक्य पवित्र हो वहाँ मेरी घ्राण पवित्र होनी चाहिए। प्राण पवित्र हों। मेरे प्यारे! इस मानव शरीर में प्राण गति करते हैं। वाक्यम् वाक के पश्चात ये घ्राण के क्षेत्र में जाता है। घ्राण की शक्ति में प्राणः प्राणः करके वह घ्राण को ऊँचा बनाता है। वह कहता है, हे प्रभु! मैं तेरे राष्ट्र में आया हूँ। मैं तेरे इस महान जगत को जानना चाहता हूँ।
जहाँ वह वाक शक्ति में जाता है, वहाँ वह प्राण के क्षेत्र में जाता है। तो कहता है कि प्राणः प्राणः। मेरे प्यारे! घ्राण जो इन्द्रियाँ हैं, ये मन्द सुगन्ध को ग्रहण करने वाली हैं। परमाणु आते हैं, गति करते हैं, परमाणु एक नहीं, अरबों खरबों परमाणु आते हैं। गति करते हैं, बाह्य जगत में जाते हैं और बाह्य से आन्तरिक जगत में प्रवेश करते हैं। आन्तरिक से बाह्य जगत में चले जाते हैं। यह परमाणुओं का क्षेत्र है। नाभि केन्द्र से ले करके ब्रह्यरन्ध्र के आसन से गति करता हुआ घ्राण के द्वारा यह प्राण गति करता है। ये प्राणेन्द्रियां, ये प्राण की अशुद्ध शक्ति है। इसमें प्राण गति करता है अथवा नृत्य करता रहता है। मानव की जो घ्राणेन्द्रियाँ हैं, इन्हीं के द्वारा यह मन्द सुगन्ध को जानता है, दुर्गन्धि को जानता है। सुगन्ध को जान करके, परमाणुवाद को जान करके, यह पृथ्वी के खनिज को जानने लगता है। वायु मण्डल में, वायु में जो गति कर रही है, वायु में जो तरंगे गति कर रही हैं, परमाणु गति कर रहे हैं उन परमाणुओं को घ्राण के द्वारा ही वह जान लेता है कि यह परमाणु गति कर रहा है। इस प्रकार का परमाणु इसमें नृत्य कर रहा है। अथवा गति कर रहा है। वे जो गतियाँ हो रही हैं, उसी परमाणु को जान करके मानव भौतिकवाद में प्रवेश कर जाता है।
चक्षुः चक्षुः
उस काल में वह जो साधक है वह कहता है कि चक्षुः चक्षुः। मेरे ये दोनों चक्षु पवित्र हों। आज हम चक्षुओं को महान बनाना चाहते हैं। चक्षुओं के द्वारा ही मानव धर्म को जानता है। धर्म की मीमांसा करने वालों ने कहा है कि धर्म तो एकाकी कहलाता है। धर्म क्या है? धर्म मानव के नेत्रो से दृष्टिपात होगा नेत्रो में धर्म समाहित रहता है जब मानव की दिव्य दृष्टि हो जाती है। व्यापक दृष्टि बन जाती है, इस दृष्टि से वह अनेकता को एकता में दृष्टिपात करने लगता है। एक ब्रह्म सूत्र में इस ब्रह्माण्ड को पिरोया हुआ दृष्टिपात करने लगता है।
तो आओ मेरे प्यारे! विचार क्या चल रहा है? विचार यह है कि हम चक्षुओं के द्वारा तपस्वी बनें और चक्षुओं के द्वारा तपस्वी बन करके इस अग्नि को हम जागरूक करें जिसके द्वारा हम अन्तरिक्ष में रमण करने वाले शब्दों को भी दृष्टिपात कर सकते है। इस पृथ्वी में नाना प्रकार की आभाएं गति करती रहती है, उनको भी हम दृष्टिपात करते रहते हैं। विश्व का मित्र बन करके और ये घ्राणाम बृहिः वृत्त देवाः यह चक्षुः चक्षुः अब्रहेः मानव उस समय उच्चारण करता है, साधक कहता है प्रभु! मेरे चक्षु पवित्र बन जाएं महान बन जाएं। वह महान बन जाए। मैं पवित्र बन करके प्रभु के द्वार पर पहुंच जाऊँ।
चक्षु के द्वार पर पहुंचा कि हे चक्षु! तू मेरा उद्गाता बन। हे चक्षु! तू मेरा उद्गाता बन करके उद्गीत गा। तो चक्षु उद्गीत गाने लगा। जब चक्षु उद्गीत गाने लगा। अब चक्षु ने उद्गीत गाया, वह सदैव शुद्ध पवित्र दृष्टिपात करती रही। अशुद्ध दृष्टिपात ही नहीं करती थी। जहाँ भी वह दृष्टि जाती, वहीं प्रभु की प्रतिभा दृष्टिपात आने लगती। जब प्राप्त होती रही दृष्टिपात करते हुए ब्रह्माण्ड में परणित हो गई। परिणाम यह हुआ कि उद्गीत गाता रहा। उद्गाता बन करके। इस मानव शरीर रूपी जो यज्ञशाला है, इस यज्ञशाला में बेटा! उद्गीत गाने वाला कौन है? कौन होता बन करके, कौन उद्गीत गा रहा है बेटा! वह चक्षु हैं, वे नेत्र हैं।
श्रोत्रं श्रोत्रम्
तो आज हम बेटा! उन वाक्यों पर विचार विनिमय करें। उसके पश्चात हमारे यहाँ श्रोत्रम् श्रोत्रम् आता है। श्रोत्र कहते हैं जो श्रवण कर रहा है। यह श्रवणशक्ति क्या है? मानव को श्रवण करना चाहिए। शब्दों को श्रवण करना चाहिए। ध्वनि को श्रवण करना चाहिए। इसी ध्वनि के द्वारा मानव के द्वारा जो नाना प्रकार के यन्त्र, मानव के शरीर में जो नाना प्रकार के यन्त्र आदि लगे हुए है, उनमें जो ध्वनियाँ आ रही हैं, उन ध्वनियां को वह स्वीकार करता है।
शब्दों की जो ध्वनियाँ आती हैं, वे जो हमारे अन्तर्हृदय में इस आन्तरिक जगत में जो नाना प्रकार के यन्त्रों की ध्वनियाँ आ रही हैं मानव का आन्तरिक जगत इतना विशाल बन गया है कि बाह्य ध्वनियों को स्वीकार करने में वञ्चित हो गया है। मेरे प्यारे! वे जो ध्वनियाँ हैं, जिनको योगी, ऋषि साधकों ने इसको अनहद कहा है। इसको अनहद ध्वनि कहते हैं जिसको योगीजन श्रवण करते हैं, जिसके श्रोत्र वहीं स्थिति रहते हैं। मानव के द्वारा चित्त में जो आवागमन के संस्कार होते रहते है वे समाप्त होने लगते हैं, वे भस्म होने लगते हैं। तो विचार क्या कि हम अपने श्रोत्रों के द्वारा उस ध्वनि को स्वीकार करें जो ध्वनि मानव के आवागमन के संस्कारों को नष्ट करने वाली है।
वह जो अभय गति है वही तो मानव को एक अब्रहाः क्षेत्र में ले जाती है। जैसे उत्तरायण से दक्षिणायान को विद्युत की धाराएँ चलती हैं, इसी प्रकार मानव के मुखारविन्द से जो शब्द उत्पन्न होता है उसकी भी गति उत्तरायण से दक्षिणायन को रहती है और वह जो शब्द अब्रहाः गति वह श्रोत्रों में जाती है, इसलिए श्रोत्रं श्रोत्रम् कहता है। आचार्य कहता है मेरे श्रोत्र पवित्र बन जाएं, मेरी जो श्रवण शक्ति है वह इतनी विशाल बन जाएं, बाह्य जगत में जो ध्वनि हो रही है, आन्तरिक जगत से बाह्य जगत दोनों का समन्वय हो करके वह एक ध्वनि बन जाएं। मैं उसी को श्रवण करने वाला बनूं। तो आत्मा में, आत्म लोक में जाने की इस प्रकार की यह पौड़ी कहलाती है जिनको सदैव मानव धारण करता रहता है अथवा आभा में परणित करता रहता है जिससे प्रत्येक मानव के हृदय में एक मानवीय भाव सदैव उत्पन्न होता रहता है।
वह श्रोत्रों के द्वार पर पहुंचा और श्रोत्रों से कहा हे श्रोत्रों! आओ तुम मेरी यज्ञशाला में विद्यमान हो करके तुम उद्गाता बनो। मेरा उद्गीत गाने वाले बनो। अब उद्गीत गाने लगे। उन्होंने यथार्थ सुन करके उद्गीत गाना प्रारम्भ किया और उद्गीत गाता रहा। श्रोत्रों में जो भी शब्द आता वहीं शब्द दर्शनों से घटित होने लगा। वह अन्तःकरण में वह चित्त में विद्यमान होने लगा। उन श्रोत्रों का सम्बन्ध नाना प्रकार की दिशाओं से अर्पित हो गया और अर्पित हो जाने के पश्चात जो भी शब्द आता रहा, उसी शब्द में मेरे पुत्रो! वास्तविकता घटित होने लगी। दार्शनिकता में परणित होने लगा। मेरे पुत्रों! लोक लोकान्तरों में जाना प्रारम्भ अथवा उत्थान हो गया। लोकों में जाना ही उसका उत्थान हो गया।
नाभिः नाभिः
नाना पृथ्वियाँ इस नाभि के प्रकाश को प्राप्त हो रही हैं। इसी प्रकार मानव के शरीर में एक नाभि है। उसे नाभ्याम् कहते हैं।
यह जो नाभि है, वह इस मानव शरीर का केन्द्र कहलाती है। वह नाभि ही जब मानव, जब योगेश्वर साधना के क्षेत्र में जाता है और प्राण को एकाग्र करना चाहता है तो मूलाधार में जाता है और मूलाधार के पश्चात वह नाभि के केन्द्र में आता है। नाभि ही एह एकाकी रूपेण कहलायी जाती है। जैसे यह परमात्मा का अमूल्य जगत है इनमें नाना अरे, लगे हुए है, यह गति कर रहा है। जिस प्रकार वेद रूपी ऋचाएँ हैं, और वे वेदरूपी ऋचाएँ एक सूत्र में पिरोई हुई हैं। जैसे नाभि में अरे, लगे रहते हैं, इसी प्रकार वह अप्रतम् दित्याम् लोकाः नाभि में भी इसी प्रकार अरे, लगे रहते है। क्योंकि वेद एक ज्योति है, वेद एक प्रकाश है। वेद पोथी नहीं है, वेद प्रकाश को कहते है वह एक सूत्र में पिरोया हुआ है। वह सूत्र, वह नाभि है। नाभ्याम् उसे कहते है, क्योंकि परमात्मा का जो इस ब्रह्माण्ड को जो नाभ्याम है वह चेतना है। इसी प्रकार मानव के शरीर में एक नाभि है और नाभि ही केन्द्रित हो जाती है।
मुझे स्मरण आता रहता है। एक समय बेटा! महर्षि प्रवाहण ऋषि आश्रम में एक सभा हुई थी उस सभा में महर्षि शिलक और दालभ्य, महर्षि रेवक, शाण्डिल्य और महर्षि मुद्गल, महर्षि जमदग्नि, महर्षि सुकेता, ब्रह्माचारी कवन्धि, यज्ञकेतु, ब्रह्मचारी यज्ञत्तत्व, महर्षि पनपेतु, विभाण्डक आदि ऋषियों का एक समूह था जिसमें महर्षि दधीचि भी विद्यमान थे। वहाँ एक प्रश्न उत्पन्न होने लगा। दालभ्य, शिलक, प्रवहाण ये तीनों ऋषि एक पंक्ति में विद्यमान हैं और एक पंक्ति में महर्षि अङ्गिरस और ब्रह्मचारी कवन्धि और भी नाना ऋषि हैं। जब यह प्रश्न उत्पन्न होने लगा कि इस पृथ्वी की नाभि क्या है? पृथ्वी की नाभि के ऊपर प्रश्न आ गया।
मुनिवरों! देखो, उन्होंने कहा कि पृथ्वी की नाभि शकुन्तका है। विचार आया शकुन्तका क्या है? यह वेदमन्त्र का एक शब्द, एक आख्यायिका है। शकुन्तका कहते हैं पृथ्वी के मध्य को, शकुन्तका कहते है यज्ञवेदी को, शकुन्तका लक्ष्मी को भी कहते हैं, परन्तु नाना पर्यायवाची शब्द है, और शकुन्तका नाम प्रकृति को भी कहते है। तो वेद में बहुत से पर्यायवाची शब्द आते हैं परन्तु यहाँ यह विचार आया कि शकुन्तका नाम यज्ञवेदी का है, जिस यज्ञवेदी पर यज्ञमान विद्यमान हो करके याग करता है और उसमें स्वाहा देता है तो होता जन भी स्वाहा देते है। अध्वर्यु, उद्गाता इत्यादि यज्ञवेदी के समीप विद्यमान हो करके साकल्य की आहुति देते हैं। इसी प्रकार यह सप्त होता है जो शकुन्तका को सजातीय बनाते हैं, नाभि को ऊँचा बनाते हैं। नाभि यज्ञवेदी को कहा गया है। परन्तु देखो, विचार आता है कि यज्ञवेदी नाम शकुन्तका का है जो एक यज्ञमान का विमान बन करके द्युलोक में चला जाता है। वह इस प्रकार की आभा बन करके अन्तरिक्ष में गति करने लगती है।
मुनिवरों! देखो, यहाँ वेद का ऋषि कहता है, मन्त्र यह कहता है कि इस पृथ्वी की जो नाभि है वह यज्ञवेदी है। जैसे यज्ञवेदी पृथ्वी की नाभि है इसी प्रकार मानव के शरीर में ये नाभिका, इस मानव शरीर की यज्ञवेदी है। इस शरीर में पञ्चतत्व होता है वे होता साकल्य लाला करके नाभि को परणित करते हैं, यह कहते हैं कि हे नाभि! तू हमारा केन्द्र है, तू शकुन्तका है। नाना साकल्य होते हैं और नाभि के द्वार पर वे स्थिर हो जाते हैं। जैसे नाना प्रकार अरे, लगे रहते हैं और वह चक्र बन जाता है। इसी प्रकार सूर्य से नाना प्रकार की किरणें आती हैं। कोई पृथ्वी से, सूर्य को उर्ध्वा में गमन करती हैं, कोई मङ्गल से गमन करती जाती है, कोई चन्द्रमा से जाती है परन्तु वह एक स्थिति है, एक नाभि में से नाना प्रकार की किरणें चलती हैं।
इसी प्रकार हमारे इस मानव शरीर में एक नाभि केन्द्र है। उस नाभि में से नाना प्रकार की धाराएँ चला करती हैं। इस पृथ्वी से इनका सन्म्बन्ध होता है। इसमें नाना प्रकार की नाड़ियाँ हैं और वे जो नाड़ियाँ हैं, एक यन्त्र लगा हुआ है इस नाभि केन्द्र में। जो यन्त्र नाना प्रकार की धातुओं का निर्माण करता है और वह निर्माण किससे करता है? वह जो स्वाहा होता है, वह जो नाना प्रकार के साकल्य को लाला करके नाभि को, यज्ञवेदी को अर्पित कर देते हैं, यज्ञ वेदी में स्वाहा कर देते हैं शकुन्तका को।
मुनिवरों! देखो, उसमें जो तरङ्गें आती हैं, उसमें जो द्रव्य जाता है, साकल्य जाता है, वह यन्त्र उसी में से नाना प्रकार की धातुओं का निर्माण करता है। धातुओं का निर्माण हो करके नाना जो नसनाड़ियाँ हैं इस शरीर में, सामान्य प्राण के द्वारा उनको प्रदान की जाती है। नाना प्रकार की नस नाड़ियों में वह धातु, वह साकल्य उनमें परणित किया जाता है, उनमें पिरोया जाता है। अपने अपने भाग को ले करके श्रोत्र शब्दों के प्रतिनिधि बन जाते है। चक्षु दृष्टि के रूप में प्रतिनिधि बन जाते हैं और त्वचा स्पर्श की प्रतिनिधि बन जाती है और वाणी शब्दों की प्रतिनिधि बन जाती है, घ्राणेन्द्रियाँ मन्द सुगन्ध की प्रतिनिधि बन जाती हैं।
मेरे पुत्रों! वह जो नाभिकेन्द्र है, उस नाभि में नाना प्रकार की धातुओं का निर्माण होता है। संसार की नाभि पृथ्वी मानी जाती है। इस पृथ्वी के गर्भ में, इस प्रकार वैज्ञानिक जनो ने कहा है कि नाना प्रकार धातुओं का निर्माण होता है। इसी प्रकार इस मानव की नाभि का सन्म्बन्ध भी पृथ्वी से होता है। यह जो पृथ्वी से रहता है। ऐसे ही मानव के शरीर में नाना प्रकार का जो खनिज इससे उत्पन्न होता है, जो मानव शरीर को सजातीय बना देता है।
मुझे स्मरण है पुत्रों! हमारे यहाँ अश्विनी कुमार दो वैद्यराज हुए हैं, जो महात्मा भुञ्जु मुनि महाराज के पुत्र कहलाते थे। जब वे अनुसन्धान करते थे तो नाभि केन्द्र का अनुसन्धान करने के पश्चात वे हृदय के ऊपर चिन्तन प्रारम्भ करने लगे। हृदय की गति को महान बनाना चाहते हो तो नाभि को प्रथम जानो। नाभि को जानने वाला हृदय की गति को विशाल बनाता है। हृदय को ऊँचा बना लेता है। नाभि केन्द्र से ही नाना प्रकार की धातुओं की तरङ्गें कछ उपस्थ के द्वारा जाती हैं। जो चन्द्रमा रसों का स्वादन करता है, वे चन्द्रमा के रसों में परणित हो जाती है। मेरे पुत्रो! वह जो एक आभा है, एक विचित्रता है, जो नाभि केन्द्र से नाना तरङ्गे, जैसे मानव का शब्द चलता है और शब्द चलता है, तो वह शब्द गति करता है पृथ्वी की, उसमें नाना परमाणु होते हैं। एक परमाणु विशेष होता है, उस परमाणु के अन्तर्गत अरबों परमाणु होते हैं। एक सूक्ष्म होता है, एक ध्रुव होता है, वह उतनें ही आकार में गति करता है, जितने आकार का वह शब्द है और शब्द के साथ में मानव का चित्र है। वह उतने ही आकार में परमाणु एक दूसरे की परिक्रमा करते हैं और उतने ही आकार का बन करके अन्तरिक्ष को प्राप्त हो जाते हैं।
हृदयम्
वह जो हृदय है उस हृदय में अङ्गुष्ठान मात्र एक स्थली है उस स्थली में एक अवृत्यधेनु है, उस धेनु के आंगन में अन्तरात्मा का वास है। वह अन्तरात्मा आभ्याम् गति को प्राप्त होने लगता है। वह जो आत्मा में परणित होने वाला एक आभ्याम् नाभिः हृदय कृताम् देवत्त्यम् को प्राप्त होने वाला है। वह नाभि और हृदय की आभा कही जाती है।
वह जो हृदय गति कर रहा है, हृदय में एक आभा बन करके मानव के कण्ठ में समाहित हो रहा है। मुनिवरों! उसी कण्ठ से उद्गार चलते हैं, वही उद्गार मेघा को लाते हैं। वही उद्गार मानव के मस्तिष्कों का अध्ययन कर देते हैं। वही उद्गार है जो मानव की हृदयस्थली को जान करके, मानव की मानवता को जान करके इस संसार सागर के पार होने का प्रयास करने लगते हैं।
आज बेटा! मैं कोई विशेष चर्चा प्रकट करने नहीं आया हूँ। विचार यह देने के लिए आया हूँ कि मानव को नाभिकेन्द्र में प्रवेश करना चाहिए। यह जो नाभिकेन्द्र है इसमें साधक जब विद्यमान होते हैं, साधक जब साधना करने लगते हैं, जो योगाभ्यासी पुरूष होते हैं वे मूलाधार से नाभिकेन्द्र में जाते है नाभि केन्द्र से हृदयकेन्द्र में प्रवेश करते है। हृदयकेन्द्र से वे कण्ठ में गति करते है।
कण्ठः
हमें अपने को सजातीय बनाना है। हमें अपने नाभि केन्द्र हृदय को जानना है। कल समय मिलेगा, तो बेटा! मै! कण्ठ की चर्चा करूँगा। आज का विचार विनिमय क्या? बेटा! मैं, यह जानता था, मुझे स्मरण आ रहा था कि में आत्मा तक पहुंच जाऊंगा परन्तु नहीं पहुंच पाया। क्योंकि आत्मा का अनुपम एक ऐसा विषय है जो गहन विषय को वर्णन करने के लिए नाना ऋषि नेति नेति कहकर शान्त हो गए।
जो मैंने आज वर्णन किया है, नाना प्रकार के वाक्यों का पर्णन किया है मैंने तुम्हें एक सूत्र में पिरोई हुई माला को धारण कराया है। इस माला को ऋषि जन पान करते हैं, उसे अपने कण्ठ में धारण करते हैं। उसे धारण करके, अपने कण्ठ को सजातीय बना करके इस संसारसागर से पार हो जाते हैं। जो संसार नाना रूपों में हमें दृष्टिपात आ रहा है।
मैं इससे पूर्वकाल में तुम्हें हृदय की चर्चा कर रहा था। हृदय का हम परिचय दे रहे थे। इस मानव के हृदय में क्या क्या समाहित रहता है? जिसको हमें जानना हैं। इस मानव के हृदय में सर्वत्र ब्रह्माण्ड ओत प्रोत रहता है। परन्तु जब बाह्य और आन्तरिक जगत दोनो का समन्वय करने लगता है।
मैं इससे पूर्व कण्ठ की आभा की चर्चा करना चाहता हूँ। मानव के हृदय से आगे चलकर के कण्ठ चक्र आता है। कण्ठ आता है जहाँ उदान प्राण रहता है। कण्ठ के ही भाग में उदान प्राण रहता है। जब मानव इस शरीर को त्यागता है, तो उदान प्राण के ही साथ में चित्त का मण्डल और पञ्च अबृहि और मनस्तत्त्व यह उदान प्राण के समीप आते है। मन उच्चारण करता है। और उनके समीप आत्मा विद्यमान हो जाता है तो आत्मा इनको अश्व बना करके इस शरीर को त्याग देता है।
वही प्राण जिसे हम उदान कहते है वह कण्ठ के भाग में रहता है, वह कण्ठ में रहता हैं। वह कण्ठ में आदान प्रदान करता रहता है। शब्दों की रचना करता रहता है। वह उदान केवल यही नहीं करता है कि शरीर में से आत्मा चला जाता है, उसके ऊपर आरूढ़ हो करके। नहीं जब तक इस शरीर में वास करता है और कण्ठ के भाग में रहता है, यह अन्नादि को उदर में प्रदान करता है और यह रसों को लेकर कण्ठ को सजातीय बना देता हैं।
यह जो कण्ठ है इसमें एक चक्रिका है। हमारे योगीजन जो योगाभ्यासी पुरूष होते हैं, वे जानते हैं कि कण्ठ एक चक्र कहलाता है। वह कैसा चक्र है जिसमें शब्दों की रचना होती रहती है। शब्द कण्ठ के भाग से मुखारविन्द रसना में होकर के, वह बाह्यजगत को धारण करने लगता है। एक मानव अपने मचान पर विद्यमान है परन्तु वह कह रहा है अरे, मार्ग वेत्ताओं यह मार्ग जा रहा है, ब्रह्मपुरी को मार्ग जा रहा है। मचान में स्थिर हुए जो शब्दों की रचना हो रही है, शब्दों के द्वारा जो मार्ग का प्रदर्शन कराया जा रहा है, मानव पथिक बन रहा है, शब्द को ग्रहण करके पथिक बन करके वह यथार्थ मार्ग को ग्रहण कर लेता है क्योंकि वाणी में, कण्ठ में यथार्थता होती हैं।
जब कण्ठ सजातीय हो जाता है, सत्यता से तो यह नारकिक स्थानों को स्वर्ग बना लेता हैं। यह कैसे स्वर्ग बनाता है? मुझे एक ऋषियों की सभा का स्मरण आ गया है। बहुत परम्परा की वार्ता हैं एक समय महात्मा दद्दड़ मुनि महाराज के यहाँ एक ब्रह्मवेत्ताओं की सभा हुई। उन ब्रह्मवेत्ताओं की सभा में महात्मा दद्दड़ मुनि महाराज से यह कहा जा रहा था, सोमकेतु ने कहा कि महाराज! मानव के शरीर के कण्ठ क्या है? कैसे यह मानव के शरीर में रहता है। बाह्य जगत से इसका क्या सम्बन्ध है?
महात्मा दद्दड़ मुनि महाराज कहते है कि हे ब्रह्मवेत्ताओं! मेरे विचार में यह आता है कि यह जो कण्ठ है उसमें उदान प्राण तो रहता ही है परन्तु यहाँ तरङ्गें आती हैं और तरङ्गों द्वारा शब्दों का निर्माण होता है और वे शब्द रसना के द्वार से होते हुए बाह्य जगत में चले जाते हैं और बाह्य जगत में ये मानव को पथप्रदर्शन कराते हैं।
जितना भी तपा हुआ शब्द है, कण्ठ के उद्गार जब उत्पन्न होते हैं तो जिस स्थली पर विद्यमान होता है वहीं यह अपना प्रकाश कर लेता है। वह अपने प्रकाश से स्वतः प्रकाशित होता है। जैसे सूर्य की नाना प्रकार की किरणें उत्पन्न होती हैं और सूर्य अपने प्रकाश में ही संसार को प्रकाशित करता है, इसी प्रकार जो कण्ठ को सजातीय बना लेता है, जो कण्ठ चक्रों को जान लेता है उसके कण्ठ में एक माधुर्यपन आ जाता है। उसके कण्ठ में सत्यता आ जाती है और वह जो सत्यता है वही मेरे प्यारे! सत का भरण करती हुई वायुमण्डल का निर्माण करती है। उसी से वायुमण्डल का निर्माण होता है। उसी से अन्तरिक्ष मण्डल का निर्माण होता है और वह शब्द द्यौ लोक को चला जाता है।
हे ऋषिवर! एक वार्ता बहुत पुरातन काल में महर्षि दद्दड़ मुनि महाराज ने तो यहाँ तक कहा था कि यही कण्ठ है, जो परमात्मा की आभा बन करके रहता है। मानव का जो कण्ठ है और बाह्य जगत में यह तीन प्रकार की श्रेणी कहलाती है। वे तीन प्रकार की श्रेणी क्या? भूः, भुवः, स्वः, ये तीन श्रेणियाँ कहलाती हैं।
बेटा! भूः लोक में शब्द जाता है, भुवः लोक मे जाता है और स्वः लोक में जा करके द्यौ लोक को प्राप्त हो जाता है। वही कण्ठ की रचना हो रही है। अब मेरे प्यारे! इस कण्ठ की जो रचना है वह बाह्य जगत में नाना प्रकार के वायुमण्डल में रहती है।
मेरे पुत्रों! मुझे स्मरण आता रहता है, मैंने कई काल में तुम्हें वर्णन किया था। महात्मा दद्दड़ मुनि महाराज यह कहा करते थे अपने शिष्यों के मध्य में विराजमान हो करके, हे ब्रह्मचारियो! तुम सत्यवादी बनो। प्रत्येक आचार्य विद्यालय में यही कहा करता है ब्रह्मचारी से, कि तुम सत्यवादी बनो। माता अपने पुत्रों! को कहती है कि पुत्र! तुम सत्यवादी बनो। जब योगाभ्यास के लिए गुरुजनों के समीप जाते हैं, ब्रह्मवेत्ताओं के पास, योगियों के पास तो यागेश्वर कहते हैं, योगी कहते है कि हे मानव! तुम सत्य पर आरूढ़ हो जाओ। सत्य ही सत्य आरूढ़ करता है।
मेरे प्यारे! माता अपनी लोरियों का पान करा रही है परन्तु वह सत्य का उपदेश दे रही है। कहती है, बालक! तुम सत्यवादी बनो। पिता अपने पुत्र को सत्यवादी बनाना चाहता है। उसके मन की यह कामना है, उसके हृदय की धारणा उसके कण्ठ में जो सजातीय शब्दार्थ है वह उसे सजातीय बनाना चाहता है, ऐसा क्यों होता है? पिता सत्यवादी है, पुत्र को सत्यवादी बनाना चाहता है। क्योंकि वह जो शब्द है वह मानव अपने अन्तःकरण से यह जानता है कि सत्य और असत्य है क्या? क्योंकि यदि नहीं जानता हुआ होता, सत्य उसकी आत्मा की पुकार नही होती, सत्य परमात्मा का हृदय नहीं होता, सत्यमय यह जगत नहीं हेता, तो पिता अपने पुत्र को सत्यता का उपदेश कदापि दे ही नही सकता था। इसी प्रकार वह सत्य मानव के कण्ठ में सजातीय रहता हैं।
तो विचार विनिमय क्या कि यह जो कण्ठ है, हमें इस कण्ठ की उपासना करनी है, इस कण्ठ में हमें सत्यता के उद्गार देने हैं। सत्यता के उद्गार हमें आन्तरिक जगत में प्रवेश कराने है।
उसी प्रकार आज जब हम यह विचारने लगते है कि वास्तव में कण्ठ की रचना इस प्रकार की है। ब्रह्मचारी सुकेता ने, ब्रह्मा के पुत्र ने ब्रह्मकेतु की सहायता से ऋषि मुनियों के मध्य में उन्होनें शब्द को, कण्ठ चक्र को वहाँ तक पहुँचा दिया जहाँ अन्तरिक्ष में, भूलोक में, उनके ऊपरले स्वः लोकों में जहाँ वायुमण्डल में वायु की तीन प्रकार की तरङ्ग विद्युत से अग्नि, अग्नि से उनका मिलान होता है। मिलान हो करके वहाँ शब्द जब जाता है मानव का, तो तीन प्रकार के शब्द है। एक रजोगुणी हेता है, तमोगुणी होता है और सतोगुणी होता है और एक सतोगुण में क्या जो केवल दर्शनों से गुँथा हुआ शब्द है।
जो मानव के दर्शनों से गुँथा हुआ शब्द होता है, धर्म में पिरोया हुआ जो शब्द होता है वह सीधा द्यौ लोक को प्रवेश कर जाता है। जो शब्द रजोगुणी, तमोगुणी होता है वह जो वायु है, उस शब्द का आकार ऋषि को उसकी चित्रावली में दृष्टिपात आने लगा। उनके चित्र जो वायुमण्डल में, तीन प्रकार की इन्द्र, कृतिभा और सोमकेतुये तीन ही वायु है। ये वायु शब्दों का विभाजन करती रहती हैं।
स्वतः ही वायुमण्डल में शब्दों का विभाजन होता रहता है। जो यथार्थ शब्द हैं वे द्यौ लोक को जाते है, वे स्थिर हो जाते है। जो मिथ्यावादी शब्द है। रजोगुणी है, घृणित शब्द हैं वे इस अन्तरिक्ष में ओत प्रोत हो करके मानव के कण्ठ में उन शब्दों की पुररूक्ति होती है। पुनरूक्ति हो करके वही शब्द अन्तरिक्ष में जब छा जाते है, अन्तरिक्ष छायमान हो जाता है तो कहीं तो इस पृथ्वी से तरङ्गे, वे शब्द, भयंकर अग्नि बन करके जब मिलान करते हैं, तो पृथ्वी में एक बड़वानल अग्नि समुद्रों में प्रदीप्त हो जाती है। वह अग्नि मनुष्यों का विनाश प्रारम्भ कर देती है, उसको दैवी प्रकोप कहते है।
शिरः
आज का विचार विनिमय क्या कह रहा हे पुत्रों! हमारा कण्ठ पवित्र होना चाहिए। जब कण्ठ पवित्र होता है तो हमारा मस्तिष्क भी पवित्र होता है। हमारे मस्तिष्क में नाना प्रकार की आभाएं कण्ठ चक्र के ऊर्ध्व भाग में एक त्रिवेणी स्थान कहलाया जाता है। त्रिवेणी कहते है। जहाँ गङ्गा, यमुना, सरस्वती का मिलान होता है। ये तीन नदियों का मिलान होता है जैसे पृथ्वी मण्डल में तीन नदियों के मिलान को त्रिवेणी कहते हैं। इसी प्रकार योगीजन जो यथार्थवेत्ता, ब्रह्मवेत्ता पुरूष होते हैं वे ईडा, पिङ्गला, सुषुम्ना इन तीन नाड़ियों का मिलान त्रिकुटी में होता है और त्रिकुटी में मिलान जब होता है तो उसको त्रिकुटी कहते हैं।
पुत्रो! कौन स्नान करता है त्रिवेणी में? उसमें वही स्नान करता है जो आत्मलोक में जाना चाहता है। जो आत्मा के लोक में जाना चाहता है, वह आत्मवेत्ता उसी त्रिवेणी में स्नान करता है। वह त्रिवेणी का जब स्नान करता है, वह कैसी त्रिवेणी है? जब त्रिकुटी में इस प्राण की दुक दुकी लगती है, तो ये तीन नदियों का प्रतिनिधि ज्ञान, कर्म और उपासना भी मानी गई है। ज्ञान, कर्म और उपासना भी वहाँ होने लगती है।
ज्ञान हो जाता है कर्म का, उपासना का ज्ञान और ज्ञानाति यदम् बृहिः देव लोकाः। ज्ञान, कर्म, उपासना, ये तीन नदियाँ कहलाती हैं। इस ज्ञान, कर्म उपासना में स्नान करने वरले ब्रह्मवेत्ता कहलाते हैं। वे इस त्रिवेणी को जानते है। वे इस भृकुटी को जानते हैं जिसको हम त्रिकुटी कहते हैं। उस ऊर्ध्वा भाग में जब इन तीनों का मिलान होता है, उससे ऊर्ध्वा भाग में दो कृतिकाएँ होती हैं। वे जो कृतिका हैं जब वे प्राण और मन की दुक दुकी लगती है, आत्मा का जब बृहत होता है, वहाँ वे दोनों कृतिकाएं नृत्य करती हैं।
जब नृत्य करती है तो वह जो ऊर्ध्व मस्तिष्क में जो ब्रह्मरन्ध्र है उस ब्रह्मरन्ध्र की पङ्खुड़ियाँ गति करना प्रारम्भ कर देती है। वे इतनी तीव्र गति करती हैं योगी को जितना यह ब्रह्माण्ड है, जितना मैंने तुम्हें अब तक वर्णन कराया है वरणीय माना गया है। नाना प्रकार के जो मण्डल है, नाना जो आकाश गंगाएं है उनमें जो मण्डल हैं, जितनी गति से ब्रह्मरन्ध्र गति करता है, योगेश्वर की आत्मा सर्व ब्रह्माण्ड को प्रत्यक्ष दृष्टिपात करने लगती है।
ब्रह्मरन्ध्र के ऊर्ध्व भाग में पिपाद स्थान कहलाता है। उस पिपाद स्थान में जितनी भी यह ब्रह्मरन्ध्र की पङ्खुड़ियाँ गति करती हैं, पिपाद स्थान से रस आना आरम्भ होता है और वह जो रस है वह ब्रह्मरन्ध्र से होता हुआ रसना के ऊर्ध्व भाग में आने लगता है। उसे ऋषिजन सोमरस कहते हैं।
इसी प्रकार, ज्ञान, कर्म, उपासना के रूप में हो चाहे ईडा, पिङ्गला और सुषुम्ना के रूप में हो चाहे तमोगुण, रजोगुण एवम् सतोगुण के रूप में हो, जब ये तीनों नाड़ियाँ, तीनों नदियाँ ये नदी रूप बन करके कृतिका उसे कहते हैं वे जो दो कृतिका हैं जैसे जिस प्रकार नदियों का मिलान समुद्रों से होता है, इसी प्रकार ईड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना का उनका अपना यहाँ आ करके अस्तित्व समाप्त हो जाता है और जो अस्तित्व समाप्त हो जाता है तो आगे वहीं धारा समुद्र रूप में प्रवेश करके जैसा मैंने इससे पूर्वकाल में वर्णन कराया था कि ब्रह्मरन्ध्र जागरूक हो जाता है। ब्रह्मरन्ध्र की जो पङ्खुड़ियाँ हैं वे ऐसे ही गति करने लगती हैं, जैसे नाना लोक लोकान्तर अपनी अपनी आभा में गति करते है, जैसे सूर्य गति कर रहा है वह अपनी आभा से गति कर रहा है। पृथ्वियाँ अपनी आभा पर गति कर रही है।
बाहुभ्यां यशोबलम्
उस आनन्द में जाने के पश्चात मानव को कितना व्यापक बनना है? मैं बहुत पुरातन काल से एक विवेचना कर रहा हूँ। वह आत्म लोक की विवेचना है। आत्म लोक हम किसे कहते हैं? जहाँ हम ब्रह्मरन्ध्र की पुनः स्थिति का वर्णन करते हैं। जहाँ अन्त और पुनः सृष्टि का वर्णन करके बाहुभ्याम में चले जाते हैं।
इसी प्रकार हमारे जो हस्त हैं यह आपके अर्पण हैं, हे विधाता! इन्हें पवित्र करो। भुजा हमारे पवित्र हों यशोबलम् पवित्र हो। यह कैसे पवित्र बनेंगे? जब प्रभु का गुणगान गाएंगे और इन सबको प्रभु के अर्पण कर देंगे। हम श्रद्धालु बन करके, उस प्रभु का अनुकरण करते हैं तो विधाता से कहा करते हैं कि हे विधाता! यशोबलम् हम किसी प्रकार भी किसी निरपराधी को दण्ड न दें यदि निरपराधी को दण्ड देंगे, तो विधाता! हमारा विनाश हो जाएगा। द्वितीय आकर हमारे पर आक्रमण करेगा। आज हम यह चाहते हैं कि हमारे भुजा पवित्र कार्य करें आज हम निरपराधी की रक्षा करेंगे तो वास्तव में कल्याण होगा। हे देव! कल्याण के करने हारे! तू आ, और हे भगवन! हम तेरे अर्पण हैं। उस आनन्द में जाने के पश्चात मानव को कितना व्यापक बनना है? मैं बहुत पुरातन काल से एक विवेचना कर रहा हूं। वह आत्म लोक की विवेचना है। आत्मलोक हम किसे कहते हैं? जहाँ हम ब्रह्मरन्ध्र की पुनः स्थिति का वर्णन करते हैं। जहाँ अन्त और पुनः सृष्टि का वर्णन करके बाहुभ्याम में चले जाते हैं। बाहुभ्याम किसे कहते हैं? ये जो दिशायें हैं ये बाहुभ्याम कहलाती है मानव दिशाओं को जानने लगता है। एक ऐसा विचित्र यह मानव शरीर बना हुआ है जब शरीर से ये आत्मा पृथक होता है, उस समय इसे आनन्द की प्रतीति होने लगती है। क्योंकि यह कर्म बन्धनों का, यह कर्मों का एक बंधन है जो शरीर है। परिणाम क्या? मुनिवरों! देखो, यह जो वाक्य है यह दो प्रकार का कहलाया जाता है। वास्तव में एक वाक्य जो बाह्य ऊपरी रूपों में परिणत रहता है। एक आन्तरिक जगत् से आता है जो अन्तर्हृदय रूपी गुफा से आता है वह आर्शीवाद बन करके रहता है और जो कण्ठ से रचना होती है वह रचना शब्द की एक लौकिक रचना है, एक पारलौकिक रचना है। जो लौकिक रचना है वह लोक में शब्द गति करता है। तो पारलौकिक रचना है, जो अन्तर्हृदय रूपी गुफा से तरंगें चलती है, कण्ठ में आ करके वह शब्द बनता है। शब्द के साथ में आकार बनता है और आकार बन करके पृथ्वी की परिक्रमा कर देता है, वह उत्तरायण से दक्षिणायन को गति करता है। दक्षिणायन से ऊर्ध्वा में गति करने वाला वह शब्द कहलाता है वह हृदय रूपी गुफा से एक शब्द चलता है।
भाषार्थ
(ऊर्वोः) दोनों पट्ठों में (ओजः) ओज हो, (जङ्घयोः) दोनों टाँगों= पिण्डलियों में (जवः) वेग हो, (पादयोः) दोनों पैरों में (प्रतिष्ठा) दृढ़ स्थिति की शक्ति हो। (मे) मेरे (सर्वा=सर्वाणि) सब अङ्ग (अरिष्टानि) स्वस्थ हों। (आत्मा) मेरी आत्मा (अनिभृष्टः) अधःपतित न हो।
टिप्पणी
[अनिभृष्टः= अ+नि+भृश् (अधःपतने)। अरिष्टानि= अ+रिष् (हिंसायाम्)।]
विषय
सोत्साह मन
पदार्थ
१. (ऊर्वो) = मेरे ऊरू प्रदेशों में [Thigh]-घुटने से ऊपर जाँघों में (ओजः) = ओज हो। (जङ्घयो: जव:) = घुटने से नीचे टाँगों में [Shanks] (जव:) = वेग हो। (पादयोः प्रतिष्ठा:) = पाँवों में जमाव [दृढ़ता] हो। २. (मे) = मेरे (सर्वा) = सब अंग (अरिष्टानि) = अहिंसित हों। (आत्मा) = मन भी (अनिभृष्टः) [भृश अध:पतने] = नीचे गिरा हुआ-उत्साहशून्य-न हो। मेरा मन सदा सोत्साह बना रहे। (भृश्यति) = [to fall down] मैं कभी निरुत्साहित न हो जाऊँ।
भावार्थ
मेरे ऊरूप्रदेश ओजवाले हों, जाँघ वेगवाली हों, पाँव जमकर पड़ें। सब अंग बड़े ठीक हों और मेरा मन सदा उत्साह से युक्त हो।
विषय
शरीर के अंगों में शक्तियों की याचना।
भावार्थ
(ऊर्वोः) जोड़ों में (ओजः) बल प्राप्त हो। (जंघयोः जवः) जंघाओं में वेग हो और (पादयोः) पैरों में (प्रतिष्ठा) खड़े होने की शक्ति प्राप्त हो। (मे सर्वा [अङ्गानि ]) मेरे समस्त अंग (अरिष्टानि) दुःखरहित पीड़ा रहित हों। और (आत्मा) मेरा समस्त देह और आत्मा (अनिभृष्टः) नीचे न गिरने वाला, एवं संताप से रहित हो।
टिप्पणी
(प्र०) ‘ऊर्वोरोज’, (तृ०) ‘प्रतिष्ठा’ (च०) सर्वान्माति पृष्टाः ‘सर्वात्मा निष्पृष्टाः’, इति क्वचित्। वाङ् मे आस्येस्तु, नसो र्मे प्राणोऽस्तु अक्ष्योर्मे चक्षुस्तु कर्णयो र्मे श्रोत्रमस्तु। बाह्वो र्मे बलमस्तु। अरिष्टानि मे अंगानि तनुस्तन्वा मे सह सन्तु’ इति पद्धतिः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। मन्त्रोक्ता बागादयो देवताः। १ पथ्या बृहती। २ क्कुम्मती परोष्णिक्। द्व्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Physical Health
Meaning
Let there be virility in my thighs, smartness and speed in the legs, balance and firmness in my personality, let all my body parts and systems be unhurt and healthy, and may my soul be ever pure, unsullied and unfallen.
Translation
(May there be) vigour in my two thighs, speed in my two legs, steadiness in my two feet all my organs unimpaired and my-self ever unsubdued.
Translation
May I have power in my thigh, swiftness in my legs, may I have stead-fastness in my feet and may by all the members of the body be uninjured and my soul unimpaired.
Translation
Let there be vigour in my thighs; speed in my legs and stability in my feet. Let all the organs of my body be free from diseases and the soul be not down-cast.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
मन्त्र २ में (प्रतिष्ठा अरिष्टानि) पदों में सन्धि न होने से जाना जाता है कि (पादयोः) पर अवसान होने के स्थान में (प्रतिष्ठा) पर अवसान होना चाहिये ॥ २−(ऊर्वोः) जानूपरिभागयोः (ओजः) सामर्थ्यम् (जङ्घयोः) गुल्फजान्वोरन्तरालयोः (जवः) वेगः (पादयोः) चरणयोः (प्रतिष्ठा) स्थिरता। दृढता (अरिष्टानि) निर्दोषाणि (मे) मम (सर्वा) सर्वाणि अङ्गानि (आत्मा) जीवात्मा (अनिभृष्टः) भृश अधःपतने-क्त। अनधोगतः ॥
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