अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 15 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 2/ सूक्त 15/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - प्राणः, अपानः, आयुः छन्दः - त्रिपाद्गायत्री सूक्तम् - अभय प्राप्ति सूक्त
    पदार्थ -

    (यथा) जैसे (च) निश्चय करके (द्यौः) आकाश (च) और (पृथिवी) पृथिवी दोनों (न)(रिष्यतः) दुःख देते हैं और (न)(बिभीतः) डरते हैं। (एव) ऐसे ही, (मे) मेरे (प्राण) प्राण ! तू (मा बिभेः) मत डर ॥१॥

    भावार्थ -

    यह आकाश और पृथिवी आदि लोक परमेश्वर के नियमपालन से अपने-अपने स्थान और मार्ग में स्थिर रहकर जगत् का उपकार करते हैं, ऐसे ही मनुष्य ईश्वर की आज्ञा मानने से पापों को छोड़कर और सुकर्मों को करके सदा निर्भय और सुखी रहता है ॥१॥

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