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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 17 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 17/ मन्त्र 6
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - प्राणः, अपानः, आयुः छन्दः - एदपदासुरीत्रिष्टुप् सूक्तम् - बल प्राप्ति सूक्त
    63

    चक्षु॑रसि॒ चक्षु॑र्मे दाः॒ स्वाहा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    चक्षु॑: । अ॒सि॒ । चक्षु॑: । मे॒ । दा॒: । स्वाहा॑ ॥१७.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    चक्षुरसि चक्षुर्मे दाः स्वाहा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    चक्षु: । असि । चक्षु: । मे । दा: । स्वाहा ॥१७.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 17; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आयु बढ़ाने के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    [हे ईश्वर !] तू (चक्षुः) दृष्टि [दर्शनशक्ति] (असि) है, (मे) मुझे (चक्षुः) दर्शनशक्ति (दाः) दे, (स्वाहा) यह सुन्दर आशीर्वाद हो ॥६॥

    भावार्थ

    ऋग्वेद पुरुषसूक्त १०।९०।१। में भी परमेश्वर का नाम (सहस्राक्षः) अनन्त दर्शनशक्तिवाला है, इस प्रकार परमात्मा को सर्वद्रष्टा समझकर मनुष्य अपनी दर्शनशक्ति चंगी रक्खे और यथार्थज्ञान प्राप्त करके बहुदर्शी, दूरदर्शी और न्यायकारी होवे ॥६॥

    टिप्पणी

    ६–चक्षुः। अ० १।३३।४। चक्षिङ् दर्शने–उसि। दृष्ट्या। दर्शनशक्त्या ॥

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    विषय

    चक्षु:

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र में वर्णित श्रोत्र के साथ चक्षु भी ज्ञान-प्राति के प्रमुख साधनों में है, अतः उपासक प्रार्थना करता है कि प्रभो! आप (चक्षुः असि) = सम्पूर्ण दृष्टिशक्ति के स्रोत हैं। (मे) = मेरे  लिए (चक्षुः दाः) = दृष्टिशक्ति प्रदान कीजिए। (स्वाहा) = मैं सदा इस शुभ प्रार्थना को करनेवाला बनें। २. चक्षु से प्रकृति की शोभा को देखते हुए हम प्रभु की महिमा को देखनेवाले बनते हैं, अत: वही जीवन वाञ्छनीय है जिसमें दृष्टिशक्ति ठीक बनी रहे।

    भावार्थ

    उत्तम दृष्टिशक्ति को पाकर मैं प्रकृति में सर्वत्र प्रभु को विभूतियों का दर्शन करनेवाला बनू।

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    भाषार्थ

    (चक्षुःअसि) तू चक्षुरूप है, (मे चक्षुः दाः) मुझे दृष्टि शक्ति प्रदान कर, (स्वाहा) सु आह।

    टिप्पणी

    [परमेश्वर के लिए कहा है "पश्यत्यचक्षुः'१ स शृणोत्यकर्ण:"।] [१. परमेश्वर बिना चक्षु के देखता है, यत: वह स्वयं चक्षु रूप है।]

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    विषय

    ओज, सहनशीलता, बल, आयु और इन्द्रियों की प्रार्थना।

    भावार्थ

    हे समस्त संसार के प्रकाशक, सबके द्रष्टा परमात्मन् ! आप (चक्षुः असि) समस्त संसार के द्रष्टा, दर्शक, प्रकाशक, चक्षुःस्वरूप हैं । (मे चक्षुः दाः) मुझे भी चक्षु प्रदान करो, (स्वाहा) मैं यह उत्तम प्रार्थना करता हूं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः । प्राणापानौ वायुश्च देवताः । १-६ एकावसाना आसुर्यस्त्रिष्टुभः । ७ आसुरी उष्णिक् । सप्तर्चं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Elan Vital at the Full

    Meaning

    You are the eye of the universe. Give me the vision divine. This is the voice of truth and payer.

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    Translation

    You are vision (caksuh). May you bestow vision on me. Svāhā.

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    Translation

    O God thou art the power of seeing, give me the power of sight. What a beautiful utterance.

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    Translation

    O God, Eye art Thou, give me eyes. This is my humble prayer. [1]

    Footnote

    [1] God is the Seer. May He grant me foresight. In the Punish Sukta Yajur 31st chapter, Rigveda, 10-90-1. God is spoken of as सहस्राक्षः i.e., possessing the power of a thousand eyes. God is Far-seeing may He grant me foresight.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६–चक्षुः। अ० १।३३।४। चक्षिङ् दर्शने–उसि। दृष्ट्या। दर्शनशक्त्या ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (চক্ষুঃঅসি) তুমি চক্ষুরূপ, (মে চক্ষুঃ দাঃ) আমাকে দৃষ্টি শক্তি প্রদান করো, (স্বাহা) সু আহ ।

    टिप्पणी

    [পরমেশ্বরের জন্য বলা হয়েছে “পশ্যত্যচক্ষুঃ১ স শৃণোত্যকর্ণঃ”।]

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    मन्त्र विषय

    আয়ুর্বর্ধনায়োপদেশঃ

    भाषार्थ

    [হে ঈশ্বর !] তুমি (চক্ষুঃ) দৃষ্টি [দর্শনশক্তি] (অসি) হও, (মে) আমাকে (চক্ষুঃ) দর্শনশক্তি (দাঃ) প্রদান করো, (স্বাহা) এই সুন্দর আশীর্বাদ হোক ॥৬॥

    भावार्थ

    ঋগ্বেদ পুরুষসূক্ত ১০।৯০।১। এও পরমেশ্বরের নাম (সহস্রাক্ষঃ) অনন্ত দর্শনশক্তি-সামর্থ্য, এইভাবে পরমাত্মাকে সর্বদ্রষ্টা বুঝে মনুষ্য নিজের দর্শনশক্তি সতেজ রাখুক এবং যথার্থজ্ঞান প্রাপ্ত করে বহুদর্শী, দূরদর্শী ও ন্যায়কারী হোক ॥৬॥

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