Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 23 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 23/ मन्त्र 5
    ऋषिः - अथर्वा देवता - आपः छन्दः - स्वराड्विषमात्रिपाद्गायत्री सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    46

    आपो॒ यद्व॒स्तेज॒स्तेन॒ तम॑ते॒जसं॑ कृणुत॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आप॑: । यत् । व॒: । तेज॑: । तेन॑ । तम् । अ॒ते॒जस॑म् । कृ॒णु॒त॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: ॥२३.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आपो यद्वस्तेजस्तेन तमतेजसं कृणुत यो३ ऽस्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आप: । यत् । व: । तेज: । तेन । तम् । अतेजसम् । कृणुत । य: । अस्मान् । द्वेष्टि । यम् । वयम् । द्विष्म: ॥२३.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 23; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    कुप्रयोग त्याग के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (आपः) हे जलो ! (यत्) जो (वः) तुम्हारा (तेजः) तेज है, (तेन) उससे (तम्) उस [दोष] को (अतेजसम्) निस्तेज (कृणुत) कर दो, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) अप्रिय करे, [अथवा] (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रिय करें ॥५॥

    भावार्थ

    मन्त्र १ के समान ॥५॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ५ स्वराविषमात्रिपाद्गायत्री॥

    पदार्थ

    १,  २,  ३,  ४,  ५  एवं  मन्त्र संख्या के  केवल भावार्थ ही है |

    भावार्थ

    सर्वव्यापक प्रभु अपने तप आदि के द्वारा द्वेषियों के द्वेष को दूर करे। राजा भी राष्ट्र में गुप्तचरों व अध्यक्षों के द्वारा व्यापक-सा होकर जहाँ भी द्वेष को देखे उसे दूर करने के लिए यत्नशील हो। ज्ञान-प्रचारक भी अपने हृदय को विशाल व उदार बनाता हुआ ज्ञान प्रसार व अपने क्रियात्मक उदाहरण से लोगों को द्वेष की भावना से ऊपर उठने की प्ररेणा दे।

     

    उन्नीस से तेईस तक पाँच सूक्तों का उपदेश

     

    १. इन सूक्तों का भाव ऊपर दिया ही है। मूल भावना द्वेष से ऊपर उठने की है। इस द्वेष से ऊपर उठने के लिए 'अनि, वायु, सूर्य, चन्द्र व आप:' बनना चाहिए। अग्नि की भाँति गतिशील [अगि गतौ], वायु की भाँति गति के द्वारा बुराइयों को दूर करनेवाला[वा गतिगन्धनयो:], सूर्य की भाँति सरणशील व कर्मप्रेरणा देनेवाला, चन्द्रमा की भाँति आहादमय तथा आपः की भौति व्यापकतावाला बनने से द्वेष का प्रसङ्ग रहता ही नहीं। २. इसीप्रकार द्वेष को दूर करने के लिए 'तपस, हरस, अर्चिस्, शोचिस् व तेजस्' का साधन आवश्यक है। तप सब मलों का

    अथ द्वितीयं काण्डम् हरण करता है। ज्ञानज्वाला जीवन को शुचि व दीस बनाती है। तेजस्विता के सामने द्वेषादि भाव स्वयं अभिभूत व निस्तेज हो जाते है, तेजस्विता के साथ द्वेष का निवास नहीं। ३. अग्नि शरीर में 'वाणी' है, वायु 'प्राण', सूर्य'चक्षु', चन्द्र 'मन' और आपः 'रेतस्' है। 'वाणी का संयम, प्राणसाधना[प्राणायाम], तत्त्वदर्शन, मनो-निग्रह, ऊर्ध्व-रेतस्कता' द्वेष आदि सब अशुभ भावनाओं को समास कर देते हैं। एवं ये पाँच साधन मनुष्य के जीवन को अत्यन्त उन्नत व सुन्दर बनानेवाले हैं। अगले सूक्त में सब अशुभ वासनाओं के विनाश का ही निर्देश है। इस सूक्त का ऋषि ब्रह्मा है-वृद्धिवाला। देवता 'आयुः' है-उत्तम जीवन । ब्रह्मा चाहता है कि -

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    [परमेश्वर तेजःस्वरूप है, वह निज तेज द्वारा आसुर विचारों और कर्मों के तेज को तेजोरहित कर देता है, जिससे आसुर विचार और कर्म व्यक्ति पर निज प्रभाव नहीं कर पाते। यह कथन आध्यात्मिक देवासुर संग्राम की दृष्टि से है।]

    टिप्पणी

    [राष्ट्रिय दृष्टि से विचार--- राष्ट्रिय दृष्टि से राष्ट्र के राजा के स्वरूप पर निम्नलिखित श्लोक विशेष प्रकाश डालता है । यथा "सोऽग्निर्भवति वायूश्च सोऽर्कः सोमः स धर्मराट्। स कुबेर: स वरुणः स महेन्द्र: प्रभावतः।।" (सत्यार्थप्रकाश, समुल्लास ६) तथा (मनु० ७।७)। इस श्लोक में राजा को अग्नि, वायु, सूर्य [अर्कः], चन्द्र [सोमः], आपः, [वरुणः] द्वारा कहा है। वरुण है "अपामधिपति:" (अथर्व० ५।२४।४)। यतः आपः का अधिपति है वरुण, इसलिए अधिपति द्वारा आपः का कथन हुआ है। अग्नि से आप: तक का कथन अथर्व० २।१९-२३ में भी हुआ है। अतः मनु० और अथर्व० में दैवतसाम्य है। अथर्व० में जो "योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः" कहा है वह शत्रु राष्ट्र का राजा और वैदिक राष्ट्र का राजा है। इस प्रकार राष्ट्रिय दृष्टि से वास्तविक राष्ट्रिय शत्रुओं को निर्दिष्ट किया है।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Apah Devata

    Meaning

    O waters, the splendour that is in you, with that wash off that which hates us and that which we hate to suffer. prayer for natural purity of spirit, energy for action and balance of mind in our process of living. The human body is an abode of divinities. Agni abides in the vital heat, the tongue and speech. Vayu abides in pranic energy and the tactual faculty. The sun abides in the eye. The moon abides in the mind. And the waters abide in the male virility and fertility of the female in addition to the fluidity of blood. This knowledge is enshrined in the Aitareya Upanishad. Hence the prayer to Agni is a prayer for vitality against frigidity and anger. The prayer to Vayu is for energy against debility and sloth. The prayer to the sun is for light against darkness and ignorance. The prayer to the moon is for peace against agitation and hypertension. And the prayer to the waters is for fluidity in the dynamics of life. On the whole the prayer is for positive values of health, mental and spiritual alertness in a state of balance. Both want and excess are negativities in one way or another. Balance gives us the optimum state of performance. ‘Dvesha’ means hate. Negativities in these hymns are personified as enemies which we hate, whether they are in others or in ourselves. At the same time negativities hate us because they act as our enemies. Hence the prayer: With your positive powers, destroy those negativities which hate us and which we too hate because, whether they are in others or in ourselves, we hate to suffer them as enemies of life. Hence the prayer for cleansing of the personality. To hate negativity does not mean that we hate the person who suffers from negativity. We love the person as person, hence the prayer for elimination of the negativity and cleansing of the person.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O waters, whatever lustre you have, with that may you make him lusterless, who hates us and whom we hate.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Let the waters, with that of their heat, etc, like the pervious Hymn XIX.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O God, the Goal and Shelter of all, with Thy Passionate power, make him, who hates us, or whom we do not love, sober and non-violent!

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top