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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 25 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 25/ मन्त्र 1
    ऋषिः - चातनः देवता - वनस्पतिः पृश्नपर्णी छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - पृश्नपर्णी सूक्त
    488

    शं नो॑ दे॒वी पृ॑श्निप॒र्ण्यशं॒ निरृ॑त्या अकः। उ॒ग्रा हि क॑ण्व॒जम्भ॑नी॒ ताम॑भक्षि॒ सह॑स्वतीम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    शम् । न॒: । दे॒वी । पृ॒श्नि॒ऽप॒र्णी । अश॑म् । नि:ऽऋ॑त्यै । अ॒क॒: । उ॒ग्रा । हि । क॒ण्व॒ऽजम्भ॑नी । ताम् । अ॒भ॒क्षि॒ । सह॑स्वतीम् ॥२५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शं नो देवी पृश्निपर्ण्यशं निरृत्या अकः। उग्रा हि कण्वजम्भनी तामभक्षि सहस्वतीम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    शम् । न: । देवी । पृश्निऽपर्णी । अशम् । नि:ऽऋत्यै । अक: । उग्रा । हि । कण्वऽजम्भनी । ताम् । अभक्षि । सहस्वतीम् ॥२५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 25; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रुओं के नाश के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (देवी) दिव्य गुणवाली (पृश्निपर्णी) सूर्य वा पृथिवी की पालनेवाली [अथवा, सूर्य वा पृथिवी जैसे पत्तेवाली ओषधिरूप परमेश्वरशक्ति] ने (नः) हमारे [पुरुषार्थियों के] लिये (शम्) सुख और (निर्ऋत्यै) दुःखदायिनी अलक्ष्मी, महामारी आदि पीड़ा के लिये (अशम्) दुःख (अकः=अकार्षीत्) किया है। (हि) क्योंकि वह शक्ति (उग्रा) प्रचण्ड और (कण्वजम्भनी) पाप की नाश करनेवाली है, [इसलिये] (ताम्) उस (सहस्वतीम्) बलवती को (अभक्षि) मैंने भजा वा पूजा है ॥१॥

    भावार्थ

    परमेश्वर ने सूर्य आदि बड़े-बड़े लोकों को धारण किया है और जैसे पृथिवी पर अन्नादि ओषधियाँ अपने पत्ते, फलादि से उपकार करती हैं, वैसे ही परमेश्वर की सृष्टि में सूर्यादिलोक आकर्षण, धारण, वृष्टि आदि से परस्पर उपकारी होते हैं। परमेश्वर अपने आज्ञापालक पुरुषार्थियों को सुख और आज्ञानाशक कर्महीनों को दुःख देता है। उस दयालु और प्रचण्ड परमात्मा की आज्ञा मानकर हम सदा आनन्द भोगें ॥१॥

    टिप्पणी

    टिप्पणी–(पृश्नि) शब्द का अर्थ सूर्य है–निरु० २।२४ और पृथिवी, छोटा और विचित्र भी है और (पर्ण) का अर्थ पालन और पत्ते हैं। सायणाचार्य ने (पृश्निपर्णी) का अर्थ चित्रपर्णी ओषधि लिखा है। शब्दकल्पद्रुमकोष में वर्णन है कि (पृश्निपर्णी) छोटे पत्तेवाली लता विशेष है, उसे बंगला में “चाकुलिया” और नागरी में “चकरौत्” कहते हैं, इसके गुण कटुत्व और अतीसार, कास, वातरोग, ज्वर, उन्माद, व्रण और दाहनाशक हैं ॥ १–शम्। सुखम्। नः। अस्मभ्यम्। देवी। दीप्यमाना। पृश्निपर्णा। पृश्निः–इति व्याख्यातम्, अ० २।१।१। स्पृश स्पर्शे–नि, सलोपः। पृश्निः=सूर्यः, पृथिवी। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। इति पॄ पालनपूरणयोः–न। पिपर्त्ति पालयति पूरयति वा तत् पर्णं पत्रं वा। स्त्रियां ङीप्। सूर्यस्य पृथिव्या वा परमेश्वरस्य पालनशक्तिः। सूर्यवत् पृथिवीवद्वा पर्णानि पत्राणि यस्याः सा पृश्निपर्णी, ओषधिरूपा परमेश्वरशक्तिः। पृश्निपर्णी चित्रपर्णी ओषधीः–इति सायणः। पृश्नि स्वल्पं पर्णमस्याः–लताविशेषः, चाकुलिया इति बङ्गभाषा, चकरौत् इति हिन्दीभाषा, अस्या गुणाः। कटुत्वम्, अतीसारकासवातरोगज्वरोन्मादव्रणदाहनाशित्वञ्च–इति शब्दकल्पद्रुमे। अशम्। अशान्तिम्। दुःखम्। निर्ऋत्यै। अ० १।३१।२। निः+ऋ हिंसने–क्तिन्। अलक्ष्यै, निर्धनतायै। अकः। डुकृञ् करणे लुङ्। मन्त्रे घस०। पा० २।४।८०। इति च्लेर्लुक्। गुणे। हल्ङ्याब्भ्यो०। पा० ६।१।६८। इति तिलोपः। अकार्षीत्, कृतवती। उग्रा। अ० १।१०।१। उच समवाये–रक्। प्रचण्डा। हि। यस्मात् कारणात्। कण्वजम्भनी। अशूप्रुषिलटिकणिखटिविशिभ्यः क्वन्। उ० १।१५१। इति कण गतौ, आर्तस्वरे–क्वन्। कण्यते अपोद्यते तत् कण्वं पापम्। जभि नष्टीकरणे–ल्युट्, ङीप्। पापस्य नाशयित्री। अभक्षि। भज सेवायाम्, लुङि आत्मनेपदोत्तमैकवचनम्। अहं सेवितवानस्मि। सहस्वतीम्। सहस्–मतुप् ङीप्। तसौ मत्वर्थे। पा० १।४।१९। इति भत्वेन अपदत्वाद् रुत्वाभावः। अभिभवनशीलाम्। बलवतीम् ॥

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    विषय

    कण्वजम्भनी पृश्निपर्णी

    पदार्थ

    १. (देवी) = रोगों को जीतने की कामना करनेवाली यह (पृश्निपी) = चित्रपर्णी नामक ओषधि (न: शम्) = हमारे लिए शान्ति करनेवाली हो। निऋत्या = रोग की निदानभूत दुर्गति के लिए यह (अशं अक:) = दुःख [अशान्ति] करे, अर्थात् निऋति को हमसे दूर करके यह हमें नीरोग करे। २. यह पृश्निपर्णी (हि) = निश्चय से (उग्रा) = बड़ी तीव्र व तेजस्विनी है, (कण्वजम्भनी) = पापों व रोगों को नष्ट करनेवाली है, (ताम्) = उस (सहस्वतीम्) = प्रशस्त बलवाली व शत्रुभूत रोगबीजों का मर्षण करनेवाली पृश्निपर्णी का (अभक्षि) = मैं सेवन करता हूँ।

    भावार्थ

    पृश्निपी ओषधि का प्रयोग रोगबीजों व पापों को नष्ट करके हमें शरीर व मन से स्वस्थ बनाता है।

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    भाषार्थ

    (देवो) दिव्यगुणोंवाली (पृश्निपर्णी) चित्रपर्णोंवाली ओषधि ने (नः) हमें (शम् अकः) सुखी किया है, और (निर्ऋत्यै) कृच्छ्रापत्ति के लिए (अशम् ) दुःख किया है। (कण्वजम्भनी) कण्व का नाश करनेवाली (हि) निश्चय से (उग्रा) कण्व के विनाश करने में उग्ररूपा है। (ताम् ) उस (सहस्वतीम् ) रोगपराभव करनेवाली का (अभक्षि) मैंने भक्षण किया है, [या मैंने अनुलेपन आदि द्वारा सेवन किया है] (सायण)

    टिप्पणी

    [कण्वस्य पापस्य (सायण)। कण्व= कण सदृश सूक्ष्म रोग कीटाणु (germs)]

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    विषय

    पृश्निनपर्णी ओषधि का वर्णन।

    भावार्थ

    (पृश्निपर्णी) पृश्निपर्णी नाम की ओषधि (देवी) दिव्य गुण वाली (नः) हमें (शं) कल्याण सुख करे और (निर्ऋत्याः) निर्ऋति=पापप्रवृत्ति का (अशं) भक्षण (अकः) करे । वह (हि) क्योंकि (कण्वजम्भनी) पाप और पाप से उत्पन्न होने हारे कुष्ठ आदि रोगों को नाश करने में (उग्रा) बड़ी तीव्र और बलवती ओषधि है। (तां) उस (सहस्वतीं) रोगशमन करने के बलवाली ओषधि को मैं (अभति) सेवन करूं।

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘निऋतमे करत्’ (च०) ‘तां त्वाहार्ष सहस्त्रतीम्’ इति पेप्प० सं०। १ चित्रपर्णी इति सायणः। माषपर्णीति कात्यायनश्रौतसूत्रकारभाष्यकृत्। लक्ष्मणेति केचित् याच पुत्रजननी, पुंकन्दा, पुत्रकन्देति नाम्नी अस्ति ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चातन ऋषिः । वनस्पतिर्देवता । पृश्निपर्णीस्तुतिः । १,३,५ अनुष्टुभः। ४ भुरिगनुष्टुप् । पञ्चर्चं सूक्तम् ॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destruction of Anti-Life

    Meaning

    Let Prshniparni, divine herb of bright rainbow leaves, be auspicious for us. Let it act agaist and root out consumptive and cancerous diseases of body and mind. Strong it is, mighty powerful devourer of sin and negativity. I have studied and researched it and I value it as a divine sanative worthy of adoration.

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    Subject

    Prsniparni

    Translation

    The pršniparņī (a plant with spotted leaves) with its divine qualities (devi) has done good (Sam) to us and bad (aSam) to wretchedness (nirrti). She is a terrible destroyer of the roots of diseases, (kaņva-jambhanī). That tonic herb I have used.

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    Translation

    Let Prishni Possessing wonderful effect be auspicious for us and eat up the disease, as this heat is the destroyer of leprosy and has a very effective potency. I, if need arises, use this mighty medicine.

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    Translation

    God's divine power, that guards the Sun and Earth, brings us joy, and woe to an epidemic. Fierce crusher of sin is she. Her have I adored. [1]

    Footnote

    [1] पृश्निपर्णी means the power of God, that guards the Sun and Earth, पृश्निः= सूर्यः, पृथिवी ।३३।६। पर्णीः पिर्ति पालयति. Prishniparni is also the name of a medicine, that removes cholera and other diseases. Its leaves are like the disc of the Sun. Its use cures diseases and grants health and joy. Griffith describes Kanvyas as a class of evil spirits. There is no history in the Vedas. The interpretation is illogical. The word means sin.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    टिप्पणी–(पृश्नि) शब्द का अर्थ सूर्य है–निरु० २।२४ और पृथिवी, छोटा और विचित्र भी है और (पर्ण) का अर्थ पालन और पत्ते हैं। सायणाचार्य ने (पृश्निपर्णी) का अर्थ चित्रपर्णी ओषधि लिखा है। शब्दकल्पद्रुमकोष में वर्णन है कि (पृश्निपर्णी) छोटे पत्तेवाली लता विशेष है, उसे बंगला में “चाकुलिया” और नागरी में “चकरौत्” कहते हैं, इसके गुण कटुत्व और अतीसार, कास, वातरोग, ज्वर, उन्माद, व्रण और दाहनाशक हैं ॥ १–शम्। सुखम्। नः। अस्मभ्यम्। देवी। दीप्यमाना। पृश्निपर्णा। पृश्निः–इति व्याख्यातम्, अ० २।१।१। स्पृश स्पर्शे–नि, सलोपः। पृश्निः=सूर्यः, पृथिवी। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। इति पॄ पालनपूरणयोः–न। पिपर्त्ति पालयति पूरयति वा तत् पर्णं पत्रं वा। स्त्रियां ङीप्। सूर्यस्य पृथिव्या वा परमेश्वरस्य पालनशक्तिः। सूर्यवत् पृथिवीवद्वा पर्णानि पत्राणि यस्याः सा पृश्निपर्णी, ओषधिरूपा परमेश्वरशक्तिः। पृश्निपर्णी चित्रपर्णी ओषधीः–इति सायणः। पृश्नि स्वल्पं पर्णमस्याः–लताविशेषः, चाकुलिया इति बङ्गभाषा, चकरौत् इति हिन्दीभाषा, अस्या गुणाः। कटुत्वम्, अतीसारकासवातरोगज्वरोन्मादव्रणदाहनाशित्वञ्च–इति शब्दकल्पद्रुमे। अशम्। अशान्तिम्। दुःखम्। निर्ऋत्यै। अ० १।३१।२। निः+ऋ हिंसने–क्तिन्। अलक्ष्यै, निर्धनतायै। अकः। डुकृञ् करणे लुङ्। मन्त्रे घस०। पा० २।४।८०। इति च्लेर्लुक्। गुणे। हल्ङ्याब्भ्यो०। पा० ६।१।६८। इति तिलोपः। अकार्षीत्, कृतवती। उग्रा। अ० १।१०।१। उच समवाये–रक्। प्रचण्डा। हि। यस्मात् कारणात्। कण्वजम्भनी। अशूप्रुषिलटिकणिखटिविशिभ्यः क्वन्। उ० १।१५१। इति कण गतौ, आर्तस्वरे–क्वन्। कण्यते अपोद्यते तत् कण्वं पापम्। जभि नष्टीकरणे–ल्युट्, ङीप्। पापस्य नाशयित्री। अभक्षि। भज सेवायाम्, लुङि आत्मनेपदोत्तमैकवचनम्। अहं सेवितवानस्मि। सहस्वतीम्। सहस्–मतुप् ङीप्। तसौ मत्वर्थे। पा० १।४।१९। इति भत्वेन अपदत्वाद् रुत्वाभावः। अभिभवनशीलाम्। बलवतीम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (দেবী) দিব্য গুণান্বিত (পৃশ্নিপর্ণী) চিত্রপর্ণ ঔষধি (নঃ) আমাদের (শম্ অকঃ) সুখী করেছে, এবং (নিৠত্যৈ) কৃচ্ছ্রাপত্তির জন্য (অশম্) দুঃখ করেছে। (কণ্বজম্ভনী) কণ্ব এর বিনাশকারী (হি) নিশ্চিতরূপে (উগ্রা) কণ্ব-এর বিনাশ করার ক্ষেত্রে উগ্ররূপা। (তাম্‌) সেই (সহস্বতীম) রোগবিনাশকারীর/রোগনিবারকের (অভক্ষি) আমি ভক্ষণ করেছি, [বা আমি অনুলেপন আদি দ্বারা সেবন করেছি] (সায়ণ)

    टिप्पणी

    [কণ্বস্য= পাপস্য (সায়ণ)। কণ্ব = কণা সদৃশ সূক্ষ্ম রোগ জীবাণু (germs)।]

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    मन्त्र विषय

    শত্রুনাশায়োপদেশঃ

    भाषार्थ

    (দেবী) দিব্য গুণান্বিত (পৃশ্নিপর্ণী) সূর্য বা পৃথিবীর পালনকারী [অথবা, সূর্য বা পৃথিবী সদৃশ পত্রবিশিষ্ট ঔষধিরূপ পরমেশ্বরশক্তি] (নঃ) আমাদের [পুরুষার্থীদের] জন্য (শম্) সুখ ও (নির্ঋত্যৈ) দুঃখদায়িনী অলক্ষ্মী, মহামারী আদি পীড়ার জন্য (অশম্) দুঃখ (অকঃ=অকার্ষীৎ) করেছে। (হি) কেননা সেই শক্তি (উগ্রা) প্রচণ্ড ও (কণ্বজম্ভনী) পাপের বিনাশক, [এইজন্য] (তাম্) সেই (সহস্বতীম্) বলবতীকে (অভক্ষি) আমি ভজনা বা পূজা করেছি ॥১॥

    भावार्थ

    পরমেশ্বর সূর্য আদি বড়ো-বড়ো লোক ধারণ করেছেন এবং যেমন পৃথিবীতে অন্নাদি ঔষধি নিজের পত্র, ফলাদি দ্বারা উপকার করে, সেভাবেই পরমেশ্বরের সৃষ্টিতে সূর্যাদিলোক আকর্ষণ, ধারণ, বৃষ্টি আদি দ্ধারা পরস্পর উপকারী হয়। পরমেশ্বর নিজের আজ্ঞাপালক পুরুষার্থীদের সুখ ও আজ্ঞানাশক কর্মহীনকে দুঃখ প্রদান করেন। সেই দয়ালু ও প্রচণ্ড পরমাত্মার আজ্ঞা মেনে আমরা সদা আনন্দ ভোগ করি ॥১॥ (পৃশ্নি) শব্দের অর্থ সূর্য–নিরু০ ২।২৪ এবং পৃথিবী, ছোটো এবং বিচিত্র এবং (পর্ণ) এর অর্থ পালন এবং পত্র হয়। সায়ণাচার্য (পৃশ্নিপর্ণী) এর অর্থ চিত্রপর্ণী ঔষধি লিখেছেন। শব্দকল্পদ্রুমকোষে বর্ণনা আছে (পৃশ্নিপর্ণী) ছোটো পত্রবিশিষ্ট লতা বিশেষ, বাংলায় শংকরজটা/চালপানি/চাকালি/বান্দরঝুটি বলা হয়, এর গুণ কটুত্ব এবং অতিসার, কাশি, বাতরোগ, জ্বর, উন্মাদ, ব্রণ এবং দাহনাশক ॥

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