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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 29 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 29/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - अग्निः, आयुः, बृहस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायुष्य सूक्त
    91

    पार्थि॑वस्य॒ रसे॑ देवा॒ भग॑स्य त॒न्वो॑३ बले॑। आ॑यु॒ष्य॑म॒स्मा अ॒ग्निः सूर्यो॒ वर्च॒ आ धा॒द्बृह॒स्पतिः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    पार्थि॑वस्य । रसे॑ । दे॒वा॒: । भग॑स्य । त॒न्व᳡: । बले॑ । आ॒यु॒ष्य᳡म् । अ॒स्मै । अ॒ग्नि: । सूर्य॑: । वर्च॑: । आ । धा॒त् । बृ॒ह॒स्पति॑: ॥२९.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    पार्थिवस्य रसे देवा भगस्य तन्वो३ बले। आयुष्यमस्मा अग्निः सूर्यो वर्च आ धाद्बृहस्पतिः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    पार्थिवस्य । रसे । देवा: । भगस्य । तन्व: । बले । आयुष्यम् । अस्मै । अग्नि: । सूर्य: । वर्च: । आ । धात् । बृहस्पति: ॥२९.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 29; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्य अपनी उन्नति करता रहे, इसका उपदेश।

    पदार्थ

    (देवाः) हे व्यवहारकुशल, महात्माओं ! (अग्निः) सर्वव्यापक, (सूर्यः) लोकों में चलनेवाला, वा लोकों का चलानेवाला, (बृहस्पतिः) बड़े-बड़े [ब्रह्माण्डों] का रक्षक परमेश्वर ! (पार्थिवस्य) पृथिवी पर वर्त्तमान (भगस्य) ऐश्वर्य के (तन्वः) विस्तार के (रसे) रस अर्थात् तत्त्वज्ञान और (बले) बल में (अस्मै) इस [जीव] को (आयुष्यम्) आयु बढ़ानेवाला (वर्चः) तेज [शरीरकान्ति और ब्रह्मवर्चस] (आ) सब ओर से (धात्=धत्तात्) देवे ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य विद्वानों के सत्सङ्ग से आध्यात्मिक पक्ष में परमेश्वर के ज्ञान से और आधिभौतिक पक्ष में (अग्नि) जो बिजुली आदि रूप से सब शरीरों में बड़ा उपयोगी पदार्थ है और (सूर्य) जो अनेक बड़े-बड़े लोकों को अपने आकर्षण आदि में रखता है, इनके विज्ञान से, अपनी शरीरकान्ति और आत्मिकशक्ति बढ़ावें और पृथिवी आदि पदार्थों के सारतत्त्व से उपकार लेकर प्रतापी, यशस्वी और चिरंजीवी बनें ॥१॥

    टिप्पणी

    १–पार्थिवस्य। अ० २।२८।३। भूमेः सम्बन्धिनः। रसे। रस स्वने आस्वादे–अच्। सारे शरीरपुष्टौ। देवाः। हे व्यवहारकुशला विद्वांसः। भगस्य। अ० १।१४।१। भज सेवायाम्–घ। ऐश्वर्यस्य। तन्वः। अ० १।१। विस्तारस्य। बले। आत्मशरीरसामर्थ्ये। आयुष्यम्। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। आयुष्–यत्। जीवनवर्धकम्। अस्मै। निर्दिष्टप्राणिने। अग्निः। व्यापकः। तेजोविशेषः। सूर्यः। अ० १।३।५। राजसूयसूर्य०। पा० ३।१।११४। अत्र सिद्धान्तकौमुदीटीकायां भट्टोजिदीक्षितः। “सरत्याकाशे सूर्यः। यद्वा सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयतीति”। परमेश्वरः। सूर्यलोकः। वर्चः। तेजः शरीरकान्तिर्ब्रह्मवर्चसं च। आ। समन्तात्। यथाविधि। धात्। छान्दसं रूपम्। धत्तात्। धेयात्। स्थापयतु। बृहस्पतिः। अ० १।८।२। महतां पृथिव्यादिलोकानां रक्षकः प्रकाशवृष्टिदानेनाकर्षणेन च। परमात्मा। सूर्यः ॥

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    विषय

    आयुष्य व वर्चस्

    पदार्थ

    १. (देवा:) = सूर्य, वायु, अग्नि आदि सब देव (पार्थिवस्य) = इस पृथिवी से उत्पन्न ओषधियों के (रसे) = रस का सेवनवाले होने पर (भगस्य) = इस श्री-सम्पन्न [भग-श्री] (तन्व:) = शरीर के (बले) = बल के होने पर (अस्मै) = इसके लिए (अग्नि:) = अग्नि (आयुष्यम्) = दीर्घजीवन को (आधात्) = स्थापित करे। (सूर्यः) = सूर्य इसमें (वर्च:) = रोगों को पराजित करनेवाली वर्चस् शक्ति को स्थापित करे और इसप्रकार यह (बृहस्पतिः) = बृहस्पति बने। २. शरीर को श्रीसम्पन्न तथा शक्तियुक्त करने के लिए सबसे प्रथम बात तो यह है कि हम पार्थिव ओषधियों के रसों का ही प्रयोग करें, मांसाहार से दूर रहें। देवों का बल पार्थिव रस में है तो मांसाहार में आसुर बल है। ३. दीर्घजीवन की प्रार्थना अग्नि से की है। घर में नियमितरूप से अग्निहोत्र करने पर ('अग्निहोत्रेण प्रणुदा सपत्नान्') = रोगकृमिरूप सपत्नों का नाश होकर दीर्घजीवन मिलता है। यह अग्निहोत्र सौमनस्य का कारण होकर हमारे दीर्घजीवन को सिद्ध करता है। ४. सूर्य अपनी किरणों में प्राणशक्ति को लेकर उदय होता है ('प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य:') = यह सूर्य क्या उदय होता है, यह तो प्रजाओं का प्राण ही उदय होता है। इसप्रकार अग्नि और सूर्य के अनुग्रह को प्राप्त करनेवाला यह व्यक्ति उन्नत होकर कादिक का अधिपति 'बृहस्पति' बनता है। यही मानव की चरमोन्नति है।

    भावार्थ

    हम पार्थिव ओषधियों के रस का ही प्रयोग करें, अग्निहोत्र करें, सूर्य-किरणों के सम्पर्क में अधिक-से-अधिक समय बिताएँ। इसप्रकार उन्नत होकर बृहस्पति बनें।

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    भाषार्थ

    (देवाः) देवों ने (पार्थिवस्य) पार्थिव शरीर के ( रसे) रस अर्थात् वीर्य में, (भगस्य तन्वः बले) भग और तन् सम्बन्धी बल में, (अग्निः सूर्यः) अग्नि और सूर्य ने (अस्मै) इस ब्रह्मचारी के लिए (आयुष्यम् ) स्वस्थ तथा दीर्घायु, तथा (बृहस्पतिः) बृहती वेदवाणी के पति परमेश्वर ने (वर्चः१) वेदाध्ययनसम्बन्धी तेज (आ धात्) ब्रह्मचारी में स्थापित किया है।

    टिप्पणी

    [ब्रह्मचर्यकाल में ब्रह्मचारी में जिन शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ है, उनका वर्णन मन्त्र में हुआ है। ये शक्तियां ब्रह्मचारी में दिव्य तत्त्वों द्वारा प्राप्त हुई हैं। भग का अर्थ है आदित्य, जोकि अभी उदित नहीं हुआ परन्तु उदीयमान है। "अधो भग इत्याहुरनुत्सृप्तो न दृश्यते" (निरुक्त १२।२।१३)। भग की उत्सृप्त रश्मियों के कारण उषा का जन्म होता है, जोकि प्रकाश मान है और अन्धकार का विनाश करती है। यह भग का ही बल है, जिसके कारण अनुदित सूर्य भी उषा को प्रकाशित कर अन्धकार का विनाश करता और जगत् को प्रकाशित करता है। यह बल अनुदित भग में है। ब्रह्मचर्यकाल को पूर्ण कर वह गृहस्थाश्रम में आया है। सूक्त में उसके गृहस्थाश्रम का वर्णन हुआ है।] [१. श्रुताध्ययनजन्यं तेजः (सायण)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Life and Progress

    Meaning

    May the brilliant nobilities of the world, Brha- spati, Lord Almighty, sagely scholar of the Vedic lore, Agni, lord self-refulgent, and the sun, grant this man the lustre of a long life and establish him in the strength of body and in the essence and joy of earthly glory.

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    Subject

    Agni-Surya and Other Devatās

    Translation

    O bounties of Nature, may Agni, the adorable Lord, Sūrya, the Sun, Brahaspati, the Lord supreme, bestow on the sacrificer a long life, eminence and lustre, that he is always available on this earth with physical fitness, and past deeds.

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    Translation

    Let the wonderful physical forces: fire, Sun and air, give life and strength in the vigor of the child’s body which is the essence of earth and is the abode of Bhaga, the mundane pleasure and suffering.

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    Translation

    O noble souls, may this person be merry enjoying the juice derived from earthly products and the strength of his own virtue. May the All Pervading, Refulgent Gods, the Guardian of vast worlds, grant him physical and spiritual force that conduces to longevity.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १–पार्थिवस्य। अ० २।२८।३। भूमेः सम्बन्धिनः। रसे। रस स्वने आस्वादे–अच्। सारे शरीरपुष्टौ। देवाः। हे व्यवहारकुशला विद्वांसः। भगस्य। अ० १।१४।१। भज सेवायाम्–घ। ऐश्वर्यस्य। तन्वः। अ० १।१। विस्तारस्य। बले। आत्मशरीरसामर्थ्ये। आयुष्यम्। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। आयुष्–यत्। जीवनवर्धकम्। अस्मै। निर्दिष्टप्राणिने। अग्निः। व्यापकः। तेजोविशेषः। सूर्यः। अ० १।३।५। राजसूयसूर्य०। पा० ३।१।११४। अत्र सिद्धान्तकौमुदीटीकायां भट्टोजिदीक्षितः। “सरत्याकाशे सूर्यः। यद्वा सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयतीति”। परमेश्वरः। सूर्यलोकः। वर्चः। तेजः शरीरकान्तिर्ब्रह्मवर्चसं च। आ। समन्तात्। यथाविधि। धात्। छान्दसं रूपम्। धत्तात्। धेयात्। स्थापयतु। बृहस्पतिः। अ० १।८।२। महतां पृथिव्यादिलोकानां रक्षकः प्रकाशवृष्टिदानेनाकर्षणेन च। परमात्मा। सूर्यः ॥

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