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अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 32/ मन्त्र 3
    ऋषिः - काण्वः देवता - आदित्यगणः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कृमिनाशक सूक्त
    58

    अ॑त्रि॒वद्वः॑ क्रिमयो हन्मि कण्व॒वज्ज॑मदग्नि॒वत्। अ॒गस्त्य॑स्य॒ ब्रह्म॑णा॒ सं पि॑नष्म्य॒हं क्रिमी॑न् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒त्त्रि॒ऽवत् । व॒: । क्रि॒म॒य॒: । ह॒न्मि॒ । क॒ण्व॒ऽवत् । ज॒म॒द॒ग्नि॒ऽवत् । अ॒गस्त्य॑स्य । ब्रह्म॑णा । सम् । पि॒न॒ष्मि॒ । अ॒हम् । क्रिमी॑न् ॥३२.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अत्रिवद्वः क्रिमयो हन्मि कण्ववज्जमदग्निवत्। अगस्त्यस्य ब्रह्मणा सं पिनष्म्यहं क्रिमीन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अत्त्रिऽवत् । व: । क्रिमय: । हन्मि । कण्वऽवत् । जमदग्निऽवत् । अगस्त्यस्य । ब्रह्मणा । सम् । पिनष्मि । अहम् । क्रिमीन् ॥३२.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 32; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    कीड़ों के समान दोषों का नाश करे, इसका उपदेश।

    पदार्थ

    (क्रिमयः) हे कीड़ों ! (वः) तुमको (अत्त्रिवत्) दोषभक्षक, वा गतिशील, मुनि के समान (कण्ववत्) स्तुतियोग्य मेधावी पुरुष के समान, (जमदग्निवत्) आहुति खानेवाले अथवा प्रज्वलित अग्नि के सदृश तेजस्वी पुरुष के समान, (हन्मि) मैं मारता हूँ। (अगस्त्यस्य) कुटिल गति पाप के छेदने में समर्थ परमेश्वर के (ब्रह्मणा) वेदज्ञान से (अहम्) मैं (क्रिमीन्) कीड़ों को (सम् पिनष्मि) पीसे डालता हूँ ॥३॥

    भावार्थ

    मनुष्य को ऋषि, मुनि, धर्मात्माओं के अनुकरण से वेदज्ञान प्राप्त करके पाप का नाश करना चाहिये ॥३॥ मन्त्र ३–५ अथर्ववेद का० ५ सू० २३ मन्त्र १०–१२ में भी हैं ॥

    टिप्पणी

    ३–अत्त्रिवत्। अदेस्त्रिनिश्च। उ० ४।६७। इति अद भक्षणे अत सातत्यगमने वा–त्रिप्। अत्ति दोषान् भक्षयति नाशयतीति अततीति वा अत्रिः। मुनिः। अथवा। रसान् अत्तीति सूर्यः। तत्सदृशः। वः। युष्मान्। क्रिमयः। हे क्षुद्रजन्तवः। हन्मि। नाशयामि। कण्ववत् अ० २।२५।३। अशूप्रुषिलटिकणि०। उ० १।१५१। इति कण शब्दे, निमीलने–क्वन्। कणति उपदेशशब्दं करोति, कण्यते स्तूयते वा। निमीलयति परान् वा स्वतेजसा। मेधाविवत्–निघ० ३।१५। जमदग्निवत्। जमु भक्षणे, दीप्तौ च–शतृ+अग्नि–वतुप्। जमदग्नयः प्रजमिताग्नयो वा प्रज्वलिताग्नयो वा–निरु० ७।२४। जमन् हुतभक्षणशीलः अथवा प्रज्वलितो अग्निरिव तेजो येषां ते जमदग्नयः। तत्सदृशः। अगस्त्यस्य। अग वक्रगतौ–अच् ततः। वसेस्तिः। उ० ४।१८०। इति अग+असु क्षेपणे–भावे ति प्रत्ययः। तत्र साधुः। पा० ४।४। इति यत्। पृषोदरादित्वाद् दीर्घाभावः। अगस्य कुटिलगतेः पापस्य असने उत्पाटने समर्थस्य परमेश्वरस्य। ब्रह्मणा। अ० १।८।४। वेदज्ञानेन। सम्+पिनष्मि। अ० २।३१।१। संचूर्णयामि। अन्यद् गतम् ॥

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    विषय

    अत्रि, कण्व, जमदग्नि, अगस्त्य

    पदार्थ

    १. हे (क्रिमय:) = रोगकृमियो! मैं (अत्रिवत्) = अत्रि की भाँति (वः इन्मि) = तुम्हें नष्ट करता हूँ, (कण्ववत्) = कण्व की भाँति तथा (जमदग्निवत्) = जमदग्नि की भाँति तुम्हें नष्ट करता हूँ। २. (अहम्) = मैं (अगस्त्यस्य) = अगस्त्य के ब्रह्मणा ज्ञान से (क्रिमीन) = क्रिमियों को (सम्पिनष्मि) = सम्यक्तया पीस डालता हूँ। ३. अत्रि वह व्यक्ति है जो 'अ+त्रि'-'काम-क्रोध-लोभ' इन तीनों से अलग रहता है। ऐसे व्यक्ति के शरीर में रोगकृमियों का प्राबल्य नहीं हो पाता। 'कण्व' वह व्यक्ति है जोकि मेधावी होता हुआ आसुर शक्तियों [Evil spirits] को नष्ट करने का प्रयत्न करता है। इसपर भी रोगकृमियों का आक्रमण नहीं होता। जमदग्नि' वह है जिसकी जाठराग्नि (जमत्) = खानेवाली है, अर्थात् जिसकी जाठराग्नि मन्द नहीं है। यह भी इन रोगकृमियों का शिकार नहीं होता। ४. 'अत्रि-कण्व व जमदग्नि' के अतिरिक्त अगस्त्य भी अपने ज्ञान से इन कृमियों का संहार करनेवाला होता है। 'अगस्त्य' वह है जोकि (अगम्) = कुटिलता को (स्त्यायति) = [संहन्ति] नष्ट करता है। मन की अकुटिलता का शरीर के स्वास्थ्य पर भी वाञ्छनीय प्रभाव पड़ता है। यह अगस्त्य ज्ञानपूर्वक पवित्र व्यवहार करता हुआ शरीर में भी नीरोग बना रहता है।

    भावार्थ

    हम 'अत्रि, कण्व, जमदग्निव अगस्त्य' बनकर रोगकृमियों को नष्ट करनेवाले हों।

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    भाषार्थ

    (क्रिमयः) हे क्रिमियो ! (वः) तुम्हारा (हन्मि) मैं हनन करता हूँ, (अत्रिवत्) अत्रि की तरह, (कण्ववत्) कण्व की तरह, (जमदग्निवत्) प्रज्वलित अग्निवाले की तरह। (अगस्त्यस्य) अगस्त्यसम्बन्धी (ब्रह्मणा) मन्त्रोक्त ब्रह्मास्त्र के द्वारा (अहम्) मैं (क्रिमीन्) क्रिमियों को (संपिनष्मि) सम्यक् पीसता हूँ।

    टिप्पणी

    [अत्रिः१= अदनकर्ता परमेश्वर, यथा "दिवि त्वात्त्रिरधारयत् सूर्या मासाय कर्तवे। स एषि सुधृतस्तपन् विश्वा भूतावचाकशत्। अथर्व० (१३।२।१२)। मन्त्र में सूर्य का वर्णन है, जिसे कि अत्रि ने द्युलोक में धारित किया है। अतः अत्रि है अदनकर्ता परमेश्वर। परमेश्वर प्रलयकाल में सब का अदन करता है और सुष्टिकाल में भी प्राणियों के कर्मफलानुसार उनका अदन करता रहता है। इसलिये इसे "अत्ता" भी कहते हैं "अत्ता चराचरग्रहणात्।" वैद्य कहता है कि परमेश्वर जैसे अदन करता है, नाश करता है, वैसे में भी क्रिमियों को पीसता हूं, नष्ट करता हूँ। मन्त्र में अत्रि=उद्धृत मन्त्र में अत्त्रि:। "अत्रि" के अदनस्वरूप का निर्देश किया है, जिससे कि दर्शाया है कि "अत्रि" अद्धातु द्वारा निष्पन्न है। कण्ववत्= कण्व: मेधाविनाम (निघं० ३।१५) कण्व मेधावी है जोकि कणसदृश सूक्ष्म रोगकृमियों का विनाश करता है। वेद्य कहता है कि मैं भी कण्ववत रोगकृमियों का नाश करता हूँ। जमदग्निवत् = जमदग्नि है वह व्यक्ति जो यज्ञियाग्नि को प्रज्वलित कर उसमें रोगनाशक औषधों की आहुतियां देता है। वैद्य कहता है कि मैं भी क्रिमिरोगी को रोगनाशक औषध खिलाकर उसके क्रिमियों का नाश करता हूँ। अगस्त्यस्य ब्रह्मणा= अगस्त्य है सूर्य, जोकि "अग" अर्थात गतिरहित२ है, द्युलोक में स्थिर है और "स्त्य" अर्थात् अन्तरिक्ष में मेघसंघ को स्थापित करता है "स्त्ये ष्ट्यै शब्दसंघातयोः" (भ्वादि) और मेघगर्जना करता है। यह सूर्य "विश्वदृष्टः" है, सब द्वारा दृष्ट है और क्रिमियों को मारता है [प्रमृणन् क्रिमीन्], (अथर्व० ५।२३।६)। यह सूर्य उदित है जो कि निज प्रखर रश्मियों द्वारा क्रिमिनाशक है। परन्तु (अथर्व० २।३२।१) आदित्य अभी उदित नहीं हुआ, वह उद्यन् है और निम्लोचन है। इस अवस्था का आदित्य निज रश्मियों की लालिमा द्वारा क्रिमियों का नाश करता है उदित सूर्य और अनुदित आदित्य के गुणों में अन्तर है, भेद है इसलिये मन्त्र ३ (अथर्व० २।३२) में ब्रह्मणा पद द्वारा उद्यन् सूर्य के रश्मिसमूह को ब्रह्मास्त्र कहा है। "उद्यन्" सूर्य की लाल रश्मियों का यह विशेष गुण है कि वे [ब्रह्मणा] ब्रह्मास्त्ररूप हैं, रोगकीटाणुओं के विनाश में।] [१. अत्रि:= अदनकर्ता। यथा अद्+त्रिः (उणा० ४।६९) अत्रि: को मन्त्र १३।२।१२ में 'अत्त्रि:' कहा है। अत्रि पद यौगिकार्थक है, यह अत्रि पद का मौलिक स्वरुप है। २. यथा, "एक पादं नोत्खिदति सलिलाद्धंस उच्चरन्। यदङ्ग स तमुत्खिदेन्नैवाद्य न श्व: स्यान्न रात्री नाहः स्यान्न व्युच्छेत् कदाचन" (अथर्व० ११।४।२१)। 'एकं पादं नोत्खिदति द्वारा आादित्य को गतिरहित सूचित किया है। आदित्य जो प्रतिदिन पूर्व से पश्चिम की ओर जाता हुआ दृष्टिगोचर होता है, उसका कारण यह है कि पृथिवी निज कक्षा पर पश्चिम से पूर्व की ओर प्रतिदिन भ्रमण करती है, जोकि पूरा भ्रमण २४ घण्टे में होता है।]

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    विषय

    रोगकारी क्रिमियों के नाश करने का उपदेश ।

    भावार्थ

    (अत्रिवत्) जिस प्रकार हिंसक मांसभक्षी जीव अपने भक्ष्य जीव का विनाश कर देता है उस प्रकार और (कण्ववत्) कण २ करके खाने वाला गुर्गा आदि पक्षि जैसे कण २ चुन २ कर समस्त कण खा जाता है और या (जमदग्निवत्) जिस प्रकार प्रज्वलित आग एक ही वार में सब को भस्म कर देता है उस प्रकार हे (क्रिमयः) रोग जन्तुओ ! मैं (वः) तुमको इन नाना विधियों से (हन्मि) विनष्ट करूं। और (अहं) मैं (क्रिमीन्) इन रोगकारी जन्तुओं को (अगस्त्यस्य) अगस्त्य = अगम्य, या रोग निवारक सूर्य का भी संहनन अर्थात् निर्माण करने वाले परमात्मा द्वारा उपदिष्ट (ब्रह्मणा) वेदमन्त्र के उपाय या अग्नितत्व के बल से (सं पिनष्मि) उत्तम रीति से विनाश करूं।

    टिप्पणी

    (प्र०)‘अत्रिवत्त्वा क्रिमे’ (तृ०) ‘अगस्त्यं ब्रह्मणा’, इति पैप्प० सं०। ‘अत्रिणा त्वा कृमेहन्मि’ ‘कण्वेन जमदग्निना विश्वावसो ब्रह्मणा’ इत्यादि तै० आ०। ‘हतस्ते अत्रिणाकृमिर्हंतस्ते जमदग्निना’ इति मै० ब्रा०। १-अग= सूर्य (आपटे) अगस्त्य=अग का संहनन करने वाला, इकठ्ठा करने वाला। सूर्य रोगनाशक है। परमात्मा उस सूर्य का भी निर्माता है। अतः वह महौषध रूप है।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कण्व ऋषिः। आदित्यो देवता। १ त्रिपदा भुरिग् गायत्री। २-५ अनुष्टुभः। चतुष्पदा निचृदुष्णिक्। षडृचं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Elimination of Insects

    Meaning

    O germs and insects, I destroy you like a devourer of evil, like an eminent scientist, like blazing fire. I destroy germs and insects by the sagely knowledge of the masters of cleansing science.

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    Translation

    O worm, like Atri, like Kaņva and like Jamadagni, I will crush you, like a good grinder and like blazing fire, I crush the worms thoroughly with the knowledge of cleanliness. (Atri=sanitation incharge; Kanva=health officer and Jamadagni=area inspector to keep his circle clean)

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    Translation

    I crush these germs in the ways as the devouring animal cats up, its pray, as Kanva, the bird swallowing the worms by Picking them piece-meal, as the devasting fire reduces everything to ashes. I destroy them with the means of the rays of the sun.

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    Translation

    O disease-producing worms, I destroy ye, as a violent flesh-eaters destroys his bird of prey, as a fowl eats up all grains one by one, as kindled fire extinguishes everything all at one stroke. I bray and bruise the worms to pieces with the Vedic knowledge of God. [1]

    Footnote

    [1] अगः =Surya. God is Agastya, who brings into existence the Sun. Atri, Kanva, Jamadagni, and Agastya are according to Griffith, the names of celebrated Rishis or seers. This interpretation is irrational, as there is no history in the Vedas. These are yogic words, and not the names of Rishis.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३–अत्त्रिवत्। अदेस्त्रिनिश्च। उ० ४।६७। इति अद भक्षणे अत सातत्यगमने वा–त्रिप्। अत्ति दोषान् भक्षयति नाशयतीति अततीति वा अत्रिः। मुनिः। अथवा। रसान् अत्तीति सूर्यः। तत्सदृशः। वः। युष्मान्। क्रिमयः। हे क्षुद्रजन्तवः। हन्मि। नाशयामि। कण्ववत् अ० २।२५।३। अशूप्रुषिलटिकणि०। उ० १।१५१। इति कण शब्दे, निमीलने–क्वन्। कणति उपदेशशब्दं करोति, कण्यते स्तूयते वा। निमीलयति परान् वा स्वतेजसा। मेधाविवत्–निघ० ३।१५। जमदग्निवत्। जमु भक्षणे, दीप्तौ च–शतृ+अग्नि–वतुप्। जमदग्नयः प्रजमिताग्नयो वा प्रज्वलिताग्नयो वा–निरु० ७।२४। जमन् हुतभक्षणशीलः अथवा प्रज्वलितो अग्निरिव तेजो येषां ते जमदग्नयः। तत्सदृशः। अगस्त्यस्य। अग वक्रगतौ–अच् ततः। वसेस्तिः। उ० ४।१८०। इति अग+असु क्षेपणे–भावे ति प्रत्ययः। तत्र साधुः। पा० ४।४। इति यत्। पृषोदरादित्वाद् दीर्घाभावः। अगस्य कुटिलगतेः पापस्य असने उत्पाटने समर्थस्य परमेश्वरस्य। ब्रह्मणा। अ० १।८।४। वेदज्ञानेन। सम्+पिनष्मि। अ० २।३१।१। संचूर्णयामि। अन्यद् गतम् ॥

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    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (ক্রিময়ঃ) হে কৃমিসমূহ! (বঃ) তোমাদের (হন্মি) আমি হত্যা করি, (অত্রি বৎ) অত্রির মতো, (কণ্ব বৎ) কণ্বের মতো, (জমদগ্নিবৎ) প্রজ্বলিত অগ্নির মতো। (অগস্ত্যস্য) অগস্ত্যসম্বন্ধিত (ব্রহ্মণা) মন্ত্রোক্ত ব্রহ্মাস্ত্রের দ্বারা (অহম্) আমি (ক্রিমীন্) কৃমিদের (সংপিনষ্মি) সম্যক্ পিষ্ট করি।

    टिप्पणी

    [অত্রিঃ১=অদনকর্তা পরমেশ্বর, যথা "দিবি ত্বাত্ত্রিরধারয়ৎ সূর্যা মাসায় কর্তবে। স এষি সুধৃতস্তপন্ বিশ্বা ভূতাবচাকশৎ ॥ অথর্ব০ (১৩।২।১২)। মন্ত্রে সূর্যের বর্ণনা আছে, যাকে অত্রি দ্যুলোকে ধারিত করেছে। অতঃ অত্রি হলেন অদনকর্তা পরমেশ্বর। পরমেশ্বর প্রলয়কালে সবকিছুর অদন করেন এবং সৃষ্টিকালেও প্রাণীদের কর্মফলানুসারে তাদের অদন করে। এইজন্য "অত্তা" ও বলা হয় "অত্তা চরাচর-গ্রহণাৎ ।" বৈদ্য বলে যে, পরমেশ্বর যেভাবে অদন করেন, নাশ করেন, সেভাবেই আমিও কৃমিকে পিষ্ট করি, নষ্ট করি। মন্ত্রে অত্রি=উদ্ধৃত মন্ত্রে অত্রিঃ। "অত্রি" এর অদনস্বরূপের নির্দেশ দেওয়া হয়েছে, যার মাধ্যমে দেখানো হয়েছে যে "অত্রি" অদ্ ধাতু দ্বারা নিষ্পন্ন হয়েছে। কণ্ববৎ= কণ্বঃ মেধাবিনাম (নিঘং০ ৩।১৫)। কণ্ব হল মেধাবী যে কণার সদৃশ সূক্ষ্ম রোগকৃমির বিনাশ করে। বৈদ্য বলে যে আমিও কণ্ববৎ রোগকৃমির নাশ করি। জমদগ্নিবৎ= জমদগ্নি হল সেই ব্যক্তি যে যজ্ঞাগ্নিকে প্রজ্বলিত করে তার মধ্যে রোগনাশক ঔষধির আহুতি দেয়। বৈদ্য বলে যে, আমিও কৃমিরোগীকে রোগনাশক ঔষধি সেবন করিয়ে তাঁর কৃমির নাশ করি। অগস্ত্যস্য ব্রহ্মণা= অগস্ত্য হল সূর্য, যা "অগ" অর্থাৎ গতিরহিত২, দ্যুলোকে স্থির এবং "স্ত্য" অর্থাৎ অন্তরিক্ষে মেঘসংঘকে স্থাপিত করে "স্ত্যৈ ষ্ট্য়ৈ শব্দসংঘাতয়োঃ" (ভ্বাদিঃ) এবং মেঘগর্জনা করে। এই সূর্য হল "বিশ্বদৃষ্টিঃ", সকলের দ্বারা দৃষ্ট এবং কৃমির হত্যা করে [প্রমৃণন্ ক্রিমীন্], (অথর্ব০ ৫।২৩।৬)। এই সূর্য উদিত, যা নিজ প্রখর রশ্মির দ্বারা কৃমিনাশক। কিন্তু (অথর্ব০ ২।৩২।১) আদিত্য এখনো উদিত নয়, তা উদ্যান এবং নিম্লোচন। এই অবস্থায় আদিত্য নিজ রশ্মির লালিমা দ্বারা কৃমির নাশ করে। উদিত সূর্য এবং অনুদিত আদিত্যের গুণের মধ্যে অন্তর রয়েছে, ভেদ রয়েছে। এইজন্য মন্ত্র ৩ (অথর্ব ২।৩২) এ ব্রহ্মণা পদ দ্বারা উদ্যন্ সূর্যের রশ্মিসমূহকে ব্রহ্মাস্ত্র বলা হয়েছে। “উদ্যন” সূর্যের লাল রশ্মির বিশেষ গুণ হলো, তা [ব্রহ্মণা] ব্রহ্মাস্ত্ররূপ, রোগজীবাণুর বিনাশের জন্য। [১. অত্রিঃ= অদনকর্তা । যথা অদ্+ত্রিঃ (উণা০ ৪।৬৯) অত্রিঃ কে মন্ত্র ১৩।২।১২ এ 'অত্ত্রি' বলা হয়েছে। অত্রি পদ হলো যৌগিকার্থক, ইহা অত্রি পদের মৌলিক স্বরূপ। ২. যথা, "এক পাদং নোৎখিদতি সলিলাদ্ধংস উচ্চরন্ যদঙ্গ স তম্ত্খিদেন্নংবাদ্য ন শ্বঃ স্যান্ন রাত্রী নাহঃ স্যান্ন ব্যুচ্ছেৎ কদাচন" (অথব০ ১১।৪।২১)। 'এক পাদং নোত্খিদতি' দ্বারা আদিত্য-কে গতিরহিত সূচিত করা হয়েছে। আদিত্য যা প্রতিদিন পূর্ব থেকে পশ্চিমের দিকে যেতে দৃষ্টিগোচর হয়, তার কারণ হল পৃথিবী নিজ কক্ষপথে পশ্চিম থেকে পূর্বের দিকে প্রতিদিন ভ্রমণ করে, যা পুরো ভ্রমণ ২৪ ঘণ্টায় হয়।]

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    मन्त्र विषय

    ক্রিমিতুল্যান্ দোষান্ নাশয়েৎ, ইত্যুপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ক্রিময়ঃ) হে কৃমিসমূহ ! (বঃ) তোমাদের (অত্ত্রিবৎ) দোষভক্ষক, বা গতিশীল, মুনির সমান (কণ্ববৎ) স্তুতিযোগ্য মেধাবী পুরুষের সমান, (জমদগ্নিবৎ) আহুতি ভক্ষণকারী/গ্রহণকারী অথবা প্রজ্বলিত অগ্নির সদৃশ তেজস্বী পুরুষের সমান, (হন্মি) আমি হনন করি। (অগস্ত্যস্য) কুটিল গতি পাপের ছেদনে সমর্থ পরমেশ্বরের (ব্রহ্মণা) বেদজ্ঞান দ্বারা (অহম্) আমি (ক্রিমীন্) কৃমিসমূহকে (সম্ পিনষ্মি) পিষ্ট করি ॥৩॥

    भावार्थ

    মনুষ্যদের ঋষি, মুনি, ধর্মাত্মাদের অনুকরণের মাধ্যমে বেদজ্ঞান প্রাপ্ত করে পাপের নাশ করা উচিৎ ॥৩॥ মন্ত্র ৩–৫ অথর্ববেদ কা০ ৫ সূ০ ২৩ মন্ত্র ১০–১২ এও আছে ॥

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