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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 110 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 110/ मन्त्र 3
    ऋषिः - श्रुतकक्षः सुकक्षो वा देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-११०
    48

    त्रिक॑द्रुकेषु॒ चेत॑नं दे॒वासो॑ य॒ज्ञम॑त्नत। तमिद्व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्रिऽक॑द्रुकेषु । चेत॑नम् । दे॒वास॑: । य॒ज्ञम् । अ॒त्न॒त॒ ॥ तम् । इत् । व॒र्धन्तु॒ । न॒: । गिर॑: ॥११०.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमत्नत। तमिद्वर्धन्तु नो गिरः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्रिऽकद्रुकेषु । चेतनम् । देवास: । यज्ञम् । अत्नत ॥ तम् । इत् । वर्धन्तु । न: । गिर: ॥११०.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 110; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    विद्वानों के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (देवासः) विद्वानों ने (त्रिकद्रुकेषु) तीन [शारीरिक, आत्मिक, और सामाजिक उन्नतियों के] विधानों में (चेतनम्) चेतानेवाले (यज्ञम्) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण और दान] को (अत्नत) फैलाया है। (तम् इत्) उस ही [यज्ञ] को (नः) हमारी (गिरः) विद्याएँ (वर्धन्तु) बढ़ावें ॥३॥

    भावार्थ

    मनुष्य विद्वान् पूर्वज महात्माओं के समान विद्या प्राप्त करके शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करें ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(त्रिकद्रुकेषु) अथ० २०।९।१। तिसॄणां शारीरिकात्मिकसामाजिकवृद्धीनां कद्रुकेषु आह्वानेषु विधानेषु (चेतनम्) ज्ञानसाधनम् (देवासः) विद्वांसः (यज्ञम्) देवपूजासंगतिकरणदानव्यवहारम् (अत्नत) अतन्वत। विस्तारितवन्तः (तम् इत्) तमेव यज्ञम् (वर्धन्तु) वर्धयन्तु (नः) अस्माकम् (गिरः) विविधविद्याः ॥

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    विषय

    ज्योतिः, गौः, आयुः

    पदार्थ

    १. (त्रिकद्रुकेषु) = [ज्योतिः, गौः, आयु:] 'हमें ज्योति प्राप्त कराओ, हमारे लिए उत्तम इन्द्रियों को प्राप्त कराइए [गौः] तथा हमें दीर्घजीवी बनाइए' इसप्रकार तीनों आह्वानों के होने पर [कदि आह्वाने] चेतनम-चेतना को-ज्ञान को देनेवाले (यज्ञम्) = पूजनीय प्रभु को (देवास:) = देववृत्ति के पुरुष (अन्तत) = अपने में विस्तृत करते हैं। २. (न: गिरः) = हमारी ये वाणियाँ भी (तम् इत्) = उस प्रभु का ही (वर्धन्तु) = वर्धन करें। हम अपनी वाणियों से प्रभु का ही स्तवन करें। प्रभु हमारे ज्ञान को बढ़ाएँगे, हमें उत्तम इन्द्रियाँ प्राप्त कराएंगे और इसप्रकार हमें प्रशस्त दीर्घ जीवनवाला बनाएँगे।

    भावार्थ

    देववृत्ति के पुरुष प्रभु को ही पुकारते हैं। प्रभु-स्तवन करते हुए वे ज्ञान व प्रकाश को, उत्तम इन्द्रियों को तथा दीर्घजीवन को प्राप्त करते हैं। इसप्रकार प्रभु-स्तवन द्वारा अपना पूरण करनेवाला यह ऋषि पर्वत' कहलाता है पर्व पूरणे। यही अगले सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (देवासः) दिव्य उपासक, (त्रिकद्रुकेषु) पृथिवी के तीन स्थानों में—जल, स्थल, पर्वत में जिस (यज्ञम्) यज्ञ-स्वरूप (चेतनम्) चेतन ब्रह्म का (अत्नत) ध्यान तथा प्रचार द्वारा विस्तार करते हैं, (तम् इत्) उस ही परमेश्वर की (वर्धन्तु) बड़ाई करती हैं, (नः गिरः) हमारी स्तुतियाँ।

    टिप्पणी

    [कद्रु=पृथिवी (श০ ब्रा০ ३.६.२.६)। क्रद्रु=क (कुत्सित)+द्रु (गति), अर्थात् जो गति कर रही है, परन्तु जिसकी गति का भान नहीं होता। अतः वह कुत्सित गतिवाली है।]

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    विषय

    परमात्मा, आत्मा।

    भावार्थ

    (त्रिकद्रुकेषु) तीनों लोकों में (देवासः) दिव्य, तेजोमय महान् शक्तियां (चेतनम्) एक चेतनस्वरूप, सबके भीतर ज्ञाता रूप से विद्यमान (यज्ञम्) सबको संगत करने वाले, परस्पर मिलाए रखने वाले, परम पूजनीय, सबको शक्ति देने वाले परमेश्वर को (अत्नत) विस्तृत करते हैं। उसी के सामर्थ्य को प्रकट करते हैं। (नः गिरः) हमारी वाणियां भी (तम् इत्) उस परमेश्वर को ही (वर्धन्तु) बढ़ाती हैं उसी का यश फैलाती हैं। आत्मा के पक्ष में—(त्रिकद्रुकेषु) ज्योति, गौः आयु अर्थात् मन इन्द्रियगण और जीवन इन तीन रूपों में (देवासः) प्राणगण (चेतनं यज्ञम्) चेतन आत्मा को ही (अत्नत) विस्तृत करते हैं उसके ही सामर्थ्यों का विस्तार प्रकट करते हैं अथवा (देवासः) विद्वान्गण सर्वत्र उसी परमेश्वर या आत्मा के सामर्थ्यों का निरूपण करते हैं (इम् इत् नः गिरः वर्धन्तु) उसी को हमारी वाणियां भी प्रकट करती हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सुतकक्षः सुकक्षो वा ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। तृचं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Agni Devata

    Meaning

    In three modes of body, mind and soul, the devas, seven senses, the human consciousness and the noble yogis, concentrate on Indra, divine consciousness. In three regions of the universe, noble souls meditate on the universal consciousness of the divine Indra. Thus they perform the yajna of divinity in communion. May all our songs of adoration glorify that supreme consciousness, Indra.

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    Translation

    The men of learning and action spread the Yajna imparting awareness of duties in the three Ashramas and three Savanas. May our praises and voicee augment that Yajna.

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    Translation

    The men of learning and action spread the Yajna imparting awareness of duties in the three Ashramas and three Savanas. May our praises and voice augment that Yajna.

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    Translation

    O electricity (i.e., positive one) when thou settest the negative electricity (i. e,, Soma) in the Sun or in the atmospheric waters (where helium gets converted) and amidst ‘marutas’ or noble gases, flow in currents, thou thyself gets exhilarated (i e., begin to run in currents).

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(त्रिकद्रुकेषु) अथ० २०।९।१। तिसॄणां शारीरिकात्मिकसामाजिकवृद्धीनां कद्रुकेषु आह्वानेषु विधानेषु (चेतनम्) ज्ञानसाधनम् (देवासः) विद्वांसः (यज्ञम्) देवपूजासंगतिकरणदानव्यवहारम् (अत्नत) अतन्वत। विस्तारितवन्तः (तम् इत्) तमेव यज्ञम् (वर्धन्तु) वर्धयन्तु (नः) अस्माकम् (गिरः) विविधविद्याः ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    বিদ্বৎকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (দেবাসঃ) বিদ্বানগণ (ত্রিকদ্রুকেষু) তিনটি [শারীরিক, আধাত্মিক এবং সামাজিক উন্নতির] বিধানে (চেতনম্) চেতন সম্পন্ন/জ্ঞানসাধনসম্পন্ন (যজ্ঞম্) যজ্ঞ [দেবপূজা, সঙ্গতিকরণ এবং দান] (অত্নত) বিস্তৃত করেছে। (তম্ ইৎ) সেই [যজ্ঞকে] (নঃ) আমাদের (গিরঃ) নানাবিধ বিদ্যা (বর্ধন্তু) বৃদ্ধি করুক ॥৩॥

    भावार्थ

    মানুষ বিদ্বান পূর্বজ মহাত্মাদের মতো বিদ্যা লাভ করে শারীরিক, আত্মিক এবং সামাজিক উন্নতি করুক ॥৩॥

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    भाषार्थ

    (দেবাসঃ) দিব্য উপাসক, (ত্রিকদ্রুকেষু) পৃথিবীর তিন স্থানে—জল, স্থল, পর্বতে যে (যজ্ঞম্) যজ্ঞ-স্বরূপ (চেতনম্) চেতন ব্রহ্মের (অত্নত) ধ্যান তথা প্রচার দ্বারা বিস্তার করে, (তম্ ইৎ) সেই পরমেশ্বরের (বর্ধন্তু) স্তুতি/প্রশংসা করে, (নঃ গিরঃ) আমাদের স্তুতি।

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