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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 116 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 116/ मन्त्र 1
    ऋषिः - मेध्यातिथिः देवता - इन्द्रः छन्दः - बृहती सूक्तम् - सूक्त-११६
    85

    मा भू॑म॒ निष्ट्या॑ इ॒वेन्द्र॒ त्वदर॑णा इव। वना॑नि॒ न प्र॑जहि॒तान्य॑द्रिवो दु॒रोषा॑सो अमन्महि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मा । भू॒म॒ । निष्ट्या॑:ऽइव । इन्द्र॑ । त्वत् । अर॑णा:ऽइव ॥ वना॑नि । न । प्र॒ऽज॒हि॒तानि॑ । अ॒द्रि॒ऽव॒: । दु॒रोषा॑स: । अ॒म॒न्म॒ह‍ि॒ ॥११६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मा भूम निष्ट्या इवेन्द्र त्वदरणा इव। वनानि न प्रजहितान्यद्रिवो दुरोषासो अमन्महि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मा । भूम । निष्ट्या:ऽइव । इन्द्र । त्वत् । अरणा:ऽइव ॥ वनानि । न । प्रऽजहितानि । अद्रिऽव: । दुरोषास: । अमन्मह‍ि ॥११६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 116; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    राजा के कर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (त्वत्) तुझसे [अलग होकर] (निष्ट्याः इव) वर्णसङ्कर नीचों के समान और (अरणाः इव) न बात करने योग्य शत्रुओं के समान और (प्रजहितानि) छोड़ दिये गये (वनानि न) वृक्षों के समान (मा भूम) हम न होवें, (अद्रिवः) हे वज्रधारी ! (दुरोषासः) न जल सकनेवाले वा न मर सकनेवाले [अर्थात् जीते हुए, प्रबल] (अमन्महि) हम समझे जावें ॥१॥

    भावार्थ

    राजा प्रजा की रक्षा करके उसको प्रबल और मित्र बनाये रक्खे, जैसे माली वृक्षों को सींचकर उपयोगी बनाता है ॥१॥

    टिप्पणी

    यह सूक्त ऋग्वेद में है-८।१।१३, १४ ॥ १−(मा भूम) न भवेम (निष्ट्याः) अथ० १।१९।३। निस्-त्यप् गतार्थो निर्गता वर्णाश्रमेभ्यः। चाण्डालाः। वर्णसङ्कराः (इव) (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (त्वत्) त्वत्तः (अरणाः) रण शब्दे-अप्। असंभाषणीयाः। शत्रवः (इव) (वनानि) वृक्षजातानि (न) इव (प्रजाहितानि) ओहाक् त्यागे-क्त। शाखादिभिः परित्यक्तानि। प्रक्षीणानि (अद्रिवः) हे वज्रवन् (दुरोषासः) उष दाहे हिंसे च-घञ्, असुक्। ओषितुं दग्धुं हिंसितुं वा अशक्याः। जीवन्तः प्रबलाः (अमन्महि) मन ज्ञाने लिङर्थे लुङ्। ज्ञाता भवेम ॥

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    विषय

    मा भूम निष्टयाः इव

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! हम (निष्टयाः इव) = घर से बहिष्कृत-से (मा भूम) = न हो जाएँ। आप ही तो हमारे सच्चे माता व पिता हैं। हम आपसे दूर न हो जाएँ और परिणामत: (त्वत्) = आपसे (अरणा:) = [अरमणा:] आनन्द को न प्रास होनेवाले न हो जाएँ। हमें आपकी उपासना में ही आनन्द आये। २. इसप्रकार आपसे बहिष्कृत न हुए-हुए और आपकी उपासना में आनन्द लेनेवाले हम (प्रजहितानि) = शाखा-पत्र आदि से (त्यक्त) = क्षीण (वनानि न) = वनों की भौति [मा भूम] मत हो जाएँ, अर्थात् हम पुत्र-पौत्रों से वियुक्त-से न हो जाएँ। हे (अद्रिवः) = आदरणीय प्रभो! हम (दुरोषास:) = सब बुराइयों को दग्ध करनेवाले होते हुए (अमन्महि) = आपका स्तवन करते हैं।

    भावार्थ

    हम प्रभु से बहिष्कृत न हो जाएँ। प्रभु की उपासना में ही आनन्द का अनुभव करें। पुत्र-पौत्रों से भरे परिवारवाले हों और बुराइयों का दहन करते हुए आपका स्तवन करनेवाले बनें।

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    भाषार्थ

    (इन्द्र) हे परमेश्वर! (त्वत्) आपसे (निष्ट्याः इव) बहिष्कृत किये गये-से (मा भूम) हम न हों, और (अरणाः इव मा भूम) आप में रमण न करनेवाले भी हम न हों। (अद्रिवः) हे पापविदारक-साधनों से सम्पन्न! (वनानि) भक्ति-भावनााओं का (न प्रजाहितानि) हमने परित्याग नहीं किया। (दुरोषासः) राग-द्वेष, ईर्ष्या आदि के जलन से पृथक् होकर (अमन्महि) हम आपका मनन कर रहे हैं।

    टिप्पणी

    [निष्ट्या=निः+त्यप्। अरणाः=अ+रमणाः (रमणकर्त्तारः)। वनानि=वन संभक्तौ। अद्रिवः=आदृणाति एतेन (निरु০ ४.१.४), तद्वान् (सम्बद्धौ)। दुरोषासः=दुर (दूर)+रोषासः (रुष्), या दुर् (दूर)+ओषासः (उष् दाहे)। अथवा दु (उपतापे)+(रोषासः), या (दुर्)+ओषासः।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Indra, lord almighty, maker and breaker of clouds and mountains, free from anger and fear we adore you and pray: Give us the grace that we may never be like the lowest of human species with nothing to be proud of, let us never be like the indifferent and the depressed, let us never be reduced to the state of forsaken thickets of dead wood.

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    Translation

    O King, O holder of bolt, we may never be cast a side from you and never be strangers to you. We never be counted as rejected trees and we be treated as the men never to burn or die.

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    Translation

    O King, O holder of bolt, we may never be cast a side from you and never be strangers to you. We never be counted as rejected trees and we be treated as the men never to burn or die.

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    Translation

    O Brave Destroyer of the forces of evil and ignorance or the enemy, we (the ordinary persons) think ourselves not so swift-moving, nor so terrible (as fighting warriors). Yet once we may rejoice in praise of Thy great Bounties and fortunes.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह सूक्त ऋग्वेद में है-८।१।१३, १४ ॥ १−(मा भूम) न भवेम (निष्ट्याः) अथ० १।१९।३। निस्-त्यप् गतार्थो निर्गता वर्णाश्रमेभ्यः। चाण्डालाः। वर्णसङ्कराः (इव) (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (त्वत्) त्वत्तः (अरणाः) रण शब्दे-अप्। असंभाषणीयाः। शत्रवः (इव) (वनानि) वृक्षजातानि (न) इव (प्रजाहितानि) ओहाक् त्यागे-क्त। शाखादिभिः परित्यक्तानि। प्रक्षीणानि (अद्रिवः) हे वज्रवन् (दुरोषासः) उष दाहे हिंसे च-घञ्, असुक्। ओषितुं दग्धुं हिंसितुं वा अशक्याः। जीवन्तः प्रबलाः (अमन्महि) मन ज्ञाने लिङर्थे लुङ्। ज्ञाता भवेम ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজকর্মোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ইন্দ্র) হে ইন্দ্র! [পরম্ ঐশ্বর্যবান রাজা] (ত্বৎ) তোমার থেকে [আলাদা/পৃথক হয়ে] (নিষ্ট্যাঃ ইব) বর্ণসঙ্কর নীচ-এর সমান এবং (অরণাঃ ইব) অসম্ভাষণীয় শত্রুদের সমান এবং (প্রজহিতানি) পরিত্যক্ত (বনানি ন) বৃক্ষের সমান (মা ভূম) আমরা যেন না হই, (অদ্রিবঃ) হে বজ্রধারী! (দুরোষাসঃ) অদাহ্য বা অমর [অর্থাৎ জীবন্ত, অত্যন্ত বলশালী] (অমন্মহি) আমরা যেন জ্ঞাত/পরিচিত হই ॥১॥

    भावार्थ

    প্রজাদের রক্ষা করে, রাজা যেন তাঁদেরকে বলশালী এবং বন্ধু করে রাখে, যেমন মালী গাছে জল সিঞ্চন করে উপযোগী করে তোলে ॥১॥ এই সূক্ত ঋগ্বেদে আছে-৮।১।১৩, ১৪।

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    भाषार्थ

    (ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (ত্বৎ) আপনার থেকে (নিষ্ট্যাঃ ইব) বহিষ্কৃত (মা ভূম) আমরা যেন না হই, এবং (অরণাঃ ইব মা ভূম) আপনার মধ্যে অরমণীয় আমরা যেন না হই। (অদ্রিবঃ) হে পাপবিদারক-সাধনসম্পন্ন! (বনানি) ভক্তি-ভাবনা (ন প্রজাহিতানি) আমরা পরিত্যাগ করিনি। (দুরোষাসঃ) রাগ-দ্বেষ, ঈর্ষ্যাদির জলন থেকে পৃথক্ হয়ে (অমন্মহি) আমরা আপনার মনন করছি।

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