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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 128 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 128/ मन्त्र 1
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिरिन्द्रो वा छन्दः - निचृदनुष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    105

    यः स॒भेयो॑ विद॒थ्य: सु॒त्वा य॒ज्वाथ॒ पूरु॑षः। सूर्यं॒ चामू॑ रि॒शादस॒स्तद्दे॒वाः प्राग॑कल्पयन् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । स॒भेय॑: । विद‍॒थ्य॑: । सु॒त्वा । य॒ज्वा । अथ॒ । पूरु॒ष: ॥ सूर्य॒म् । च॒ । अमू॑ । रि॒शादस॒: । तत् । दे॒वा: । प्राक् । अ॑कल्पयन् ॥१२८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यः सभेयो विदथ्य: सुत्वा यज्वाथ पूरुषः। सूर्यं चामू रिशादसस्तद्देवाः प्रागकल्पयन् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । सभेय: । विद‍थ्य: । सुत्वा । यज्वा । अथ । पूरुष: ॥ सूर्यम् । च । अमू । रिशादस: । तत् । देवा: । प्राक् । अकल्पयन् ॥१२८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 128; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (2)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जो (सभेयः) सभ्य [सभाओं में चतुर], (विदथ्यः) विद्वानों में प्रशंसनीय, (सुत्वा) तत्त्वरस निकालनेवाला (अथ) और (यज्वा) मिलनसार (पुरुषः) पुरुष है। (अमू) उस (सूर्यम्) सूर्य [के समान प्रतापी] को (च) निश्चय करके (तत्) तब (रिशादसः) हिंसकों के नाश करनेवाले (देवाः) विद्वानों ने (प्राक्) पहिले [ऊँचे स्थान पर] (अकल्पयन्) माना है ॥१॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग सबमें चतुर मनुष्य को सभापति बनाकर प्रजा की रक्षा करें ॥१॥

    टिप्पणी

    [सूचना−पदपाठ के लिये सूचना सूक्त १२७ देखो ॥]१−(यः) (सभेयः) ढश्छन्दसि। पा० ४।४।१०६। सभा-ढप्रत्ययः। सभासु साधुः। सभ्यः (विदथ्यः) तत्र साधुः पा० ४।४।९८। विदथ-यत्। विद्वत्सु साधुः (सुत्वा) सुयजोर्ङ्वनिप्। पा० ३।२।१०३। षुञ् अभिषवे-ङ्वनिप्। सोमस्य तत्त्वरसस्य सोता (यज्वा) यज-ङ्वनिप् पूर्वसूत्रेण। यष्टा। संगन्ता (अथ) समुच्चये (पूरुषः) पुरुषः (सूर्यम्) सूर्यवत् प्रतापिनम् (च) अवधारणे (अमू) सुपां सुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। एकवचनस्य द्विवचनम्। अनुम् (रिशादसः) अ० २।२८।२। रिश हिंसायाम्+क+अद भक्षणे-असुन्। हिंसकानां भक्षका नाशकाः (तत्) तदा (देवाः) विद्वांसः (प्राक्) पूर्वम्। अग्रम् (अकल्पयन्) कल्पितवन्तः ॥

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    विषय

    'सभेय-विदथ्य-सुत्वा-यज्वा'

    पदार्थ

    १. वस्तुतः (पूरुषः) = पुरुष वह है (य:) = जोकि (सभेयः) = सभा में उत्तम है-अपने ज्ञान व शिष्टाचार के कारण सभा में (प्रशस्य) = होता है। (विदथ्य:) = [Knowledge, sacrifice, battle] ज्ञान, यज्ञ व संग्राम में उत्तम है। (सुत्वा) = सोम का सम्पादन करता है, शरीर में शक्ति [सोम] का रक्षण करता है। (अथ) = और (यज्वा) = यज्ञशील बनता है। २. (च) = और (तत्) = ऐसा बनने के लिए (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (अमुम्) = उस (सूर्यम्) = सुर्यसम ज्योति ब्रह्म को [ब्रह्म सूर्यसमं ज्योति:] (प्राक्) = आगे अपने सामने (अकल्पयन्) = [to believe, consider, think, imagine] सोचते हैं। प्रभु का ध्यान करते हुए प्रभु-जैसा ही बनने का प्रयत्न करते हैं। प्रभु ही (रिशादसम्) = सब हिंसक वृत्तियों को समास करनेवाले हैं। प्रभु-स्मरण करते हुए ये उपासक 'ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध व द्रोह' आदि वृत्तियों से ऊपर उठ जाते हैं।

    भावार्थ

    मनुष्य तो वही है जो कि सभा में प्रशस्य होता है-ज्ञान में उत्तम है-सोम का सम्पादन करता है और यज्ञशील है। ये देववृत्ति के पुरुष सदा प्रभु का स्मरण करते हैं। प्रभु इनकी अशुभवृत्तियों को विनष्ट कर देते हैं।

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    इंग्लिश (2)

    Subject

    Indra Prajapati

    Meaning

    The man who is worthy of the assembly, who is worthy of learned society, who has distilled and attained to the essence and meaning of things and then is dedicated to yajna, creative work for all in cooperation, that man and the sun, the divinities have, prepared and seasoned as top destroyers of sin and suffering of disease.

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    Translation

    The men of wisdom make fore most in rank the man who is experienced in dealing with asscmbly and fit for assembly, who has constructive attitude, who performs yajna and is the destroyer of foemen.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    [सूचना−पदपाठ के लिये सूचना सूक्त १२७ देखो ॥]१−(यः) (सभेयः) ढश्छन्दसि। पा० ४।४।१०६। सभा-ढप्रत्ययः। सभासु साधुः। सभ्यः (विदथ्यः) तत्र साधुः पा० ४।४।९८। विदथ-यत्। विद्वत्सु साधुः (सुत्वा) सुयजोर्ङ्वनिप्। पा० ३।२।१०३। षुञ् अभिषवे-ङ्वनिप्। सोमस्य तत्त्वरसस्य सोता (यज्वा) यज-ङ्वनिप् पूर्वसूत्रेण। यष्टा। संगन्ता (अथ) समुच्चये (पूरुषः) पुरुषः (सूर्यम्) सूर्यवत् प्रतापिनम् (च) अवधारणे (अमू) सुपां सुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। एकवचनस्य द्विवचनम्। अनुम् (रिशादसः) अ० २।२८।२। रिश हिंसायाम्+क+अद भक्षणे-असुन्। हिंसकानां भक्षका नाशकाः (तत्) तदा (देवाः) विद्वांसः (प्राक्) पूर्वम्। अग्रम् (अकल्पयन्) कल्पितवन्तः ॥

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