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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 128 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 128/ मन्त्र 12
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिरिन्द्रो वा छन्दः - निचृदनुष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    80

    यदि॑न्द्रादो दाशरा॒ज्ञे मानु॑षं॒ वि गा॑हथाः। विरू॑पः॒ सर्व॑स्मा आसीत्स॒ह य॒क्षाय॒ कल्प॑ते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । इ॑न्द्र । अ॒द: । दा॑शरा॒ज्ञे । मानु॑ष॒म् । वि । गा॑हथा: ॥ विरू॑प॒: । सर्व॑स्मै । आसीत् । स॒ह । य॒क्षाय॒ । कल्प॑ते ॥१२८.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यदिन्द्रादो दाशराज्ञे मानुषं वि गाहथाः। विरूपः सर्वस्मा आसीत्सह यक्षाय कल्पते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । इन्द्र । अद: । दाशराज्ञे । मानुषम् । वि । गाहथा: ॥ विरूप: । सर्वस्मै । आसीत् । सह । यक्षाय । कल्पते ॥१२८.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 128; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (यत्) जब, (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले मनुष्य] (दाशराज्ञे) दानपात्र सेवकों के राजा के लिये [अर्थात् अपने लिये] (अदः) उस [वेदोक्त] (मानुषम्) मनुष्य के कर्म को (वि गाहथाः) तूने बिलो डाला है [गड़बड़ कर दिया है]। (सर्वस्मै) सबके लिये (विरूपः) वह दुष्ट रूपवाला व्यवहार (आसीत्) हुआ है। यह [मनुष्य] (यक्षाय) पूजनीय कर्म के लिये (सह) मिलकर (कल्पते) समर्थ होता है ॥१२॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य वेदमर्यादा को तोड़कर स्वार्थ के लिये सेवक आदि को सताता है, वह सबको कष्ट देता है, इसलिये मनुष्य सदा परोपकार करे ॥१२॥

    टिप्पणी

    १२−(यत्) यदा (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् मनुष्य (अदः) तत्। वेदोक्तम् (दाशराज्ञे) दाशृ दाने-घञ्। राजृ दीप्तौ ऐश्वर्ये च-कनिन्। दाशानां दानीयानां दानपात्राणां भृत्यानां स्वामिहिताय। स्वार्थाय (मानुषम्) मनु-अण् षुक् च। मनुष्यसम्बन्धि कर्म (वि गाहथाः) गाहृ विलोडने-लुङ्, अडभावः। विलोडितवानसि (विरूपः) विकृतरूपो दुष्टरूपो व्यवहारः (सर्वस्मै) प्रत्येकप्राणिने (आसीत्) (सह) संयोगेन (यक्षाय) यक्ष पूजायाम्-घञ्। पूजनीयकर्मणे (कल्पते) कृपू सामर्थ्ये। समर्थो भवति ॥

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    विषय

    मानुषं विगाहथा:

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (यत्) = जो (दाशराज्ञे) = दसों इन्द्रियों पर शासन के लिए (अदः मानुषम्) = उस मनुष्योचित कर्म का तू (विगाहथा:) = विलोडन करता है, अर्थात् जब तू जितेन्द्रिय बनने के लिए सदा मनुष्योचित कर्मों में प्रवृत्त रहता है तब 'तु' (सर्वस्मै) = सबके लिए (विरूप: आसीत्) = विशिष्ट रूपवाला होते है। यह सदा मानवकर्मों में प्रवृत्त जितेन्द्रिय पुरुष सम्पूर्ण समाज में चमक जाता है। २. (सः ह) = यही निश्चय से (यक्षाय) = उस प्रभु के साथ सम्पर्क के लिए (कल्पते) = समर्थ होता है।

    भावार्थ

    मानवोचित कर्मों में व्याप्त जितेन्द्रिय पुरुष ही विरूप बनता है और प्रभुसम्पर्क में समर्थ होता है।

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    भाषार्थ

    (इन्द्र) हे परमेश्वर! (दाशराज्ञे=दाशराज्ये) १० इन्द्रियों के राज्य में वर्तमान (यद् अदः) जो उस (मानुषम्) मानुष-आत्मा को, आपने उसके कर्मों के अनुसार, (वि गाहथाः) विविध योनियों में विलोड़ा है, वह पहिले (सर्वस्मै) सबके लिए (विरूपः) अवाञ्छनीय रूपवाला (आसीत्) था, जो वह अब (सह) आपका संगी बन कर, (यक्षाय) आप-पूजनीय की प्राप्ति के लिए (कल्पते) समर्थ हो गया है।

    टिप्पणी

    [दाशराज्ये=एक-एक इन्द्रिय का भी राज्य यदि जीवन में हो जाता है, तो जीवन सुखी और पवित्र नहीं रहता। यदि १० इन्द्रियों का स्वेच्छाचारी राज्य जीवन में हो जाए, तो व्यक्ति महादुःखी और महा-अपवित्र हो जाता और सबके लिए अवाञ्छनीय रूपवाला हो जाता है। तब वह नाना जन्मों में पूर्वकृत-कर्मों के फल भोग लेने के पश्चात् शुद्ध-पवित्र होकर, परमेश्वर का संगी बनकर परमेश्वर की प्राप्ति के लिए समर्थ हो जाता है। यक्षाय=यक्ष पूजायाम्। केनोपनिषद् में यक्ष-प्रभु का वर्णन है।]

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    विषय

    वीर राजा का कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    (यत्) जिस प्रकार से हे (इन्द्र) इन्द्र ! ऐश्वर्यवन् ! (दाशराज्ञे) तू दशों दिशाओं के राजाओं के बीच (मानुषं) मनुष्य समूह को, अथवा (अमानुषम्) सामान्य मनुष्य से विलक्षण होकर (विगाहथाः) विचरता है। तू ही (सर्वस्मा) सबको (वरूथः) घर के समान शरण देने वाला और आपत्ति विपत्तियों और शत्रु के आक्रमणों को रोकने वाला (आसीत्) होता है (सः ह) वह ऐसा पुरुष ही (यज्ञाय) यज्ञ, प्रजापति पद के योग्य (कल्पते) होता है।

    टिप्पणी

    ‘यदिन्द्रो दाश’—इति तै० ब्रा० भाष्ये सायणः। ‘विरूपः’, ‘यदिन्द्रादो’ ‘यक्षाय’ इति शं० पा०। ‘यक्ष्माय’ इति राथः। यज्ञाय इति क्वचित्।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथातः पञ्च इन्द्रगाथाः।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Prajapati

    Meaning

    Indra, when you churned man for his behaviour as he acted in slavery to the rule of his lower senses and mind over the spirit, that corrective response appeared to be unkind. But in reality that was to re-educate the man toward the yajnic way of living intelligently according to higher reason.

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    Translation

    O learned man, since you plung in to the battle raised by ten king in a manner which for a mortal one is very diffiult and that act of yours is a guard for all, therefore, you are treated capable of performing good and eventful acts.

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    Translation

    O learned man, since you plung in to the battle raised by ten king in a manner which for a mortal one is very difficult and that act of yours is a guard for all, therefore, you are treated capable of performing good and eventful acts.

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    Translation

    O powerful king, thou, who fully smashes the foes, firm and strong like the mountains, and who penetrates the enemy’s forces streaming like Griffith and other western scholars’ reading of history in these verses is merely conjectural and inappropriate, currents of water, the mighty lord, who is a great destroyer of the foes, let our respectful obeisance be to thee.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १२−(यत्) यदा (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् मनुष्य (अदः) तत्। वेदोक्तम् (दाशराज्ञे) दाशृ दाने-घञ्। राजृ दीप्तौ ऐश्वर्ये च-कनिन्। दाशानां दानीयानां दानपात्राणां भृत्यानां स्वामिहिताय। स्वार्थाय (मानुषम्) मनु-अण् षुक् च। मनुष्यसम्बन्धि कर्म (वि गाहथाः) गाहृ विलोडने-लुङ्, अडभावः। विलोडितवानसि (विरूपः) विकृतरूपो दुष्टरूपो व्यवहारः (सर्वस्मै) प्रत्येकप्राणिने (आसीत्) (सह) संयोगेन (यक्षाय) यक्ष पूजायाम्-घञ्। पूजनीयकर्मणे (कल्पते) कृपू सामर्थ्ये। समर्थो भवति ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মনুষ্যকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (যৎ) যখন, (ইন্দ্র) ইন্দ্র! [পরম্ ঐশ্বর্যবান্ মনুষ্য] (দাশরাজ্ঞে) দানপাত্র সেবকদের রাজার জন্য [অর্থাৎ নিজের জন্য] (অদঃ) সেই [বেদোক্ত] (মানুষম্) মনুষ্যের কর্মকে (বি গাহথাঃ) তুমি বিলোড়িত করেছো। (সর্বস্মৈ) সকলের জন্য (বিরূপঃ) এমন দুষ্ট রূপ আচরণ (আসীৎ) হয়েছে। এই [মনুষ্য] (যক্ষায়) পূজনীয় কর্মের জন্য (সহ) সকলে মিলে (কল্পতে) সমর্থ হয়॥১২॥

    भावार्थ

    যে মনুষ্য বেদমর্যাদা ভঙ্গ করে স্বার্থের জন্য সেবক আদিকে বিরক্ত করে, সে সকলকে কষ্ট দেয়, সেজন্য মানুষের উচিৎ সর্বদা পরোপকার করা॥১২॥

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    भाषार्थ

    (ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (দাশরাজ্ঞে=দাশরাজ্যে) ১০ ইন্দ্রিয়-সমূহের রাজ্যে বর্তমান (যদ্ অদঃ) যে সেই (মানুষম্) মানুষ-আত্মাকে, আপনি তাঁর কর্ম অনুসারে, (বি গাহথাঃ) বিবিধ যোনিতে ক্রিয়াশীল করেছো, তা প্রথমে/পূর্বে (সর্বস্মৈ) সকলের জন্য (বিরূপঃ) অবাঞ্ছনীয় রূপবিশিষ্ট (আসীৎ) ছিল, এখন (সহ) আপনার সঙ্গী হয়ে, (যক্ষায়) পূজনীয় আপনার প্রাপ্তির জন্য (কল্পতে) সমর্থ হয়ে গেছে।

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