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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 128 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 128/ मन्त्र 4
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिरिन्द्रो वा छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    62

    यश्च॑ प॒णि रघु॑जि॒ष्ठ्यो यश्च॑ दे॒वाँ अदा॑शुरिः। धीरा॑णां॒ शश्व॑ताम॒हं तद॑पा॒गिति॑ शुश्रुम ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । च॑ । प॒णि । रघु॑जि॒ष्ठ्य: । य: । च॑ । दे॒वान् ।‍ अदा॑शुरि: ॥ धीरा॑णा॒म् । शश्व॑ताम् । अ॒हम् । तत् । अ॑पा॒क् । इति॑ । शुश्रुम ॥१२८.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यश्च पणि रघुजिष्ठ्यो यश्च देवाँ अदाशुरिः। धीराणां शश्वतामहं तदपागिति शुश्रुम ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । च । पणि । रघुजिष्ठ्य: । य: । च । देवान् ।‍ अदाशुरि: ॥ धीराणाम् । शश्वताम् । अहम् । तत् । अपाक् । इति । शुश्रुम ॥१२८.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 128; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जो मनुष्य (पणि) कुव्यवहारी (रघुजिष्ठ्यः) अत्यन्त हलका है, (च च) और (यः) जो (देवान्) विद्वानों को (अदाशुरिः) नहीं दान देनेवाला है, (तत्) वह (शश्वताम्) सब (धीराणाम्) धीर पुरुषों में (अपाक्) दूर रहने योग्य है−(इति) ऐसा (अहम्) हमने (शुश्रुम) सुना है ॥४॥

    भावार्थ

    विद्वानों को प्रयत्न करना चाहिये कि उनके सन्तान विद्वान् होकर विद्वानों से मिलकर रहें ॥३, ४॥

    टिप्पणी

    ४−(यः) (च) (पणि) विभक्तेर्लुक्। पणिः। कुव्यवहारी (रघुजिष्ठ्यः) लघुज्येष्ठ्यः, छान्दसं रूपम्, लघु+ज्येष्ठ-भावे यत्। लघुषु निःसारेषु ज्येष्ठ्यम् अतिशयेन वर्धनं यस्य सः। अतिशयेन निःसारः (यः) (च) (देवान्) विदुषः प्रति (अदाशुरिः) अ+दाशृ दाने-उरिन् प्रत्ययः। अदानशीलः (धीराणाम्) बुद्धिमतां मध्ये (शश्वताम्) बहूनाम्। सर्वेषाम् (अहम्) बहुवचनस्यैकवचनम्। वयम् (तत्) सः (अपाक्) दूरे गमनीयः (इति) एवम् (शुश्रुम) वयं श्रुतवन्तः ॥

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    विषय

    धन तथा दानशीलता

    पदार्थ

    १. (य: च) = और जो (पणि:) = वणिक् वृत्तिवाला होता हुआ (रघुजिष्टयः) = औरों का पालन करनेवाला नहीं। (यः च) = और जो (देवान् अदाशुरि:) = देवों के प्रति देने की वृत्तिवाला नहीं अथवा (देवान्) = धनी होता हुआ [अदाशुरिः] न देने की वृत्तिवाला है। वह (शश्वतां धीराणाम्) = प्लुतगतिवाले क्रियाशील धीर पुरुषों में (अपाग्) = [अप अञ्च्] निम्न गतिवाला है। (अहम् इति शुश्रुम) = मैंने ऐसा सुना है अथवा सदा से धीर पुरुषों से हमने ऐसा सुना है कि वह अदानशील पुरुष नीच गतिवाला है।

    भावार्थ

    धन की शोभा दान में है। धनी होते हुए न देना निम्न गति का कारण बनता है।

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    भाषार्थ

    (यः च) और जो (पणिः) व्यापारी है, परन्तु (रघुजिष्ठ्यः) हे लघु-हृदयवालों में अत्यन्त लघु हृदयवाला अर्थात् अति कंजूस; (यः च) और जो (देवान्) देवकोटि के महात्माओं को (अदाशुरिः) दान नहीं देता, या देवयज्ञ अर्थात् अग्निहोत्र नहीं करता; (शश्वतां धीराणाम्) शाश्वत काल के बुद्धिमानों के इस कथन को (अहम्) मैंने तथा हमने (शुश्रुम) सुना है, कि (तत्) वह पुरुष (अपाक् इति) पिछड़ा हुआ है।

    टिप्पणी

    [अदाशुरिः=अ+दाशृ (दाने)।]

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    विषय

    दिशाओं के नामभेद से पुरुषों के प्रकार भेद।

    भावार्थ

    और (यः च) जो (पणिः) व्यापारी, व्यवहारवान् होकर भी (अ-भुजिष्ठः) दूसरों का पालन नहीं करता या धन का भोग नहीं करता और (यः च) और जो (रेवान्) धन सम्पन्न होकर भी (अदाशुरिः) दूसरों को दान नहीं करता (शश्वतां) पूज्य, (धीराणाम्) बुद्धिमान् पुरुषों के बीच में (अह) निश्चय से वह (अपाग्) ‘अपाग्’ नीचे पद के पाने योग्य है (इति) ऐसा (शुश्रुम) सुनते हैं।

    टिप्पणी

    (प्र०) पणिरभुजिष्ठो। शं० पा०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथ पञ्च क्लृप्तयः॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Prajapati

    Meaning

    But whoever is calculative, smallest among men of small mind, whoever is mean and ungiving toward the noble and generous, of him we have heard from the patient wise men of universal values that he is unworthy of mixing with the noble ones.

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    Translation

    Are cast away by all the wise men he who bad in dealings and of lowest standard and the man possessing wealth and giving no gift and this I hear.

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    Translation

    Are cast away by all the wise men he who bad in dealings and of lowest standard and the man possessing wealth and giving no gift and this I hear.

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    Translation

    The person, who Iacks vision of discrimination like the unointed eye, who is not charming and healthy, like the unointed body, who is virtue less like the unornamented who is poor and lusterless, like the goldless, who is ignorant the vedic lore and devotion of God in spite of his being the son or disciple of a Brahman, all these persons are regarded as of the same category in the procedure of actions.

    Footnote

    Here in this sukta the use of various directions is made to shows the level of a person with certain qualities or drawbacks, in the society. Griffith’s translation of “तोता कल्पेषु संमिता” by “these things are orderdered in the rules” has no relevancy here.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(यः) (च) (पणि) विभक्तेर्लुक्। पणिः। कुव्यवहारी (रघुजिष्ठ्यः) लघुज्येष्ठ्यः, छान्दसं रूपम्, लघु+ज्येष्ठ-भावे यत्। लघुषु निःसारेषु ज्येष्ठ्यम् अतिशयेन वर्धनं यस्य सः। अतिशयेन निःसारः (यः) (च) (देवान्) विदुषः प्रति (अदाशुरिः) अ+दाशृ दाने-उरिन् प्रत्ययः। अदानशीलः (धीराणाम्) बुद्धिमतां मध्ये (शश्वताम्) बहूनाम्। सर्वेषाम् (अहम्) बहुवचनस्यैकवचनम्। वयम् (तत्) सः (अपाक्) दूरे गमनीयः (इति) एवम् (शुश्रुम) वयं श्रुतवन्तः ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    মনুষ্যকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (যঃ) যে মনুষ্য (পণি) কুব্যবহারী (রঘুজিষ্ঠ্যঃ) অত্যন্ত নিঃসার, (চ চ) এবং (যঃ) যে (দেবান্) বিদ্বানদের (অদাশুরিঃ) দান দেয় না, (তৎ) সে (শশ্বতাম্) সকল (ধীরাণাম্) স্থিরচিত্ত/বিদ্বান পুরুষদের থেকে (অপাক্) দূরে থাকার যোগ্য−(ইতি) এরূপ (অহম্) আমরা (শুশ্রুম) শুনেছি/শ্রবণ করেছি ॥৪॥

    भावार्थ

    বিদ্বানদের প্রচেষ্টা করা উচিৎ যেন তাঁদের সন্তান বিদ্বান হয় এবং বিদ্বানদের সাথে মেলামেশা করে ॥৩, ৪॥

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    भाषार्थ

    (যঃ চ) এবং যে (পণিঃ) বণিক, কিন্তু (রঘুজিষ্ঠ্যঃ) হে লঘু-হৃদয়সম্পন্নদের মধ্যে অত্যন্ত লঘু হৃদয়সম্পন্ন অর্থাৎ অতি কৃপণ; (যঃ চ) এবং যে (দেবান্) দেবকোটির মহাত্মাদের (অদাশুরিঃ) দান দেয় না, বা দেবযজ্ঞ অর্থাৎ অগ্নিহোত্র করে না; (শশ্বতাং ধীরাণাম্) শাশ্বত কালের বুদ্ধিমানদের এই কথন (অহম্) আমি তথা আমরা (শুশ্রুম) শুনেছি, যে (তৎ) সেই পুরুষ (অপাক্ ইতি) আলাদা হয়ে আছে/পেছনে পড়ে আছে।

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