अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 132/ मन्त्र 1
ऋषिः -
देवता - प्रजापतिः
छन्दः - प्राजापत्या गायत्री
सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
143
आदला॑बुक॒मेक॑कम् ॥
स्वर सहित पद पाठआत् । अला॑बुक॒म् । एक॑कम् ॥१३२.१॥
स्वर रहित मन्त्र
आदलाबुकमेककम् ॥
स्वर रहित पद पाठआत् । अलाबुकम् । एककम् ॥१३२.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
[वह ब्रह्म] (अलाबुकम्) न डूबनेवाला (आत्) और (एककम्) अकेला है ॥१॥
भावार्थ
वह ब्रह्म निराधार अकेला होकर सबका आधार और बनानेवाला है, वायु आदि पदार्थ उसकी आज्ञा में चलते हैं। सब मनुष्य उसकी उपासना करें ॥१-४॥
टिप्पणी
[पदपाठ के लिये सूचना सूक्त १२७ देखो ॥]१−(आत्) अनन्तरम् (अलाबुकम्) नञि लम्बेर्नलोपश्च। उ० १।८७। नञ्+लबि अवस्रंसने-ऊ, ऊकारस्य उकारः, स च, णित् नलोपश्च, स्वार्थे कन्। न लम्बते कुत्रापि। अनधःपतनशीलम् निराधारं ब्रह्म (एककम्) स्वार्थे कन्। असहायम् ॥
विषय
'सर्वव्यापक-अद्वितीय-कूटस्थ' प्रभु
पदार्थ
१. (आत्) = सर्वथा [at all] वे प्रभु (अलाबुकम्) = [लवि अवलंसने] न अध:पतनशील हैं। वे प्रभु निराधार होते हुए सर्वाधार हैं। सर्वव्यापक होने से उन्हें आधार की आवश्यकता नहीं। उनके अध:पतन का कोई प्रसंग ही नहीं-'वे किसी स्थान पर न हो' ऐसी बात ही नहीं। २. (एककम्) = वे एक ही हैं। अद्वितीय हैं। अकेले होते हुए भी सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान् होने से वे अपने सब कार्यों को स्वयं कर सकते हैं। उन्हें किसी अन्य के सहाय्य की अपेक्षा नहीं। ३. (अल्लाबुकम्) = वे कभी स्त्रस्त नहीं होते। उन्हें त्रस्त होना ही कहाँ? वे तो पहले ही सब जगह हैं। (निखातकम्) = अपने स्थान पर दृढ़ता से गढ़े हुए हैं, स्थिर हैं-ध्रुव हैं 'कूटस्थः, अचलो ध्रुवः |
भावार्थ
प्रभु सर्वत्र व्यापक होने से अध:पतनशील व लस्त होनेवाले नहीं। वे एक, अद्वितीय हैं। अचल व ध्रुव हैं।
भाषार्थ
(आत्) तदनन्तर (अलाबुकम्) तूम्बे के सदृश तैरानेवाला, अर्थात् भवसागर से तैरानेवाला (एककम्) एक ब्रह्म ही है।
विषय
missing
भावार्थ
(आत् एककम्) और वह एकमात्र (अलाबुकम्) तुम्बे के समान रहता है। अर्थात् जिस प्रकार तूम्बा एकमात्र समस्त जल के बीच में रहकर भी उसके ऊपर तैरता है इसी प्रकार अग्रणी राजा समस्त प्रजा और सेना के ऊपर विराजता है। और स्वच्छन्दता से जल प्रवाह और सेना प्रवाह के साथ जाता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
missing
इंग्लिश (4)
Subject
Prajapati
Meaning
Just as the gourd floats on water, so the One that ‘floats’, i.e., transcends, the ocean of existence is Brahma.
Translation
This unsinking one is firmly established.
Translation
This unsinking one is firmly established.
Translation
Then the soul alone crosses the sea of life like the gourd and does not sink in it.
Footnote
The pithy verses of suktas 129 to 132 can be variously interpreted as they are full of mysterious import. I have simply given their Adhyatmic version only.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
[पदपाठ के लिये सूचना सूक्त १२७ देखो ॥]१−(आत्) अनन्तरम् (अलाबुकम्) नञि लम्बेर्नलोपश्च। उ० १।८७। नञ्+लबि अवस्रंसने-ऊ, ऊकारस्य उकारः, स च, णित् नलोपश्च, स्वार्थे कन्। न लम्बते कुत्रापि। अनधःपतनशीलम् निराधारं ब्रह्म (एककम्) स्वार्थे कन्। असहायम् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
পরমাত্মগুণোপদেশঃ
भाषार्थ
[এই ব্রহ্ম] (অলাবুকম্) অনধঃপতনশীল/না পতনশীল (আৎ) এবং (এককম্) একক/একাকী ॥১॥
भावार्थ
এই ব্রহ্ম নিরাধার একাকী হয়ে সকলের আধা এবং নির্মাতা, বায়ু আদি পদার্থ পরমেশ্বরের আজ্ঞায় কার্য করে। সকল মনুষ্য সেই পরমেশ্বরের উপাসনা করুক ॥১-৪॥
भाषार्थ
(আৎ) তদনন্তর (অলাবুকম্) অলাবু[gourd] সদৃশ উদ্ধারকারী, অর্থাৎ ভবসাগর থেকে উদ্ধারকারী (এককম্) এক ব্রহ্মই।
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