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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 133 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 133/ मन्त्र 5
    ऋषि: - देवता - कुमारी छन्दः - निचृदनुष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
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    श्लक्ष्णा॑यां॒ श्लक्ष्णि॑कायां॒ श्लक्ष्ण॑मे॒वाव॑ गूहसि। न वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    श्लक्ष्णा॑या॒म् । श्लक्ष्णि॑काया॒म् । श्लक्ष्ण॑म् । ए॒व । अव॑ । गूहसि । न । वै । कु॒मारि॒ । तत् । तथा॒ । यथा॑ । कुमारि॒ । मन्य॑से ॥१३३.५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    श्लक्ष्णायां श्लक्ष्णिकायां श्लक्ष्णमेवाव गूहसि। न वै कुमारि तत्तथा यथा कुमारि मन्यसे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    श्लक्ष्णायाम् । श्लक्ष्णिकायाम् । श्लक्ष्णम् । एव । अव । गूहसि । न । वै । कुमारि । तत् । तथा । यथा । कुमारि । मन्यसे ॥१३३.५॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 133; मन्त्र » 5
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    पदार्थ -
    (श्लक्ष्णायाम्) चिकनी [कोमल] और (श्लक्ष्णिकायाम्) मनोहर वाणी में (श्लक्ष्णम्) स्नेह [प्रेम] को (एव) निश्चय करके (अव) शुद्धि के साथ (गूहसि) तू गुहा [हृदय] में रखती है। (कुमारि) हे कुमारी ! ......... [म० १] ॥॥

    भावार्थ - स्त्री आदि मधुर मनोहर वाणी से शुद्ध प्रेम के साथ उपदेश करें, स्त्री आदि ............. [म० १] ॥॥


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    Meaning -
    In the reduced as well as in the refined fluctuations you only hide and retain their latencies in the subtlest form. Release and freedom, innocent maiden, is not possible the way you think and believe.


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