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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 135 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 135/ मन्त्र 1
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिरिन्द्रश्च छन्दः - स्वराडार्ष्यनुष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    105

    भुगि॑त्य॒भिग॑तः॒ शलि॑त्य॒पक्रा॑न्तः॒ फलि॑त्य॒भिष्ठि॑तः। दु॒न्दुभि॑माहनना॒भ्यां जरितरोथा॑मो दै॒व ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भुक् । इ॑ति । अ॒भिऽग॑तु॒: । शल् । इ॑ति । अ॒पऽक्रा॑न्त॒: । फल् । इ॑ति । अ॒भिऽस्थि॑त: ॥ दुन्दुभि॑म् । आहनना॒भ्याम् । जरित: । आ । उथाम॑: । दै॒व ॥१३५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भुगित्यभिगतः शलित्यपक्रान्तः फलित्यभिष्ठितः। दुन्दुभिमाहननाभ्यां जरितरोथामो दैव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भुक् । इति । अभिऽगतु: । शल् । इति । अपऽक्रान्त: । फल् । इति । अभिऽस्थित: ॥ दुन्दुभिम् । आहननाभ्याम् । जरित: । आ । उथाम: । दैव ॥१३५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 135; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (2)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (भुक्) पालनेवाला [परमात्मा] (अभिगतः) सामने पाया गया है−(इति) ऐसा है, (शल्) शीघ्रगामी वह (अपक्रान्तः) सुख से आगे चलता हुआ है−(इति) ऐसा है, (फल्) सिद्धि करनेवाला वह (अभिष्ठितः) सब ओर ठहरा हुआ है−(इति) ऐसा है। (जरितः) हे स्तुति करनेवाले (दैव) परमात्मा को देवता माननेवाले विद्वान् ! (दुन्दुभिम्) ढोल को (आहननाभ्याम्) दो डंकों से (आ) सब ओर (उथामः) हम उठावें [बल से बजावें] ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि परमेश्वर के उपकारों को देखकर डंके की चोट प्रयत्नी और उपकारी होवें ॥१॥

    टिप्पणी

    [पदपाठ के लिये सूचना सूक्त १२७ देखो ॥]१−(भुक्) भुज पालनाभ्यवहारयोः−क्विप्। पालकः परमात्मा (इति) एवं वर्तते (अभिगतः) आभिमुख्येन प्राप्तः (शल्) शल गतौ−क्विप्। शीघ्रगामी (इति) (अपक्रान्तः) अप आनन्दे+क्रमु पादविक्षेपे−क्त। सुखेन क्रमणशीलः (फल्) फल निष्पत्तौ−क्विप्। सिद्धिकर्ता परमेश्वरः (इति) (अभिष्ठितः) सर्वतः स्थितः (दुन्दुभिम्) बृहड्ढक्काम् (आहननाभ्याम्) ताडनस्य वादनस्य साधनाभ्याम् (जरितः) जरिता स्तोतृनाम−निघ० ३।१६। हे स्तोतः (आ) समन्तात् (उथामः) उत्+ष्ठा−लट् अन्तर्गतण्यर्थः। उत्थामः। उत्थापयामः। उच्चैर्वादयामः (दैव) देव−अण्। देवः परमात्मा देवता यस्य, तत्संबुद्धौ। हे परमेश्वरोपासक विद्वन् ॥

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    विषय

    भुक्, शल्, फल्

    पदार्थ

    १. (भुक्) = 'हे प्रभो! आप ही तो पालनेवाले हो' (इति) = यह चिन्तन करता हुआ स्तोता (अभिगत:) = आपकी ओर चलनेवाला बनता है। (शल्) = 'वह प्रभु ही संसार का संचालक है, सम्पूर्ण गतियों को देनेवाले वे प्रभु ही हैं' (इति) = यह सोचकर (अपक्रान्तः) = यह स्तोता सब विषय वासनाओं से दूर हो जाता है। सर्वत्र प्रभु की गति को देखता हुआ उसकी सर्वव्यापकता को अनुभव करता हुआ विषयों में नहीं फंसता। (फल्) = 'प्रभु ही सब वासनाओं को विशीर्ण करनेवाले है' (इति) = यह सोचकर यह स्तोता (अभिष्ठित:) = प्रात:-सायं उस प्रभु के चरणों में स्थित होता है। यह प्रभु की उपासना ही उसे काम, क्रोध को पराजित करने में समर्थ करती है। २. हे (जरित:) = हमारी वासनाओं को जीर्ण करनेवाले प्रभो! (दैव) = सब देवों को देवत्व प्राप्त करानेवाले प्रभो! हम (आहननाभ्याम्) = [हन् गतौ] शरीर में सर्वत्र [आ] प्राणापान की गति के द्वारा (दुन्दुभिः) = अन्तर्नाद को (आउथामः) = [उत्थापयामः] उठाने का प्रयत्न करते हैं। प्राणायाम द्वारा मलों के दूर होने पर ही तो अन्त:स्थित आपकी प्रेरणा सुन पड़ती है।

    भावार्थ

    हम प्रभु को "भुक्' जानकर प्रभु की ओर चलें, उसे 'शल' समझते हुए वासनाओं से बचें, उसे 'फल'जानते हुए प्रात:-सायं प्रभु-चरणों में स्थित हों। प्राणसाधना द्वारा मलों को विक्षिप्त करके अन्तर्नाद को सुनने का प्रयत्न करें।

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    इंग्लिश (2)

    Subject

    Prajapati

    Meaning

    Sufferance as well as enjoyment is experienced. Initiative and action is gone forward. The fruit of action is source. O celebrants, let us beat the drum loud with the sticks, speech and action, that Divinity is there that shapes our ends.

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    Translation

    Bhug thus means that-God is the protector and is before all; Shal thus means that God is impeller and He is over powering all; Phal thus means that God is dispenser of justice and he pervading all. O devotee. O man desirous of God, let us beat the drum with two beats.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    [पदपाठ के लिये सूचना सूक्त १२७ देखो ॥]१−(भुक्) भुज पालनाभ्यवहारयोः−क्विप्। पालकः परमात्मा (इति) एवं वर्तते (अभिगतः) आभिमुख्येन प्राप्तः (शल्) शल गतौ−क्विप्। शीघ्रगामी (इति) (अपक्रान्तः) अप आनन्दे+क्रमु पादविक्षेपे−क्त। सुखेन क्रमणशीलः (फल्) फल निष्पत्तौ−क्विप्। सिद्धिकर्ता परमेश्वरः (इति) (अभिष्ठितः) सर्वतः स्थितः (दुन्दुभिम्) बृहड्ढक्काम् (आहननाभ्याम्) ताडनस्य वादनस्य साधनाभ्याम् (जरितः) जरिता स्तोतृनाम−निघ० ३।१६। हे स्तोतः (आ) समन्तात् (उथामः) उत्+ष्ठा−लट् अन्तर्गतण्यर्थः। उत्थामः। उत्थापयामः। उच्चैर्वादयामः (दैव) देव−अण्। देवः परमात्मा देवता यस्य, तत्संबुद्धौ। हे परमेश्वरोपासक विद्वन् ॥

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