Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 135 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 135/ मन्त्र 2
    ऋषिः - देवता - प्रजापतिरिन्द्रश्च छन्दः - भुरिगनुष्टुप् सूक्तम् - कुन्ताप सूक्त
    44

    को॑श॒बिले॑ रजनि॒ ग्रन्थे॑र्धा॒नमु॒पानहि॑ पा॒दम्। उत्त॑मां॒ जनि॑मां ज॒न्यानुत्त॑मां॒ जनी॒न्वर्त्म॑न्यात् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    को॒श॒बिले॑ । रजनि॒ । ग्रन्थे॑: । धा॒नम् । उ॒पानहि॑ । पा॒दम् ॥ उत्त॑मा॒म् । जनि॑माम् । ज॒न्या । अनुत्त॑मा॒म् । जनी॒न् । वर्त्म॑न् । यात् ॥१३५.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कोशबिले रजनि ग्रन्थेर्धानमुपानहि पादम्। उत्तमां जनिमां जन्यानुत्तमां जनीन्वर्त्मन्यात् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कोशबिले । रजनि । ग्रन्थे: । धानम् । उपानहि । पादम् ॥ उत्तमाम् । जनिमाम् । जन्या । अनुत्तमाम् । जनीन् । वर्त्मन् । यात् ॥१३५.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 135; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (रजनि) रात्रि में [जैसे] (कोशबिले) कोश [सोना चाँदी रखने] के कुण्ड के भीतर (ग्रन्थेः) गाँठ के (धानम्) रखने को, [अथवा जैसे] (उपानहि) जूते में (पादम्) पैर को, [वैसे ही] (जन्या) मनुष्यों के बीच (उत्तमाम्) उत्तम (जनिमाम्) जन्म लक्ष्मी [शोभा वा ऐश्वर्य], (अनुत्तमाम्) अति उत्तम गति और (जनीन्) उत्पन्न पदार्थों को (वर्त्मनि) मार्ग में (यात्) [मनुष्य] प्राप्त होवे ॥२॥

    भावार्थ

    जैसे रात्रि में कोशागार में रखकर सोने चाँदी की, और जूता पहिनकर पैर की रक्षा करते हैं, वैसे ही मनुष्य श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न होकर उत्तम प्रवृत्ति करके उन्नति करें ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(कोशबिले) सुवर्णरूप्यस्थितिकुण्डे (रजनि) रजन्याम्। रात्रौ (ग्रन्थेः) बन्धनस्य (धानम्) स्थापनम् (उपानहि) उप+णह बन्धने−क्विप्। नहिवृतिवृषि०। पा० ६।३।११६। पूर्वपदस्य दीर्घः। चर्मपादुकायाम् (पादम्) (उत्तमाम्) श्रेष्ठाम् (जनिमाम्) जनिघसिभ्यामिण्। उ० ४।१३०। जनी प्रादुर्भावे−इण्। जनिवध्योश्च। पा० ७।३।३। वृद्धिनिषेधः। माङ् माने शब्दे च−क्विप्। जनेः उत्पत्तेः जन्मनो मां लक्ष्मीं शोभामैश्वर्यं वा (जन्या) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। जन−ड्या सप्तमीबहुवचने। जनेषु। मनुष्येषु (अनुत्तमाम्) अतिशयेन श्रेष्ठाम् (जनीन्) उत्पन्नान् पदार्थान् (वर्त्मन्) वर्त्मनि। मार्गे (यात्) यायात्। प्राप्नुयात् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    गृहस्थ से, वानप्रस्थ होकर संन्यास की ओर

    पदार्थ

    १. 'प्रभु-चरणों में स्थित होनेवाला यह व्यक्ति किस प्रकार चलता है?' इसका उल्लेख करते हुए कहते हैं कि इसके जीवन में पहली बात तो यह होती है कि (कोशबिले) = खजाने के द्वार पर (रजनि ग्रन्थे:) = [रजनि red lac] लाख की ग्रन्थि का (धानम्) = स्थापन होता है, अर्थात् अब यह कोश को बढ़ाना बन्द कर देता है। धन की वृद्धि हो तो इसके जीवन का उद्देश्य नहीं। जीवन के लिए आवश्यक धन के होने पर धन को ही बढ़ाने में लगे रहना समझदारी नहीं। २. अब यह (उपानहि पादम्) = जूते में पाँव को रखता है, अर्थात् गृहस्थ से ऊपर उठकर वानप्रस्थ बनने के लिए घर से प्रस्थान के लिए तैयार हो जाता है। ३. (उत्तमां जनिमां जन्या) = उत्तम सन्ततियों को जन्म देकर [जनयित्वा] अब यह (अनुत्तमाम्) = सर्वोत्तम (जनीन्) = प्रादुर्भावों को शक्तिविकासों को लक्ष्य करके [जनीन्-जनिम्] (वर्त्मन् यात्) = मार्ग पर चलता है। अब यह ब्रह्म प्राति के मार्ग पर ही चलता है। यही मार्ग है जिसमें उसे सर्वोत्तम शक्तियों की प्राप्ति होती है।

    भावार्थ

    हम जीवन में धन की एक सीमा का निर्धारण करें-अन्यथा आजीवन इसे कमाने में ही उलझे रहेंगे। गृहस्थ से ऊपर उठकर वानप्रस्थ बनने को तैयार हों। उत्तम सन्तानों को जन्म देने के बाद अब सर्वोत्तम शक्तियों के विकास के लिए तैयारी करें।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    हे देवाधिदेव! (मन्त्र १) आप (उत्तमाम् जनिमाम्) उत्तम-जन्म (यात्) प्राप्त कराते हैं, तथा आप (उत्तमान् जन्यान्) उत्तम जन्मों, को प्राप्त पुरुषों को, तथा उत्तम जन्मों को प्राप्त (जनीन्) जननियों को, (वर्त्मन्) उत्तममार्ग में (यात्) चलाते हैं। ऐसे पुरुष और जननियाँ (कोशबिले) अपने हृदयकोशों में, चित्तों को या तो इस प्रकार ध्यान द्वारा निहित करते हैं, जैसे कि (रजनि=रजन्याम्) रात्रि के समय (कोशबिले) खजाने के पेट में (ग्रन्थेः) धन की थैली को (धानम्) निधिरूप में बड़ी सावधानी के साथ रखा जाता है, और या अभ्यस्त अभ्यासी हृदय-कोशों में चित्तों को ऐसी सुलभता के साथ निहित कर लेते हैं, जैसे कि चलने के लिए व्यक्ति (पादम्) अपने पैर को (उपानहि) जूती में आसानी से निहित करता है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prajapati

    Meaning

    Like a purse of money, wealth kept safe in the chest at night, or the foot safeguarded in the shoe, may the lord creator give our soul, men and women, birth in the best species, i.e., best of humans, and lead men and women on the best path of life.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    As in the night there is cleft for keeping safe gold etc, as there is the tie for securing things, as there is shoe for safty of foot, so you O men attain in this world the beauty, excellent movement and created objects,

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    As in the night there is cleft for keeping safe gold etc, as there is the tie for securing things, as there is shoe for safty of foot, so you O men attain in this world the beauty, excellent movement and created objects.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    How does the soul go out of the body? Ans: Like a bird fiying out of its nests.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(कोशबिले) सुवर्णरूप्यस्थितिकुण्डे (रजनि) रजन्याम्। रात्रौ (ग्रन्थेः) बन्धनस्य (धानम्) स्थापनम् (उपानहि) उप+णह बन्धने−क्विप्। नहिवृतिवृषि०। पा० ६।३।११६। पूर्वपदस्य दीर्घः। चर्मपादुकायाम् (पादम्) (उत्तमाम्) श्रेष्ठाम् (जनिमाम्) जनिघसिभ्यामिण्। उ० ४।१३०। जनी प्रादुर्भावे−इण्। जनिवध्योश्च। पा० ७।३।३। वृद्धिनिषेधः। माङ् माने शब्दे च−क्विप्। जनेः उत्पत्तेः जन्मनो मां लक्ष्मीं शोभामैश्वर्यं वा (जन्या) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। जन−ड्या सप्तमीबहुवचने। जनेषु। मनुष्येषु (अनुत्तमाम्) अतिशयेन श्रेष्ठाम् (जनीन्) उत्पन्नान् पदार्थान् (वर्त्मन्) वर्त्मनि। मार्गे (यात्) यायात्। प्राप्नुयात् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top