Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 17 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 17/ मन्त्र 3
    ऋषि: - कृष्णः देवता - इन्द्रः छन्दः - जगती सूक्तम् - सूक्त-१७
    31

    वि॑षू॒वृदिन्द्रो॒ अमु॑तेरु॒त क्षु॒धः स इद्रा॒यो म॒घवा॒ वस्व॑ ईशते। तस्येदि॒मे प्र॑व॒णे स॒प्त सिन्ध॑वो॒ वयो॑ वर्धन्ति वृष॒भस्य॑ शु॒ष्मिणः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वि॒षु॒ऽवृत् । इन्द्र॑: । अम॑ते: । उ॒त । क्षु॒ध: । स: । इत् । रा॒य: । म॒घऽवा॑ । वस्व॑: । ई॒श॒ते॒ ॥ तस्य॑ । इत् । इ॒मे। प्र॒व॒णे । स॒प्त । सिन्ध॑व: । वय॑: । व॒र्ध॒न्ति॒ । वृ॒ष॒भस्य॑ । शु॒ष्मिण॑: ॥१७.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विषूवृदिन्द्रो अमुतेरुत क्षुधः स इद्रायो मघवा वस्व ईशते। तस्येदिमे प्रवणे सप्त सिन्धवो वयो वर्धन्ति वृषभस्य शुष्मिणः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विषुऽवृत् । इन्द्र: । अमते: । उत । क्षुध: । स: । इत् । राय: । मघऽवा । वस्व: । ईशते ॥ तस्य । इत् । इमे। प्रवणे । सप्त । सिन्धव: । वय: । वर्धन्ति । वृषभस्य । शुष्मिण: ॥१७.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 17; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (इन्द्रः) इन्द्र [महाप्रतापी राजा] (अमतेः) कंगाल का (उत) और (क्षुधः) भूख का (विषुवृत्) सर्वथा हटानेवाला है, (सः इत्) वही (मघवा) महाधनी (रायः) धन का और (वस्वः) वस्तु का (ईशते) स्वामी है। (तस्य इत्) उसी ही (वृषभस्य) श्रेष्ठ (शुष्मिणः) महाबली के (प्रवणे) सेवनीय लम्बे राज्य में (इमे) यह (सप्त सिन्धवः) बहते हुए सात समुद्ररूप छेद [हमारे दो, कान, दो नथने, दो आँखें और एक मुख अथर्व० १०।२।६] (वयः) अन्न को (वर्धन्ति) बढ़ाते हैं ॥३॥

    भावार्थ - धार्मिक प्रतापी, धनी राजा की सुनीति से प्रजागण जितेन्द्रिय होकर विद्यावृद्धि करके धनवान् और अन्नवान होवें ॥३॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    Indra, lord of all power and glory, dynamic presence all round in the world, dispels hunger and ignorance, he rules and dispenses wealth, power and peace of shelter and settlement. Indeed, under the rule of this mighty generous master, all these seven streams of nature, life and living energy flow on and evolve to perfection. (This is true of both the external world of nature under the law of the cosmic spirit and of the internal world of mind and pranic energy under the will of the spirit within.)3. Indra, lord of all power and glory, dynamic presence all round in the world, dispels hunger and ignorance, rules and dispenses wealth, power and peace of shelter and settlement. Indeed, under the rule of this mighty generous master, all these seven streams of nature, life and living energy flow on and evolve to perfection. (This is true of both the external world of nature under the law of the cosmic spirit and of the internal world of mind and pranic energy under the rule of the spirit within.)


    Bhashya Acknowledgment
    Top