अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 23/ मन्त्र 5
म॒तयः॑ सोम॒पामु॒रुं रि॒हन्ति॒ शव॑स॒स्पति॑म्। इन्द्रं॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठम॒तय॑: । सो॒म॒ऽपाम् । उ॒रुम् । रि॒हन्ति॑ । शव॑स: । पति॑म् ॥ इन्द्र॑म् । व॒त्सम् । न । मा॒तर॑: ॥२३.५॥
स्वर रहित मन्त्र
मतयः सोमपामुरुं रिहन्ति शवसस्पतिम्। इन्द्रं वत्सं न मातरः ॥
स्वर रहित पद पाठमतय: । सोमऽपाम् । उरुम् । रिहन्ति । शवस: । पतिम् ॥ इन्द्रम् । वत्सम् । न । मातर: ॥२३.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(मतयः) बुद्धिमान् लोग (सोमपाम्) ऐश्वर्य के रक्षक (उरुम्) महान्, (शवसः) बल के (पतिम्) पालनेवाले (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवान् राजा] को (रिहन्ति) पियार करते हैं, (न) जैसे (मातरः) मातेँ [गौएँ] (वत्सम्) बछड़े को ॥॥
भावार्थ
जैसे गौएँ अपने बछड़ों से प्रीति करती हैं, वैसे ही बुद्धिमान् लोग न्यायकारी राजा से प्रीति करें ॥॥
टिप्पणी
−(मतयः) मेधाविनः-निघ० ३।१। (सोमपाम्) ऐश्वर्यरक्षकम् (उरुम्) महान्तम् (रिहन्ति) रिहतिरर्चतिकर्मा-निघ० ३।१४। कामयन्ते (शवसः) बलस्य (पतिम्) पालकम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं राजानम् (वत्सम्) गोशिशुम् (न) इव (मातरः) जनन्यो गावः ॥
विषय
सोमपा, उरूं, शवसस्पतिम्, इन्द्रम्
पदार्थ
१. (मतयः) = हमसे की जानेवाली स्तुतियाँ उस (सोमपाम्) = सोम का रक्षण करनेवाले (उरुम्) = महान् (शवसस्पतिम्) = बल के स्वामी (इन्द्रम्) = सर्वशक्तिमान् प्रभु को (रिहन्ति) = [लिहन्ति] आस्वादित करती हैं-प्राप्त होती हैं। २. हमारी स्तुतियाँ प्रभु को इसप्रकार प्रास होती हैं, (न) = जैसेकि (मातरः) = धेनुएँ (वत्सम्) = बछड़े को अथवा माताएँ बच्चों को, अर्थात् हम बड़े प्रेम से प्रभु का स्तवन करते हैं।
भावार्थ
हम प्रेम से प्रभु-स्तवन करते हुए सोम का शरीर में रक्षण करें, हदय को विशाल बनाएँ, बल प्राप्त करें और परमैश्वर्यवाले हों।
भाषार्थ
(मातरः) माताएँ (सोमपाम् वत्सं न) जैसे दुग्धपायी बच्चे के साथ (रिहन्ति) स्नेह करती हैं, वैसे (मतयः) मननशील उपासक (उरुम्) महान् (शवसः पतिम्) बलों के स्वामी, और (सोमपाम्) भक्तिरसपायी (इन्द्रम्) परमेश्वर के साथ (रिहन्ति) स्नेह करते हैं।
टिप्पणी
[सोमः=दुग्ध; यथा—“सोमो दुग्धाभिरक्षाः” (ऋ০ ९.१०७.९)। अर्थात् दोही गई गौओं से सोम क्षरित हुआ है।]
विषय
राजा के कर्त्तव्य।
भावार्थ
(मातरः) गोमाताएं (वत्सं न) जिस प्रकार अपने बछड़े को (रिहन्ति) चाटती हैं, (मतयः) मननशील पुरुष और उनकी मतियें उनकी की हुई स्तुतियें और ज्ञान-धाराएं उसी प्रकार (उरुम्) उस महान् (शवसस्पतिम्) समस्त बल के पालक स्वामी, सर्वशक्तिमान् (सोमपाम्) समस्त ऐश्वर्यमय जगत्, या परम आनन्द के पालक एक भोक्ता को (रिहान्ति) स्पर्श करती हैं, उसी को अपना लक्ष्य करती हैं, उसी का वर्णन करती हैं, उसी तक पहुंचती हैं। राजा के पक्ष में—समस्त (मतयः) मतिशील पुरुष भी गायें बछड़ों के समान बलशाली राष्ट्रपति बलवान् राजा को ही छूते, उसी के ऐश्वर्य का भोग करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विश्वामित्र ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। नवर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Self-integration
Meaning
Intelligent people love Indra, great and broad minded, lover of soma and protector of honour and prosperity, and commander of strength and power, just the same way as cows love their calf.
Translation
The learned men praise the mighty ruler who is the preserver prosperity, is great and is the possessor of energy as the mothers loves their child.
Translation
The learned men praise the mighty ruler who is the preserver of prosperity, is great and is the possessor of energy as the mothers loves their child.
Translation
The wise persons cherish the Vast, Almighty Father, the Protector of the Universe, the Evil-Destroyer, just as the mother-cows lick their calves, similarly the wise cherish or espouse the mighty king, capable of protecting his vast kingdom and destroying the wicked enemies, like the cows licking the calf.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
−(मतयः) मेधाविनः-निघ० ३।१। (सोमपाम्) ऐश्वर्यरक्षकम् (उरुम्) महान्तम् (रिहन्ति) रिहतिरर्चतिकर्मा-निघ० ३।१४। कामयन्ते (शवसः) बलस्य (पतिम्) पालकम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं राजानम् (वत्सम्) गोशिशुम् (न) इव (मातरः) जनन्यो गावः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
রাজপ্রজাকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(মতয়ঃ) বুদ্ধিমানগণ (সোমপাম্) ঐশ্বর্যের রক্ষক (উরুম্) মহান্, (শবসঃ) বল (পতিম্) পালনকারী (ইন্দ্রম্) ইন্দ্র [ঐশ্বর্যবান্ রাজা]কে (রিহন্তি) কামনা করে, (ন) যেমন (মাতরঃ) মাতা [গাভী] (বৎসম্) বাছুরকে ॥৫॥
भावार्थ
যেমন গাভী নিজের বাছুরের প্রতি প্রীতি করে, তেমনই বুদ্ধিমান মনুষ্য ন্যায়কারী রাজার প্রতি প্রীতি করুক॥৫।।
भाषार्थ
(মাতরঃ) মাতা (সোমপাম্ বৎসং ন) যেমন দুগ্ধপায়ী সন্তানের প্রতি (রিহন্তি) স্নেহ করে, তেমনই (মতয়ঃ) মননশীল উপাসক (উরুম্) মহান্ (শবসঃ পতিম্) বলের স্বামী, এবং (সোমপাম্) ভক্তিরসপায়ী (ইন্দ্রম্) পরমেশ্বরের প্রতি (রিহন্তি) স্নেহ করে।
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