अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 23/ मन्त्र 6
स म॑न्दस्वा॒ ह्यन्ध॑सो॒ राध॑से त॒न्वा म॒हे। न स्तो॒तारं॑ नि॒दे क॑रः ॥
स्वर सहित पद पाठस: । म॒न्द॒स्व॒ । हि । अन्ध॑स: । राध॑से । त॒न्वा॑ । म॒हे ॥ न । स्तो॒तार॑म् । नि॒दे । क॒र॒: ॥२३.६॥
स्वर रहित मन्त्र
स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे। न स्तोतारं निदे करः ॥
स्वर रहित पद पाठस: । मन्दस्व । हि । अन्धस: । राधसे । तन्वा । महे ॥ न । स्तोतारम् । निदे । कर: ॥२३.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
[हे राजन् !] (सः) सो तू (हि) ही (तन्वा) अपने शरीर के साथ (महे) बड़े (राधसे) धन के लिये (अन्धसः) अन्न से (मन्दस्व) आनन्द कर, और (स्तोतारम्) स्तुति करनेवाले विद्वान् को (निदे) निन्दा के लिये (न) मत (करः) कर ॥६॥
भावार्थ
शरीर और आत्मा की उन्नति चाहनेवाला पुरुष विद्वानों की निन्दा कभी न करे ॥६॥
टिप्पणी
६−(सः) स त्वम् (मन्दस्व) आनन्द (हि) अवश्यम् (अन्धसः) अन्नात् (राधसे) संसाधकाय धनाय (तन्वा) शरीरेण (महे) महते (न) निषेधे (स्तोतारम्) स्तावकं विद्वांसम् (निदे) णिदि कुत्सायाम्-क्विप्, नुमभावः। निन्दायै (करः) करोतेर्लेटि, अडागमः। कुर्याः ॥
विषय
तन्वा, महे राधसे, न निदे
पदार्थ
१. हे प्रभो! (सः) = वे आप (अन्धसः) = सोम के द्वारा (हि) = निश्चय से (मन्दस्व) = हमें आनन्दित कीजिए।( तन्वा) = शक्तियों के विस्तार के हेतु से तथा (महे राधसे) = महान् ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए आप सोम के द्वारा हमें आनन्दित कीजिए। सोम-रक्षण द्वारा हम अपनी शक्तियों का विस्तार करनेवाले हों तथा मोक्षरूप महान् धन को प्राप्त कर सकें। २. आप (स्तोतारम्) = मुझ स्तोता को (निदे न कर:) = निन्दा के लिए न कीजिए। न मैं ओरों की निन्दा करता रहूँ, न निन्दा का पात्र ही बनें।
भावार्थ
प्रभु-स्तवन करता हुआ मैं सोम-रक्षण द्वारा शरीर की शक्तियों का विस्तार करूँ, अन्ततः उस महान् मोक्षधन को प्राप्त करूँ और कभी निन्दा के वशीभूत न हो जाऊँ। न निन्द्य बनें, न निन्दक होऊँ।
भाषार्थ
हे परमेश्वर! (सः) वे आप (अन्धसः) भक्तिरसरूपी अन्न रस को ग्रहण कर (मन्दस्व हि) प्रसन्न हूजिए, ताकि मैं उपासक (तन्वा) शारीरिक परिश्रम द्वारा (महे राधसे) महासिद्धि अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर सकूँ। (स्तोतारम्) अपने स्तोता को (निदे) निन्दा का पात्र (न करः) न होने दीजिए।
विषय
राजा के कर्त्तव्य।
भावार्थ
(सः) वह तू (हि) निश्चय से (महे) बड़े भारी (अन्ध सः) अन्न के और जीवनोपयोगी भोग्य पदार्थों को (तन्वा) शरीर द्वारा (राधसे) लाभ करने के लिये (मन्दस्व) सदा तृप्त रह। तू (स्तोतारम्) यथार्थ गुणों के उपदेष्टा ज्ञान प्रवक्ता विद्वाज् को (निदे) लोक-निन्दा का पात्र (न करः) कभी न बनने दे। राजा विद्वानों पर होने वाले भूख आदि पीड़ा और जन-समाज के रूढीकृत अनादर का पात्र न होने दे। ईश्वरपक्ष में—परमात्मा हम पर प्रसन्न हो, हमें शरीर से अन्नादि लाभ करावे। अपने स्तुतिकर्ता को निन्दा से बचाव।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विश्वामित्र ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। नवर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Self-integration
Meaning
Indra, lord lover of soma and commander of power, rejoice at heart with your whole personality for the realisation of food, energy and wealth of life. Let not your devotee and celebrant face an occasion of embarrassment, blame, insult or contempt.
Translation
O mighty King, that you delight your self forx having the great gain of corns through your body. You never yield your admirers to reproach.
Translation
O mighty King, that you delight yourself forx having the great gain of corns through your body. You never yield your admirers to reproach.
Translation
O God or king, mayst Thou be pleased or satisfied with offering us food and the great wealth, acquired through body. Letest not Thy devotee be exposed to reproach by others.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६−(सः) स त्वम् (मन्दस्व) आनन्द (हि) अवश्यम् (अन्धसः) अन्नात् (राधसे) संसाधकाय धनाय (तन्वा) शरीरेण (महे) महते (न) निषेधे (स्तोतारम्) स्तावकं विद्वांसम् (निदे) णिदि कुत्सायाम्-क्विप्, नुमभावः। निन्दायै (करः) करोतेर्लेटि, अडागमः। कुर्याः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
রাজপ্রজাকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
[হে রাজন্!] (সঃ) সেই তুমি (হি) ই (তন্বা) নিজের শরীরের সাথে (মহে) উত্তম (রাধসে) ধনের জন্য (অন্ধসঃ) অন্নের সহিত (মন্দস্ব) আনন্দ করো, এবং (স্তোতারম্) স্তোতা বিদ্বানকে (নিদে) নিন্দার জন্য (ন) না (করঃ) করো॥৬॥
भावार्थ
শরীর ও আত্মার উন্নতি কামনাকারী মনুষ্য, বিদ্বানদের নিন্দা কখনো যেন না করে ॥৬॥
भाषार्थ
হে পরমেশ্বর! (সঃ) সেই আপনি (অন্ধসঃ) ভক্তিরসরূপী অন্ন রস গ্রহণ করে (মন্দস্ব হি) প্রসন্ন হন, যাতে আমি উপাসক (তন্বা) শারীরিক পরিশ্রম দ্বারা (মহে রাধসে) মহাসিদ্ধি অর্থাৎ মোক্ষ প্রাপ্ত করতে পারি/সক্ষম হই। (স্তোতারম্) নিজের স্তোতাকে (নিদে) নিন্দার পাত্র (ন করঃ) হতে দেবেন না/করবেন না।
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal