अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 25/ मन्त्र 7
प्रोग्रां पी॒तिं वृष्ण॑ इयर्मि स॒त्यां प्र॒यै सु॒तस्य॑ हर्यश्व॒ तुभ्य॑म्। इन्द्र॒ धेना॑भिरि॒ह मा॑दयस्व धी॒भिर्विश्वा॑भिः॒ शच्या॑ गृणा॒नः ॥
स्वर सहित पद पाठप्र । उ॒ग्राम् । पी॒तिम् । वृष्णे॑ । इ॒य॒र्मि॒ । स॒त्याम् । प्र॒ऽयै । सु॒तस्य॑ । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । तुभ्य॑म् ॥ इन्द्र॑ । धेना॑भि: । इ॒ह । मा॒द॒य॒स्व॒ । धी॒भि: । विश्वा॑भि: । शच्या॑ । गृ॒णा॒न: ॥२५.७॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रोग्रां पीतिं वृष्ण इयर्मि सत्यां प्रयै सुतस्य हर्यश्व तुभ्यम्। इन्द्र धेनाभिरिह मादयस्व धीभिर्विश्वाभिः शच्या गृणानः ॥
स्वर रहित पद पाठप्र । उग्राम् । पीतिम् । वृष्णे । इयर्मि । सत्याम् । प्रऽयै । सुतस्य । हरिऽअश्व । तुभ्यम् ॥ इन्द्र । धेनाभि: । इह । मादयस्व । धीभि: । विश्वाभि: । शच्या । गृणान: ॥२५.७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
विद्वानों के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(हर्यश्व) हे वायु समान फुरतीले घोड़ोंवाले ! (वृष्णे तुभ्यम्) तुझ महाबली को (प्रयै) आगे चलने के लिये (सुतस्य) निचोड़ [सिद्धान्त] का (उग्राम्) तीव्र, (सत्याम्) सत्यगुणवाला (पीतिम्) घूँट (प्र इयर्मि) आगे रखता हूँ। (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले विद्वान्] (धेनाभिः) वेदवाणियों द्वारा (इह) यहाँ पर (विश्वाभिः) समस्त (धीभिः) बुद्धियों से और (शच्या) कर्म से (गृणानः) उपदेश करता हुआ तू (मादयस्व) आनन्द दे ॥७॥
भावार्थ
जो मनुष्य फुरतीली सेनावाला ज्ञानवान् और बलवान् हो, सब लोग आदर करके उस बुद्धिमान् कर्मकुशल की वैदिक शिक्षाओं से आनन्द पावें ॥७॥
टिप्पणी
यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१०।१०४।३। और आगे है-अ० २०।३३।२ ॥ इति तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः पर्यायः ॥ ७−(उग्राम्) तीव्राम् (पीतिम्) पानम् (वृष्णे) महाबलवते (प्र इयर्मि) ऋ गतौ जुहोत्यादिः। प्रेरयामि। अग्रे धरामि (सत्याम्) यथार्थगुणयुक्ताम् (प्रयै) प्रयै रोहिष्यै अव्यथिष्यै। पा० ३।४।१०। प्र+या गतिप्रापणयोः-कैप्रत्ययः, तुमर्थे। प्रयातुम्। अग्रे गन्तुम् (सुतस्य) (संस्कृतस्य) सिद्धान्तस्य (हर्यश्व) अ० ।३।८। हृञ् प्रापणस्वीकारस्त्येननाशनेषु-इन्+अशू व्याप्तौ-क्वन्। हरी इन्द्रस्य-निघ० २।१। हरिर्वायुः। हे हरिभिर्वायुतुल्यैः शीघ्रगामिभिस्तुरङ्गैर्युक्त (तुभ्यम्) (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् विद्वन् (धेनाभिः) धेट इच्च। उ० ३।११। धेट् पाने-नप्रत्ययः, टाप्। धेना वाङ्नाम-निघ० १।११। वेदवाणीभिः (इह) अत्र (मादयस्व) आनन्दय (धीभिः) प्रज्ञाभिः (विश्वाभिः) सर्वाभिः (शच्या) अ० ।११।८। शच व्यक्तायां वाचि-इन्, ङीप्। कर्मणा-निघ० २।१। (गृणानः) उपदिशंस्त्वम् ॥
विषय
'धीभि:+शच्या' गृणान:
पदार्थ
१. हे (हर्यश्व) = लक्ष्यस्थान पर पहुँचानेवाले इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करानेवाले प्रभो! (वृष्णे) = सब सुखों के वर्षक (प्रयै) = प्रकृष्ट गमनवाले (तुभ्यम्) = आपकी प्राप्ति के लिए (सतुस्य) = उत्पन्न हुए-हुए इस सोम के (उग्रम्) = उद्गुण बलवाले-तेजस्वी बनानेवाले (सत्याम्) = अवितथ सामर्थ्यवाले (पीतिम्) = पान को (प्र इयर्मि) = अपने में प्रेरित करता हूँ। इस सोम-रक्षण के द्वारा ही तो मैं आपको प्राप्त करूंगा। २. (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! आप (धीभिः) = सब बुद्धियों के द्वारा-ज्ञानप्राप्तियों के द्वारा तथा (शच्या) = कर्मों के द्वारा (गृणान:) = हमसे स्तुति किये जाते हुए (इह) = यहाँ इस जीवन में (विश्वाभिः धेनाभिः) = सम्पूर्ण सत्य-ज्ञानों को देनेवाली इन वेदवाणियों से मादयस्व हमें आनन्दित कीजिए।
भावार्थ
प्रभु-प्राप्ति के लए सोम-रक्षण आवश्यक है, यही हमें तेजस्वी व सत्यवृत्तिवाला बनाता है। हम ज्ञानप्रासि में लगने व यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त होने के द्वारा प्रभु का स्तवन करें। प्रभु हमारे हृदयों में वेदवाणियों का प्रकाश करेंगे। प्रभु की सच्ची उपासना से अपने जीवन में सुख का निर्माण करनेवाला यह शुन:शेप' है यह अत्यन्त मधुर इच्छाओंवाला होने से 'मधुचछन्दाः' होता है। अगले सूक्त में ये ही क्रमशः तीन मन्त्रों के ऋषि हैं -
भाषार्थ
(हर्यश्व) प्रत्याहार-सम्पन्न इन्द्रियाश्वों के हे स्वामी! (प्रयै) आपके प्रति प्रयाण करने के निमित्त, मैं उपासक (वृष्णे तुभ्यम्) आनन्दरसवर्षी आपके लिए (सुतस्य) उत्पन्न भक्तिरस के (सत्याम्) वास्तविक (उग्रां पीतिम्) उग्र-पान को (प्र इयर्मि) प्रेरित करता हूँ। (इन्द्र) हे परमेश्वर! (धेनाभिः) आनन्दरसरूपी दुग्ध पिलानेवाली वेदवाणियों द्वारा (इह) इस जीवन में (मादयस्व) मुझे तृप्त कर दीजिए। मैं उपासक (विश्वाभिः धीभिः) अपनी समग्र बुद्धिशक्तियों तथा कर्मशक्तियों द्वारा, तथा (शच्या) वाणी द्वारा (गृणानः) आपकी स्तुतियाँ कर रहा हूँ।
टिप्पणी
[उग्रां पीतिम्= Strong drink तीव्रसंवेगी भक्तिरस का पान। धेना=(धेट् पाने) वाक् (निघं০ १.११)। धीभिः=धीः=प्रज्ञा, कर्म (निघं০ ३.९; २.१)। शच्या=शची=वाक् (निघं০ १.११)।]
विषय
राजा का कर्त्तव्य।
भावार्थ
(वृष्णः) समस्त सुखों के वर्षक और बलवान् इन्द्र की (उग्राम्) उग्र, भयदायिनी (पीतिम्) आदानशक्ति और पालन शक्ति को, हे (हर्यश्व) वेगवान् घोड़े से युक्त राजन् ! तुझको (सुतस्य प्रयै) सुसम्पन्न राष्ट्र के प्राप्त करने के लिये (प्र इयर्मि) भली प्रकार प्रेरणा करता हूं। हे (इन्द्र) इन्द्र ! राजन् ! तू (इह) यहां, इस राष्ट्र में (धेनाभिः) परम सुखपूर्वक पान करने योग्य या सबको रस देने वाली गौओं से, वेदवाणियों से और (विश्वाभिः धीभिः) समस्त कार्य और बुद्धियों से और (शच्या) महती शक्ति के द्वारा (गृणानः) सबको सत्योपदेश देने हारा होकर तू (मादयस्व) सबको तृप्त एवं प्रसन्न कर।
टिप्पणी
राजा का कर्त्तव्य।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
१-६ गोतमो राहूगण ऋषिः। ७ अष्टको वैश्वामित्रः। १-६ जगत्यः। ७ त्रिष्टुप् षडृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Self-integration
Meaning
O lord of showers and nature’s radiant rays, I move this prayer and offer this soma drink distilled so true and exalting for your pleasure. Indra, adored and exalted by all our songs, thoughts and holy actions here, pray rejoice and exalt us too.
Translation
O Almighty God, strong you have under your control the fire which is the source of attraction. I disseminate your true guard and guidance for knowing your created world. O Lord, you through your vedic speeches and all wisdom and acts (enclothed in them), making us praise you with power and prudence make us happy.
Translation
O Almighty God, strong you have under your control the fire which is the source of attraction. I disseminate your true guard and guidance for knowing your created world. O Lord, you through your vedic speeches and all wisdom and acts (enclothed in them), making us praise you with power and prudence make us happy.
Translation
O Powerful God, king or learned person, equipped with Evil-destroying powers, I implore or impel1 Thee for the unfailing terrible means of protection and safety, for achieving the statehood, well-furnished with all the means of prosperity and well-being. O Mighty Lord, king or learned person, be wellpleased here, instructing all by Thy might, all the Veda-mantras, cows, good deeds and wisdom.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१०।१०४।३। और आगे है-अ० २०।३३।२ ॥ इति तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः पर्यायः ॥ ७−(उग्राम्) तीव्राम् (पीतिम्) पानम् (वृष्णे) महाबलवते (प्र इयर्मि) ऋ गतौ जुहोत्यादिः। प्रेरयामि। अग्रे धरामि (सत्याम्) यथार्थगुणयुक्ताम् (प्रयै) प्रयै रोहिष्यै अव्यथिष्यै। पा० ३।४।१०। प्र+या गतिप्रापणयोः-कैप्रत्ययः, तुमर्थे। प्रयातुम्। अग्रे गन्तुम् (सुतस्य) (संस्कृतस्य) सिद्धान्तस्य (हर्यश्व) अ० ।३।८। हृञ् प्रापणस्वीकारस्त्येननाशनेषु-इन्+अशू व्याप्तौ-क्वन्। हरी इन्द्रस्य-निघ० २।१। हरिर्वायुः। हे हरिभिर्वायुतुल्यैः शीघ्रगामिभिस्तुरङ्गैर्युक्त (तुभ्यम्) (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् विद्वन् (धेनाभिः) धेट इच्च। उ० ३।११। धेट् पाने-नप्रत्ययः, टाप्। धेना वाङ्नाम-निघ० १।११। वेदवाणीभिः (इह) अत्र (मादयस्व) आनन्दय (धीभिः) प्रज्ञाभिः (विश्वाभिः) सर्वाभिः (शच्या) अ० ।११।८। शच व्यक्तायां वाचि-इन्, ङीप्। कर्मणा-निघ० २।१। (गृणानः) उपदिशंस्त्वम् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
বিদ্বৎকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(হর্যশ্ব) হে বায়ুর ন্যায় শীঘ্রগামী ঘোড়াযুক্ত ! (বৃষ্ণে তুভ্যম্) মহাবলশালী তোমাকে (প্রয়ৈ) অগ্রসর/অগ্রগামী হওয়ার জন্য (সুতস্য) নিষ্পাদিত [সিদ্ধান্ত] এর (উগ্রাম্) তীব্র, (সত্যাম্) সত্যগুণযুক্ত (পীতিম্) পানীয় (প্র ইয়র্মি) সামনে প্রেরণ করি। (ইন্দ্র) হে ইন্দ্র! [ঐশ্বর্যবান্ বিদ্বান্] (ধেনাভিঃ) বেদবাণী দ্বারা (ইহ) এখানে (বিশ্বাভিঃ) সমস্ত (ধীভিঃ) বুদ্ধি দ্বারা এবং (শচ্যা) কর্ম দ্বারা (গৃণানঃ) উপদেশ করে তুমি (মাদয়স্ব) আনন্দ প্রদান করো॥৭॥
भावार्थ
যে মনুষ্য স্বতঃস্ফুর্ত সেনাযুক্ত জ্ঞানবান ও বলবান হয়, সকল মনুষ্য আদরপূর্বক সেই বুদ্ধিমান কর্মকুশলের বৈদিক শিক্ষা দ্বারা আনন্দ প্রাপ্ত হোক ॥৭॥ এই মন্ত্র ঋগ্বেদে আছে ১০।১০৪।৩ এবং আছে-২০।৩৩।২।
भाषार्थ
(হর্যশ্ব) প্রত্যাহার-সম্পন্ন ইন্দ্রিয়াশ্বের হে স্বামী! (প্রয়ৈ) আপনার প্রতি প্রয়াণ করার জন্য, আমি উপাসক (বৃষ্ণে তুভ্যম্) আনন্দরসবর্ষী আপনার জন্য (সুতস্য) উৎপন্ন ভক্তিরসের (সত্যাম্) বাস্তবিক (উগ্রাং পীতিম্) উগ্র-পান (প্র ইয়র্মি) প্রেরিত করি। (ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (ধেনাভিঃ) আনন্দরসরূপী দুগ্ধ প্রদায়ী বেদবাণীর দ্বারা (ইহ) এই জীবনে (মাদয়স্ব) আমাকে তৃপ্ত করুন। আমি উপাসক (বিশ্বাভিঃ ধীভিঃ) নিজের সমগ্র বুদ্ধিশক্তি তথা কর্মশক্তি দ্বারা, তথা (শচ্যা) বাণী দ্বারা (গৃণানঃ) আপনার স্তুতি করছি।
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