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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 37 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 37/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-३७
    57

    यस्ति॒ग्मशृ॑ङ्गो वृष॒भो न भी॒म एकः॑ कृ॒ष्टीश्च्या॒वय॑ति॒ प्र विश्वाः॑। यः शश्व॑तो॒ अदा॑शुषो॒ गय॑स्य प्रय॒न्तासि॒ सुष्वि॑तराय॒ वेदः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । ति॒ग्मऽशृ॑ङ्ग: । वृ॒ष॒भ: । न । भी॒म: । एक॑: । कृ॒ष्टी: । च्य॒वय॑ति । प्र । विश्वा॑: ॥ य: । शश्व॑त: । अदा॑शुष: । गय॑स्य । प्र॒ऽय॒न्ता । अ॒सि॒ । सुस्वि॑ऽतराय । वेद॑: ॥३७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम एकः कृष्टीश्च्यावयति प्र विश्वाः। यः शश्वतो अदाशुषो गयस्य प्रयन्तासि सुष्वितराय वेदः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । तिग्मऽशृङ्ग: । वृषभ: । न । भीम: । एक: । कृष्टी: । च्यवयति । प्र । विश्वा: ॥ य: । शश्वत: । अदाशुष: । गयस्य । प्रऽयन्ता । असि । सुस्विऽतराय । वेद: ॥३७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 37; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (2)

    विषय

    राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (एकः) अकेला [वही] (विश्वा) सब (कृष्टीः) मनुष्य प्रजाओं को (प्र) अच्छे प्रकार (च्यावयति) चलाता है, (यः) जो (तिग्मशृङ्गः न) तीखी किरणोंवाले सूर्य के समान (भीमः) भयङ्कर और (वृषभः) बरसा करनेवाला है। और (यः) जो (शश्वतः) निरन्तर (अदाशुषः) न देनेवाले के (गयस्य) घर का (वेदः) धन (सुष्वितराय) अधिक ऐश्वर्यवाले व्यवहार के लिये (प्रयन्ता) देनेवाला (असि) है ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्य अपने ताप से जल खींच बरसा करके उपकार करता है, वैसे ही राजा कुदानी वा कंजूसों से धन लेकर विद्या आदि शुभ कर्मों में लगावे ॥१॥

    टिप्पणी

    यह सूक्त ऋग्वेद में है-७।१९।१-११॥१−(यः) पुरुषः (तिग्मशृङ्गः) तिग्मानि तेजःस्वीनि शृङ्गाणि किरणा यस्य स सूर्यः (वृषभः) वृष्टिकरः (न) इव (भीमः) भयङ्करः (एकः) अद्वितीयः (कृष्टीः) मनुष्यप्रजाः (च्यावयति) चालयति (प्र) प्रकर्षेण (विश्वाः) सर्वाः (यः) (शश्वतः) निरन्तरस्य, सदा वर्तमानस्य (अदाशुषः) अदातुः पुरुषस्य (गयस्य) गृहस्य (प्रयन्ता) नियमयिता। प्रदाता (असि) अस्ति (सुष्वितराय) अ०२०।३।१। अधिकैश्वर्यवते व्यवहाराय (वेदः) धनम्-निघ०२।१०॥

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    विषय

    तिग्मशृंगो वृषभो न भीमः

    पदार्थ

    १. हे इन्द्र! (य:) = जो आप हैं वे (तिग्मशृंग:) = तीक्ष्ण सींगोंवाले (वृषभः न) = बैल के समान (भीमः) = शत्रुओं के लिए भयंकर हैं। (एक:) = आप अकेले ही (विश्वा:कृष्टी:) = सब शत्रुभूत मनुष्यों को (प्रच्यावयति) = स्थानभ्रष्ट करते हैं। प्रभु को हम हृदय में उपासित करते हैं, प्रभु हमारे शत्रुओं को वहाँ से भगा देते हैं-वहाँ काम-क्रोध आदि का स्थान नहीं रहता। २. हे प्रभो! (य:) = जो आप हैं, वे (अदाशुष:) = अदानशील (शश्वत:) = व्यापारादि के लिए प्लुतगतिवाले-व्यापार में खूब निमग्न पुरुष के (गयस्य) = धन के [Welth] प्रयन्ता-[restrain, stop, suppress] निग्रह करनेवाले (असि) = हैं और (सुष्वितराय) = अतिशयेन यज्ञशील पुरुष के लिए (वेदः) = धन को प्रयन्त (असि) = देनेवाले हैं [offer, give]।

    भावार्थ

    प्रभु हमारे शत्रुओं का विनाश करते हैं। अदानशील पुरुषों के धन का निग्रह करते हैं और यज्ञशील पुरुषों के लिए धन प्राप्त कराते हैं।

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    इंग्लिश (2)

    Subject

    lndra Devata

    Meaning

    Indra, lord commander of weapons sharp and blazing as rays of light, virile, generous and yet fearsome as a bull, is the one supreme who guides, controls, rules and inspires the world community, and he is the one who always is the supporting power of the house and children of the indigent who cannot afford to pay for education and development. O lord, you are the guide and giver of wealth and knowledge to the man dedicated to the yajnic development of humanity.

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    Translation

    He who is dreadful like a bull of pointed horns rules all the people alone and He is that who gives the benevolent man the wealth of the house belonging to man who is a habitue miser.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह सूक्त ऋग्वेद में है-७।१९।१-११॥१−(यः) पुरुषः (तिग्मशृङ्गः) तिग्मानि तेजःस्वीनि शृङ्गाणि किरणा यस्य स सूर्यः (वृषभः) वृष्टिकरः (न) इव (भीमः) भयङ्करः (एकः) अद्वितीयः (कृष्टीः) मनुष्यप्रजाः (च्यावयति) चालयति (प्र) प्रकर्षेण (विश्वाः) सर्वाः (यः) (शश्वतः) निरन्तरस्य, सदा वर्तमानस्य (अदाशुषः) अदातुः पुरुषस्य (गयस्य) गृहस्य (प्रयन्ता) नियमयिता। प्रदाता (असि) अस्ति (सुष्वितराय) अ०२०।३।१। अधिकैश्वर्यवते व्यवहाराय (वेदः) धनम्-निघ०२।१०॥

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