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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 44 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 44/ मन्त्र 3
    ऋषिः - इरिम्बिठिः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-४४
    59

    तं सु॑ष्टु॒त्या वि॑वासे ज्येष्ठ॒राजं॒ भरे॑ कृ॒त्नुम्। म॒हो वा॒जिनं॑ स॒निभ्यः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तम् । सु॒ऽस्तु॒त्या । आ । वि॒वा॒से॒ । ज्ये॒ष्ठ॒ऽराज॑म् । भरे॑ । कृ॒त्नुम् ॥ म॒ह: । वा॒जिन॑म् । स॒न‍िऽभ्य॑: ॥४४.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तं सुष्टुत्या विवासे ज्येष्ठराजं भरे कृत्नुम्। महो वाजिनं सनिभ्यः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तम् । सुऽस्तुत्या । आ । विवासे । ज्येष्ठऽराजम् । भरे । कृत्नुम् ॥ मह: । वाजिनम् । सन‍िऽभ्य: ॥४४.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 44; मन्त्र » 3
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    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (तम्) उस (ज्येष्ठराजम्) सबसे बड़े राजा, (भरे) सङ्ग्राम में (कृत्नुम्) काम करनेवाले, (वाजिनम्) महाबलवान् [पुरुष] की, (महः) महत्त्व के (सनिभ्यः) दानों के लिये, (सुष्टुत्या) सुन्दर स्तुति के साथ (आ) सब प्रकार (विवासे) मैं सेवा करता हूँ ॥३॥

    भावार्थ

    जैसे नदियाँ समुद्र में जाकर विश्राम पाती हैं, वैसे ही विद्वान् लोग पराक्रमी राजा के पास पहुँचकर अपना गुण प्रकाशित करके सुख पावें ॥२, ३॥

    टिप्पणी

    ३−(तम्) (सुष्टुत्या) शोभनया स्तुत्या (आ) समन्तात् (विवासे) विवासतिः परिचरणकर्मा-निघ० ३।। परिचरामि (ज्येष्ठराजम्) प्रशस्यतमं राजानम् (भरे) सङ्ग्रामे (कृत्नुम्) कृहनिभ्यां क्त्नुः। उ० ३।३०। करोतेः-क्त्नु। कार्यकर्तारम् (महः) मह पूजायाम्-क्विप्। महत्त्वस्य (वाजिनम्) महाबलिनम् (सनिभ्यः) दानेभ्यः ॥

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    विषय

    ज्येष्ठराट-भरे कृत्नु

    पदार्थ

    १. (तम्) = उस (ज्येष्ठराजम्) = सबसे महान् सम्राट्, (भरे कृत्नुम्) = संग्राम में कुशल प्रभु को (सुष्टुत्या) = उत्तम स्तुति से (आविवासे) = पूजित करता हूँ। २. उस प्रभु का मैं पूजन करता हूँ जो (सनिभ्यः) = संभजन करनेवालों के लिए (महः वाजिनम्) = महनीय शक्ति देनेवाले हैं। अपने उपासक को प्रभु महान् शक्ति प्रदान करते हैं।

    भावार्थ

    प्रभु सबसे बड़े समुद्र हैं, युद्धों में प्रभु ही विजय प्राप्त कराते हैं। उपासकों के लिए शक्ति देनेवाले हैं। प्रभु से शक्ति प्राप्त करके यह स्तोता वास्तविक सुख का निर्माण करनेवाला होता है 'शुन:शेप' बनता है। यह देवों में दान देनेवाला 'देवरात' भी कहलाता है। यह प्रभु-स्तवन करता हुआ कहता है -

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    भाषार्थ

    (तम्) उस (ज्येष्ठराजम्) महाराजाधिराज, (भरे) देवासुर-संग्राम में (कृत्नुम्) सहायकर्त्ता, (महः) पूजनीय तथा ज्योतिर्मय, (वाजिनम्) बलशाली परमेश्वर की (सुष्टुती) उत्कृष्ट स्तुतियों द्वारा (आ विवासे) मैं परिचर्या करता हूँ, (सनिभ्यः) ज्ञानदाता गुरुओं से अध्यात्मशिक्षा पाकर॥ ३॥

    टिप्पणी

    [सनिभ्यः=षणु दाने।]

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    विषय

    सम्राट्।

    भावार्थ

    (तं) उस (ज्येष्ठराजम्) सबसे बड़े महाराज (भरे कृत्नुम्) संग्राम में शत्रुधों के नाशकारी (महः वाजिनम्) बड़े भारी वलवान्, ऐश्वर्यवान् पुरुष को (सनिभ्यः) बढ़े दोनों के लिये (सुस्तुत्या) उत्तम स्तुति द्वारा (अ विवासे) उसकी सेवा करता हूं। उसका गुण गान करता हूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    इरिम्बिठिः काण्व ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Him with songs of adoration I glorify as the first and highest ruler, constantly active in cosmic dynamics, and the greatest warrior and winner for the celebrant’s good.

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    Translation

    l, for His great gifts serve with invocation the Almighty God who is the supreme ruler who is successful in the preservation of world and is powerful.

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    Translation

    I, for His great gifts serve with invocation the Almighty God who is the supreme ruler who is successful in the preservation of world and is powerful.

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    Translation

    I praise him, the greatest king, the destroyer of the foes in the war, the most powerful person, for his munificence with good praises.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(तम्) (सुष्टुत्या) शोभनया स्तुत्या (आ) समन्तात् (विवासे) विवासतिः परिचरणकर्मा-निघ० ३।। परिचरामि (ज्येष्ठराजम्) प्रशस्यतमं राजानम् (भरे) सङ्ग्रामे (कृत्नुम्) कृहनिभ्यां क्त्नुः। उ० ३।३०। करोतेः-क्त्नु। कार्यकर्तारम् (महः) मह पूजायाम्-क्विप्। महत्त्वस्य (वाजिनम्) महाबलिनम् (सनिभ्यः) दानेभ्यः ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজপ্রজাকৃত্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (তম্) সেই (জ্যেষ্ঠরাজম্) জ্যেষ্ঠ রাজা, (ভরে) সংগ্রামে (কৃত্নুম্) কার্যকারী, (বাজিনম্) মহাবলবান [পুরুষের], (মহঃ) মহত্ত্বের (সনিভ্যঃ) দানের জন্য, (সুষ্টুত্যা) সুন্দর স্তুতিপূর্বক (আ) সকল প্রকারে (বিবাসে) আমি সেবা করি ॥৩॥

    भावार्थ

    যেমন নদী সমুদ্রে গিয়ে বিশ্রাম পায়, তেমনই বিদ্বানগণ পরাক্রমী রাজার নিকট পৌঁছে নিজের গুণ প্রকাশিত করে সুখী হবে/হোক ॥২, ৩॥

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    भाषार्थ

    (তম্) সেই (জ্যেষ্ঠরাজম্) মহারাজাধিরাজ, (ভরে) দেবাসুর-সংগ্রামে (কৃত্নুম্) সহায়কর্ত্তা, (মহঃ) পূজনীয় তথা জ্যোতির্ময়, (বাজিনম্) বলশালী পরমেশ্বরের (সুষ্টুতী) উৎকৃষ্ট স্তুতি দ্বারা (আ বিবাসে) আমি পরিচর্যা করি, (সনিভ্যঃ) জ্ঞানদাতা গুরুদের থেকে আধ্যাত্মশিক্ষা প্রাপ্ত করে॥ ৩॥

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