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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 54 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 54/ मन्त्र 1
    ऋषिः - रेभः देवता - इन्द्रः छन्दः - अतिजगती सूक्तम् - सूक्त-५४
    88

    विश्वाः॒ पृत॑ना अभि॒भूत॑रं॒ नरं॑ स॒जूस्त॑तक्षु॒रिन्द्रं॑ जज॒नुश्च॑ रा॒जसे॑। क्रत्वा॒ वरि॑ष्ठं॒ वर॑ आ॒मुरि॑मु॒तोग्रमोजि॑ष्ठं त॒वसं॑ तर॒स्विन॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    विश्वा॑: । पृत॑ना: । अ॒भि॒ऽभूत॑रम् । नर॑म् । स॒ऽजू: । त॒त॒क्षु॒: । इन्द्र॑म् । ज॒ज॒नु: । च॒ । रा॒जसे॑ ॥ क्रत्वा॑ । वरि॑ष्ठम् । वरे॑ । आ॒ऽमुरि॑म् । उ॒त । उ॒ग्रम् । ओजि॑ष्ठम् । त॒वस॑म् । त॒र॒स्विन॑म् ॥५४.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरं सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे। क्रत्वा वरिष्ठं वर आमुरिमुतोग्रमोजिष्ठं तवसं तरस्विनम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विश्वा: । पृतना: । अभिऽभूतरम् । नरम् । सऽजू: । ततक्षु: । इन्द्रम् । जजनु: । च । राजसे ॥ क्रत्वा । वरिष्ठम् । वरे । आऽमुरिम् । उत । उग्रम् । ओजिष्ठम् । तवसम् । तरस्विनम् ॥५४.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 54; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (विश्वाः) सब (पृतनाः) सङ्ग्रामों के (अभिभूतरम्) अत्यन्त मिटानेवाले, (क्रत्वा) अपनी बुद्धि से (वरे) श्रेष्ठ व्यवहार में (वरिष्ठम्) अतिश्रेष्ठ, (आमुरिम्) शत्रुओं के घेर लेने [वा मार डालनेवाले], (उग्रम्) प्रचण्ड (ओजिष्ठम्) अत्यन्त पराक्रमी, (तवसम्) महाबली (उत) और (तरस्विनम्) बड़े उत्साही (नरम्) नर को (राजसे) राज्य के लिये (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला राजा] को (सजूः) मिलकर (ततक्षुः) उन्होंने [प्रजाजनों ने] बनाया (च) और (जजनुः) प्रसिद्ध किया है ॥१॥

    भावार्थ

    प्रजागणों को उचित है कि जो मनुष्य सबमें श्रेष्ठ गुणी प्रतापी होवे, उसीको सब मिलकर रक्षा के लिये राजा बनावें ॥१॥

    टिप्पणी

    यह तृच ऋग्वेद में है-८।९७ [सायणभाष्य ८६]।१०-१२। कुछ भेद से सामवेद-उ० ३।१। तृच १४। तथा म० १-पू० ४।९।१ ॥ १−(विश्वाः) सर्वाः (पृतनाः) सङ्ग्रामान् (अभिभूतरम्) अभिभवतेः-क्विप्, तरप्। अत्यर्थम् अभिभवितारं नाशयितारम् (नरम्) नेतारम् (सजूः) संगत्य (ततक्षुः) तक्षतिः करोतिकर्मा-निरु० ४।१९। कृतवन्तः (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं राजानम् (जजनुः) जनी प्रादुर्भावे-लिट्। प्रादुष्कृतवन्तः (च) (राजसे) राजृ दीप्तौ ऐश्वर्ये च-असुन्। राज्याय (क्रत्वा) क्रतुना। प्रज्ञया-निघ० ३।९। (वरिष्ठम्) श्रेष्ठतमम् (वरे) श्रेष्ठव्यवहारे (आमुरिम्) भुजेः किच्च। उ० ४।१४२। आ+मुर संवेष्टने यद्वा मॄ हिंसायाम्-इप्रत्ययः, कित्। उदोष्ठ्यपूर्वस्य”। पा० ७।१।१०२। इत्युत्वम्। आभिमुख्येन वेष्टयितारं मारयितारं वा शत्रूणाम् (उत) अपि च (उग्रम्) प्रचण्डम् (ओजिष्ठम्) ओजस्वितमम् (तवसम्) अर्शआद्यच्। बलवन्तम् (तरस्विनम्) वेगवन्तम्। परमोत्साहिनम् ॥

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    विषय

    इन्द्र तताः जजनुः च राजसे

    पदार्थ

    १. (विश्वाः पृतना:) = सब शत्रु-सैन्यों को (अभिभूतरम्) = अतिशयेन अभिभूत करनेवाले, (नरम्) = और इसप्रकार उन्नति-पथ पर ले-चलनेवाले (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली प्रभु को (सजू:) = मिलकर प्रीतिपूर्वक उपासना के द्वारा [जुषी प्रीतिसेवनयोः] (तताक्षु:) = [form in the mind] मन में निर्मित करते हैं (च) -= और (जजनुः) = उसे प्रादुर्भूत करते हैं। ध्यान द्वारा प्रभु की कल्पना करते हैं और उसका विकास करते हैं-प्रभु का अधिकाधिक साक्षात्कार करने के लिए यत्नशील होते हैं। जितना-जितना साक्षात्कार कर पाते हैं उतना-उतना ही (राजसे) = दीपन के लिए होते हैं उनका जीवन उतना ही अधिक दौस हो उठता है। २. उस प्रभु का ध्यान करते हैं जो (क्रत्वा) = शक्ति व प्रज्ञान से (वरिष्ठम) = अत्यन्त विशाल हैं। (वरे) = श्रेष्ठ कार्यों के निमित्त (आमुरिम्) = समन्तात् शत्रुओं का संहार करनेवाले हैं, (उत) = और (उग्रम्) = अत्यन्त तेजस्वी हैं। (ओजिष्ठम्) = ओजस्वी है, (तवसम्) = बलवान् हैं और (तरस्विनम्) = अतिशयेन वेगवान् हैं।

    भावार्थ

    हम मिलकर घरों में प्रभु की उपासना करते हुए हृदयों में प्रभु को प्रादुर्भूत करें। इसप्रकार हमारा जीवन दीस व शक्तिशाली बनेगा। शत्रु-संहार करते हुए हम उन्नति-पथ पर आगे बढ़ेंगे।

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    भाषार्थ

    (विश्वाः पृतनाः) काम-क्रोध आदि की सब सेनाओं का (अभिभूतरम्) पराभव करनेवाले, (नरम्) जगन्नेता, (सजूः) अपने साथी, (क्रत्वा) सत्कर्मों और प्रज्ञाओं की दृष्टि से (वरिष्ठम्) सर्वश्रेष्ठ, (वरे) उपासक को वर लेने पर (आमुरिम्) उसकी अविद्या का पूर्णतया विनाश करनेवाले, (उत) और (उग्रम्) अविद्या के विनाश करने में उग्ररूप, (ओजिष्ठम्) अत्यन्त ओजस्वी, (तरस्विनम्) बलवान् तथा (तवसम्) बलस्वरूप (इन्द्रम्) परमेश्वर को—प्रथम तो उपासक (ततक्षुः) आभासिक प्रतीति के रूप में, (च) और तदनन्तर (जजनुः) प्रत्यक्ष प्रतीति के रूप में प्रकट कर लेते हैं, (राजसे) ताकि परमेश्वर उन पर राज्य करे, और उनके हृदयों में सदा विराजमान रहे।

    टिप्पणी

    [क्रतु=कर्म (निघं০ २.१)। प्रज्ञा (निघं০ ३.९)। तरस्=बल (निघं০ २.९)। आमुरिम्=मॄ हिंसायाम्।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    All the citizens together, in order to elect an equal for the purpose of governance, create and shape Indra, the ruler, the leader who is superior to others in all battles of life, highest by noble creative action, eliminator of negative and frustrative opposition, illustrious, most vigorous and emphatic in expression, courageous and passionate in action.

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    Translation

    The people of the nation, united together for the sake or assuming the helm of affairs of administration make and declare as ruler the man who over-powers all the foeman, who is most compitent in dealing with the affair with his wisdom, who is able to kill the enemies, who is vigorous, powerful, strongest and quick (in decision).

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    Translation

    The people of the nation, united together for the sake or assuming the helm of affairs of administration make and declare as ruler the man who over-powers all the foeman, who is most competent in dealing with the affair with his wisdom, who is able to kill the enemies, who is vigorous, powerful, strongest and quick (in decision).

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    Translation

    With one accord, the people made and proclaimed for ruling over them the mighty king, the person, who can vanquish the enemies in the wars, is most eminent in actions and intelligence, the destroyer of the foes, fierce, most valorous, stalwart and very quick in action.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह तृच ऋग्वेद में है-८।९७ [सायणभाष्य ८६]।१०-१२। कुछ भेद से सामवेद-उ० ३।१। तृच १४। तथा म० १-पू० ४।९।१ ॥ १−(विश्वाः) सर्वाः (पृतनाः) सङ्ग्रामान् (अभिभूतरम्) अभिभवतेः-क्विप्, तरप्। अत्यर्थम् अभिभवितारं नाशयितारम् (नरम्) नेतारम् (सजूः) संगत्य (ततक्षुः) तक्षतिः करोतिकर्मा-निरु० ४।१९। कृतवन्तः (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं राजानम् (जजनुः) जनी प्रादुर्भावे-लिट्। प्रादुष्कृतवन्तः (च) (राजसे) राजृ दीप्तौ ऐश्वर्ये च-असुन्। राज्याय (क्रत्वा) क्रतुना। प्रज्ञया-निघ० ३।९। (वरिष्ठम्) श्रेष्ठतमम् (वरे) श्रेष्ठव्यवहारे (आमुरिम्) भुजेः किच्च। उ० ४।१४२। आ+मुर संवेष्टने यद्वा मॄ हिंसायाम्-इप्रत्ययः, कित्। उदोष्ठ्यपूर्वस्य”। पा० ७।१।१०२। इत्युत्वम्। आभिमुख्येन वेष्टयितारं मारयितारं वा शत्रूणाम् (उत) अपि च (उग्रम्) प्रचण्डम् (ओजिष्ठम्) ओजस्वितमम् (तवसम्) अर्शआद्यच्। बलवन्तम् (तरस्विनम्) वेगवन्तम्। परमोत्साहिनम् ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজপ্রজাধর্মোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (বিশ্বাঃ) সকল (পৃতনাঃ) সংগ্রাম (অভিভূতরম্) অতিশয় নিবারণকারী/বিনাশকারী, (ক্রত্বা) স্বীয় বুদ্ধি দ্বারা (বরে) শ্রেষ্ঠ ব্যবহারে (বরিষ্ঠম্) শ্রেষ্ঠতম, (আমুরিম্) শত্রুদের চতুর্দিকে পরিবেষ্টনকারী [বা শত্রু ঘাতক], (উগ্রম্) প্রচণ্ড (ওজিষ্ঠম্) অত্যন্ত পরাক্রমী, (তবসম্) মহাবলী (উত) এবং (তরস্বিনম্) অতি উৎসাহী (নরম্) নরকে (রাজসে) রাজ্যের জন্য (ইন্দ্রম্) ইন্দ্র [পরম ঐশ্বর্যবান্ রাজা] কে (সজূঃ) সকলে মিলে (ততক্ষুঃ) তাঁরা [প্রজাগণ] নির্বাচন করেছে (চ) এবং (জজনুঃ) প্রসিদ্ধ করেছে॥১॥

    भावार्थ

    প্রজাদের উচিত, মনুষ্যগণের মধ্যে যিনি শ্রেষ্ঠতম, গুণবান্ এবং তেজস্বী, রাজ্যের হিতের নিমিত্তে তাঁকে রাজা নির্বাচিত করা ॥১॥ এই তৃচ ঋগ্বেদে আছে-৮।৯৭ [সায়ণভাষ্য ৮৬]।১০-১২। কিছু ভেদপূর্বক সামবেদ-উ০ ৩।১। তৃচ ১৪। তথা ম০ ১-পূ০ ৪।৯।১ ॥

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    भाषार्थ

    (বিশ্বাঃ পৃতনাঃ) কাম-ক্রোধাদির সব সেনাদের (অভিভূতরম্) পরাভবকারী, (নরম্) জগন্নেতা, (সজূঃ) নিজের সাথী, (ক্রত্বা) সৎকর্ম-সমূহ এবং প্রজ্ঞা-সমূহের দৃষ্টিতে (বরিষ্ঠম্) সর্বশ্রেষ্ঠ, (বরে) উপাসককে বরণ করলে (আমুরিম্) তাঁর অবিদ্যার পূর্ণরূপে বিনাশক, (উত) এবং (উগ্রম্) অবিদ্যার বিনাশে উগ্ররূপ, (ওজিষ্ঠম্) অত্যন্ত ওজস্বী, (তরস্বিনম্) বলবান্ তথা (তবসম্) বলস্বরূপ (ইন্দ্রম্) পরমেশ্বরকে—প্রথম তো উপাসক (ততক্ষুঃ) আভাসিক প্রতীতির রূপে, (চ) এবং তদনন্তর (জজনুঃ) প্রত্যক্ষ প্রতীতি রূপে প্রকট করে, (রাজসে) যাতে পরমেশ্বর তাঁর ওপর রাজ্য করে, এবং তাঁর হৃদয়ে সদা বিরাজমান থাকে।

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