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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 63 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 63/ मन्त्र 4
    ऋषिः - गोतमः देवता - इन्द्रः छन्दः - उष्णिक् सूक्तम् - सूक्त-६३
    54

    य एक॒ इद्वि॒दय॑ते॒ वसु॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑। ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुत॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । एक॑: । इत् । वि॒ऽदय॑ते । वसु॑ । मर्ता॑य । दा॒शुषे॑ ॥ ईशा॑न: । अप्र॑तिऽस्कुत: । इन्द्र॑: । अ॒ङ्ग ॥६३.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    य एक इद्विदयते वसु मर्ताय दाशुषे। ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । एक: । इत् । विऽदयते । वसु । मर्ताय । दाशुषे ॥ ईशान: । अप्रतिऽस्कुत: । इन्द्र: । अङ्ग ॥६३.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 63; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    १-६ राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जो (एकः) अकेला (इत्) ही (दाशुषे) दाता (मर्ताय) मनुष्य के लिये (वसु) धन (विदयते) बहुत प्रकार देता है, (अङ्ग) हे मित्र ! वह (ईशानः) समर्थ, (अप्रतिष्कुतः) बे-रोक गतिवाला (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला सभापति] होता है ॥४॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य सबमें बड़ा उत्साही निर्भय शूर पुरुष हो, वही सभापति राजा होवे ॥४॥

    टिप्पणी

    मन्त्र ४-६ ऋग्वेद में है-१।८४।७-९; सामवेद-उ० ।२। तृच २२, मन्त्र ७ साम०-पू० ४।१०।९ ॥ ४−(यः) पुरुषः (एकः) अद्वितीयः (इत्) एव (विदयते) विविधं ददाति (धनम् (मर्ताय) मनुष्याय (दाशुषे) दात्रे (ईशानः) समर्थः (अप्रतिष्कुतः) अ० २०।४१।१। अप्रतिगतः (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् सभापतिः (अङ्ग) हे मित्र ॥

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    पदार्थ

    शब्दार्थ =  ( यः एकः इत् ) = जो अकेला ही परमेश्वर  ( दाशुषे ) = दाता  ( मर्ताय ) = मनुष्य के लिए  ( वसु ) = धन  ( विदयते ) = बहुत प्रकार से देता है ।  ( अङ्ग ) = हे मित्र ! वह  ( ईशान: ) = समर्थ  ( अप्रतिष्कुतः ) = बे रोक गतिवाला  ( इन्द्रः ) = सबसे बढ़ कर ऐश्वर्यवाला है।

    भावार्थ

    भावार्थ = सारी विभूति के स्वामी इन्द्र परमेश्वर दानशील धर्मात्मा पुरुष को बहुत प्रकार का धन देते हैं । वह अन्तर्यामी प्रभु उस दाता पुरुष को जानते हैं कि यह पुरुष दान द्वारा अनेकों लाभ पहुँचायेगा, इसलिए इसको बहुत ही धन देना ठीक है। प्यारे मित्रो ! ऐसे समर्थ प्रभु उपासना करने से हमारा दारिद्र्य दूर होकर इस लोक में तथा परलोक में हम सुखी हो सकते हैं।

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    विषय

    'ईशान-अप्रतिष्कुत' इन्द्र

    पदार्थ

    १. हे (अङ्ग) = प्रिय! (यः) = जो (एकः इत्) = बिना किसी अन्य की सहायता के अकेला ही (दाशुषे मार्ताय) = दाश्वान् [दानशील] पुरुष के लिए (वसु विदयते) = निवास को उत्तम बनाने के लिए साधनभूत वसुओं को प्राप्त कराता है, वही (ईशाना:) = सबका स्वामी है। २. हे प्रिय ! यह (अप्रतिष्कत:) = किसी से कभी युद्ध के लिए न ललकारा गया (इन्द्रः) = सर्वशक्तिमान् प्रभु हैं।

    भावार्थ

    वे प्रभु ही 'ईशान व अप्रतिष्कुत' हैं। दाश्वान् पुरुष के लिए वसुओं को प्राप्त कराते हैं।

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    भाषार्थ

    (यः) जो (एक इद्) एक ही, (दाशुषे मर्ताय) आत्मसमर्पक उपासक के लिए, (वसु) आध्यात्मिक सम्पत्तियाँ (विदयते) विशेषरूप में दान करता है—(अङ्ग) हे प्रिय उपासक! (ईशानः) वह (इन्द्रः) सर्वाधीश परमेश्वर है। (अप्रतिष्कुतः) वह इस सम्बन्ध में, किसी भी विरोधी शक्ति द्वारा झुकाया नहीं जा सकता।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Dear friend, the one sole lord who gives everything in life to the man of charity and generosity is Indra, supreme ruler of the world, who is constant, unmoved and unchallenged.

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    Translation

    He one and only one who gives wealth to munificent man. O man, this Almighty God is the ruler of the power resistless.

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    Translation

    He one and only one who gives wealth to munificent man. O man, this Almighty God is the ruler of the power resistless.

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    Translation

    O learned person, He alone is the Mighty Lord, All-ruling and Invincible , Who gives the riches and wealth to the liberal-minded person.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    मन्त्र ४-६ ऋग्वेद में है-१।८४।७-९; सामवेद-उ० ।२। तृच २२, मन्त्र ७ साम०-पू० ४।१०।९ ॥ ४−(यः) पुरुषः (एकः) अद्वितीयः (इत्) एव (विदयते) विविधं ददाति (धनम् (मर्ताय) मनुष्याय (दाशुषे) दात्रे (ईशानः) समर्थः (अप्रतिष्कुतः) अ० २०।४१।१। अप्रतिगतः (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् सभापतिः (अङ्ग) हे मित्र ॥

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    बंगाली (1)

    পদার্থ

    য় এক ইদ্বিদয়তে বসু মর্তায় দাশুষে।

    ঈশানো অপ্রতিষ্কুত ইন্দ্রো অঙ্গ ।।৬৬।।

    (অথর্ব ২০।৬৩।৪)

    পদার্থঃ (য়ঃ একঃ ইৎ) যিনি একাই (দাশুষে) দানশীল (মর্তায়) মানুষদের (বসু) বসবাসের নিমিত্তে  (অঙ্গ) প্রয়োজনীয় দ্রব্য (বিদয়তে) প্রদান করেন, তিনি (ঈশানঃ) সকলের ঈশ্বর, (অপ্রতিষ্কুতঃ) অপ্রতিহত (ইন্দ্রঃ) ঐশ্বর্যশালী পরমাত্মা।

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ সমস্ত ঐশ্বর্যের অধিপতি পরমাত্মা দানশীল ধর্মাত্মা ব্যক্তিকেও প্রভূত সামগ্রী প্রদান করে থাকেন। আমাদের সেই পরমাত্মার উপাসনার সাথে সাথে দানশীল হওয়াও উচিত ।।৬৬।।

     

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