अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 65/ मन्त्र 3
यस्यामि॑तानि वी॒र्या॒ न राधः॒ पर्ये॑तवे। ज्योति॒र्न विश्व॑म॒भ्यस्ति॒ दक्षि॑णा ॥
स्वर सहित पद पाठयस्य॑ । अमि॑तानि । वी॒र्या । न । राध॑: । परि॑ऽएतवे ॥ ज्योति॑: । न । विश्व॑म् । अ॒भि । अस्ति॑ । दक्षि॑णा ॥६५.३॥
स्वर रहित मन्त्र
यस्यामितानि वीर्या न राधः पर्येतवे। ज्योतिर्न विश्वमभ्यस्ति दक्षिणा ॥
स्वर रहित पद पाठयस्य । अमितानि । वीर्या । न । राध: । परिऽएतवे ॥ ज्योति: । न । विश्वम् । अभि । अस्ति । दक्षिणा ॥६५.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(यस्य) जिस [परमात्मा] के (वीर्या) वीर कर्म (अमितानि) बे-नाप हैं, [जिसका] (राधः) धन (पर्येतवे) पार पाने योग्य (न) नहीं है, और [जिसकी] (दक्षिणा) दक्षिणा [दानशक्ति], (ज्योतिः न) प्रकाश के समान (विश्वम् अभि) सब पर फैलकर (अस्ति) वर्तमान है ॥३॥
भावार्थ
हे मनुष्यो ! तुम परमेश्वर की स्तुति नम्रतापूर्वक करके अपना सामर्थ्य बढ़ाओ, वह जगदीश्वर अनन्त बली, अनन्त धनी और अनन्त दानी है ॥२, ३॥
टिप्पणी
३−(यस्य) इन्द्रस्य। परमेश्वरस्य (अमितानि) परिमाणरहितानि (वीर्या) वीरकर्माणि (न) निषेधे (राधः) धनम् (पर्येतवे) इण् गतौ-तवेन्। परिगन्तुं प्राप्तुं शक्यम् (ज्योतिः) तेजः (न) यथा (विश्वम्) सर्वं जगत् (अभि) अभीत्य। व्याप्य (अस्ति) वर्तते (दक्षिणा) दानशक्तिः ॥
विषय
अनन्त वीर्य-ऐश्वर्य-ज्ञान व दान'-वाले प्रभु
पदार्थ
१. (यस्य) = जिस प्रभु के (वीर्या) = वृत्रवध आदि पराक्रम के कार्य (अमितानि) = अगणित व अपरिमित हैं, उस प्रभु का (राधः) = ऐश्वर्य (पर्येतवे न) = चारों ओर से घेरे जाने योग्य नहीं है। उस प्रभु का पराक्रम व ऐश्वर्य अनन्त ही है। २. (ज्योतिः न) = प्रकाश की भाँति (दक्षिणा) = उस प्रभु का दान भी (विश्वम्) = सम्पूर्ण संसार को (अभ्यस्ति) = अभिभूत करनेवाला है। उस प्रभु का ज्ञान व दान निरतिशय है-सर्वतिशायी है-सबसे अधिक है।
भावार्थ
प्रभु का पराक्रम व ऐश्वर्य अनन्त है। वे प्रभु अपनी ज्योति व दक्षिणा से सभी को अभिभूत करनेवाले हैं। अगले सूक्त के ऋषि भी 'विश्वमनाः' ही हैं -
भाषार्थ
(यस्य) जिस परमेश्वर की (वीर्या) शक्तियाँ (अमितानि) अपरिमित हैं, और जिसका (राधः) ऐश्वर्य (पर्येतवे न) कभी क्षीण नहीं होता, और (न) जैसे, जिसकी (ज्योतिः) ज्योति, (विश्वम्) सब ज्योतियों पर (अभि अस्ति) विजय पाये हुई है, वैसे जिसका (दक्षिणा) दान, सब दानों पर विजय पाये हुए है—उसके प्रति मधुर गान गाया करो (पूर्व मन्त्र २)।
टिप्पणी
[वीर्या=वीर्याणि। अभि अस्ति=अभ्यस्ति, अभिभवति, परा भवति।]
विषय
परमेश्वर और राजा।
भावार्थ
हे मित्रो ! (यस्य) जिसके (वीर्या) वीर्य, पराक्रम और बल के व्यापार भी (अमितानि) अज्ञेय एवं असंख्य, मापे नहीं जा सकते और (राधः) जिसका ऐश्वर्य भी (परिएतवे न) पार नहीं किया जा सकता और जिसकी (दक्षिणा) दानशीलता भी (ज्योतिः न) सूर्य के प्रकाश के समान (विश्वम् अभि अस्ति) समस्त विश्व से भी ऊपर, सबसे बढ़कर है, तुम उसकी स्तुति मधुर और स्नेहमय वचनों से करो। राजा के पक्ष में—जिसको अनन्त पराक्रम, अपार धन और सर्वोपरि दानशीलता है उसकी स्तुति करो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
विश्वमनाः वैयश्व ऋषिः। इन्द्रो देवता। उष्णिहः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
Let us sing in adoration of Indra whose wondrous deeds of divinity are unbounded, whose potential is unrestricted, and whose generosity radiates over the world is light of the sun.
Translation
(Almighty is He) whose powers are immeasurable, where bounty never may be surpassed whose generosity like light is over all.
Translation
(Almighty is He) whose powers are immeasurable, where bounty never may be surpassed whose generosity like light is over all.
Translation
(Sing His praises, as shown above), Whose acts of prowess and valour are limitless. Whose wealth cannot be surpassed. Whose Generosity overwhelms all in the universe like light.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(यस्य) इन्द्रस्य। परमेश्वरस्य (अमितानि) परिमाणरहितानि (वीर्या) वीरकर्माणि (न) निषेधे (राधः) धनम् (पर्येतवे) इण् गतौ-तवेन्। परिगन्तुं प्राप्तुं शक्यम् (ज्योतिः) तेजः (न) यथा (विश्वम्) सर्वं जगत् (अभि) अभीत्य। व्याप्य (अस्ति) वर्तते (दक्षिणा) दानशक्तिः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
পরমেশ্বরগুণোপদেশঃ
भाषार्थ
(যস্য) যাঁর [পরমাত্মার] (বীর্যা) বীর কর্ম (অমিতানি) অপরিমিত/পরিমাণরহিত, [যাঁর] (রাধঃ) ধন (পর্যেতবে) অতিক্রমণ যোগ্য (ন) নয়, এবং [যাঁর] (দক্ষিণা) দক্ষিণা [দানশক্তি], (জ্যোতিঃ ন) প্রকাশ/তেজের সমান (বিশ্বম্ অভি) সর্ব জগতে (অস্তি) বর্তমান॥৩॥
भावार्थ
হে মনুষ্যগণ ! তোমরা পরমেশ্বরের স্তুতি নম্রতাপূর্বক করে নিজ সামর্থ্য বৃদ্ধি করো, জগদীশ্বর অনন্ত বলবান্, অনন্ত ঐশ্বর্যবান্ এবং অনন্ত দাতা ॥২, ৩॥
भाषार्थ
(যস্য) যে পরমেশ্বরের (বীর্যা) শক্তি (অমিতানি) অপরিমিত, এবং যার (রাধঃ) ঐশ্বর্য (পর্যেতবে ন) অক্ষীণ, এবং (ন) যেমন, যার (জ্যোতিঃ) জ্যোতি, (বিশ্বম্) সব জ্যোতির ওপর (অভি অস্তি) বিজয় প্রাপ্ত, তেমনই যার (দক্ষিণা) দান, সব দানের ওপর বিজয় প্রাপ্ত—উনার প্রতি মধুর গান করো (পূর্ব মন্ত্র ২)।
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