Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 73 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 73/ मन्त्र 1
    ऋषिः - वसिष्ठः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिपदा विराडनुष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-७३
    72

    तुभ्येदि॒मा सव॑ना शूर॒ विश्वा॒ तुभ्यं॒ ब्रह्मा॑णि॒ वर्ध॑ना कृणोमि। त्वं नृभि॒र्हव्यो॑ वि॒श्वधा॑सि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तुभ्य॑ । इत् । इ॒मा । सव॑ना । शू॒र॒ । विश्वा॑ । तुभ्य॑म् । ब्रह्मा॑णि । वर्ध॑ना । कृ॒णो॒मि॒ । त्वम् । नृऽभि॑: । हव्य॑: । वि॒श्वधा॑ । अ॒सि॒ ॥७३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तुभ्येदिमा सवना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि। त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधासि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तुभ्य । इत् । इमा । सवना । शूर । विश्वा । तुभ्यम् । ब्रह्माणि । वर्धना । कृणोमि । त्वम् । नृऽभि: । हव्य: । विश्वधा । असि ॥७३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 73; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (2)

    विषय

    सेनापति के लक्षण का उपदेश।

    पदार्थ

    (शूर) हे शूर ! [निर्भय मनुष्य] (तुभ्य) तेरे लिये (इत्) ही (इमा) इन (विश्वा) सब (सवना) ऐश्वर्ययुक्त वस्तुओं को और (तुभ्यम्) तेरे लिये (वर्धना) उन्नति करनेवाले (ब्रह्माणि) धनों वा अन्नों को (कृणोमि) मैं करता हूँ। (त्वम्) तू (नृभिः) नेता मनुष्यों से (विश्वधा) सब प्रकार (हव्यः) ग्रहण करने योग्य (असि) है ॥१॥

    भावार्थ

    चतुर सेनापति सब अधिकारियों की यथायोग्य पालना करता रहे, जिससे वे लोग सेवा करने में सदा प्रसन्न रहें ॥१॥

    टिप्पणी

    मन्त्र १, २ ऋग्वेद में है-७।२२।७, ८ ॥ १−(तुभ्य) तुभ्यम् (इत्) एव (इमा) इमानि (सवना) ऐश्वर्ययुक्तानि वस्तूनि (शूर) निर्भय मनुष्य (विश्वा) सर्वाणि (तुभ्यम्) (ब्रह्माणि) धनानि अन्नानि वा (वर्धना) उन्नतिकराणि (कृणोमि) करोमि (त्वम्) (नृभिः) नेतृभि पुरुषैः (हव्यः) ग्रहणीयः (विश्वधा) सर्वप्रकारेण (असि) ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    सवना बह्माणि

    पदार्थ

    १.हे (शूर) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले प्रभो! (इमा) = ये (विश्वा) = सब (सवना) = यज्ञ (तुभ्य इत्) = आपके लिए ही हैं-आपकी प्राप्ति के लिए ही ये यज्ञ किये जाते हैं। (तुभ्यम्) = आपकी ही (वर्धना) = महिमा का वर्धन करनेवाले इन (ब्रह्माणि) = ज्ञानपूर्वक उच्चरित स्तोत्रों को (कृणोमि) = करता हूँ। आपकी महिमा का स्तवन करता हुआ मैं आपके प्रकाश को अपने में बढ़ा पाता हूँ। २. हे प्रभो! (त्वम्) = आप (नृभिः) = उन्नति-पथ पर चलनेवाले मनुष्यों से (विश्वधा) = सब प्रकार से (हव्यः असि) = पुकारने योग्य हैं। आपका आराधन करता हुआ ही मनुष्य वासनाओं से बचकर उन्नति पथ पर आगे बढ़ता है।

    भावार्थ

    हम यज्ञों-स्तोत्रों व आराधनों को करते हुए आगे बढ़ते चलें और प्रभु को प्राप्त करें।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Subject

    In dr a Devata

    Meaning

    O lord of honour and excellence, wise and brave, all these yajnic acts of service and adoration are for you. All these acts of holy creation and development for progress I do, are for your honour and majesty. You are the ruler and sustainer of the world, accepted and adorable for the leading people of the world.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    O bold one, all these Yajnas and their offerings are meant for you only. I offer the prayers strengthening your glory (in devotees) for you. You are invocable by people and are the supporter of the world.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    मन्त्र १, २ ऋग्वेद में है-७।२२।७, ८ ॥ १−(तुभ्य) तुभ्यम् (इत्) एव (इमा) इमानि (सवना) ऐश्वर्ययुक्तानि वस्तूनि (शूर) निर्भय मनुष्य (विश्वा) सर्वाणि (तुभ्यम्) (ब्रह्माणि) धनानि अन्नानि वा (वर्धना) उन्नतिकराणि (कृणोमि) करोमि (त्वम्) (नृभिः) नेतृभि पुरुषैः (हव्यः) ग्रहणीयः (विश्वधा) सर्वप्रकारेण (असि) ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top