अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 76/ मन्त्र 4
कदु॑ द्यु॒म्नमि॑न्द्र॒ त्वाव॑तो॒ नॄन्कया॑ धि॒या क॑रसे॒ कन्न॒ आग॑न्। मि॒त्रो न स॒त्य उ॑रुगाय भृ॒त्या अन्ने॑ समस्य॒ यदस॑न्मनी॒षाः ॥
स्वर सहित पद पाठकत् । ऊं॒ इति॑ । द्यु॒म्नम् । इ॒न्द्र॒ । त्वाऽव॑त: । नॄन् । कया॑ । धि॒या। क॒र॒से॒ । कत् । न॒ । आ । अ॒र॒न् ॥ मि॒त्र: । न । स॒त्य: । उ॒रु॒ऽगा॒य॒ । भृ॒त्यै । अन्ने॑ । स॒म॒स्य॒ । यत् । अस॑न् । म॒नी॒षा ॥७६.४॥
स्वर रहित मन्त्र
कदु द्युम्नमिन्द्र त्वावतो नॄन्कया धिया करसे कन्न आगन्। मित्रो न सत्य उरुगाय भृत्या अन्ने समस्य यदसन्मनीषाः ॥
स्वर रहित पद पाठकत् । ऊं इति । द्युम्नम् । इन्द्र । त्वाऽवत: । नॄन् । कया । धिया। करसे । कत् । न । आ । अरन् ॥ मित्र: । न । सत्य: । उरुऽगाय । भृत्यै । अन्ने । समस्य । यत् । असन् । मनीषा ॥७६.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (त्वावतः) तुझ जैसे का (द्युम्नम्) यश (नॄन्) नेताओं में (कत् उ) किसको है, (कया धिया) किस बुद्धि के साथ (करसे) तू कर्तव्य करेगा, (उरुगाय) हे बहुत कीर्तिवाले ! (कत्) कैसे (नः) हमको (सत्यः) सच्चे (मित्रः न) मित्र के समान (भृत्यै) पालने के लिये (आ अगन्) तू प्राप्त हुआ है, (यत्) क्योंकि (अन्ने) अन्न में (समस्य) सबकी (मनीषाः) बुद्धियाँ (असन्) रहती हैं ॥४॥
भावार्थ
मनुष्य संसार में अत्यन्त कीर्ति पाकर अपना पुरुषार्थ सिद्ध करने के लिये प्रजा की रक्षा का विचार सच्चे हृदय से करता रहे ॥४॥
टिप्पणी
४−(कत्) कस्मै मनुष्याय (उ) एव (द्युम्नम्) अ० ६।३।३। द्योतमानं यशः (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (त्वावतः) त्वत्सदृशस्य (नॄन्) सप्तम्यर्थे द्वितीया। नेतृषु (कया) कीदृश्या (धिया) प्रज्ञया (करसे) करोतेर्लेट्। कर्तव्यं करिष्यसि (कत्) कथम् (नः) अस्मान् (आ अगन्) प्राप्तवानसि (मित्रः) सखा (न) यथा (सत्यः) सत्यशीलः (उरुगाय) अ० २।१२।१। बहुकीर्ते (भृत्यै) भरणाय। पोषणाय (अन्ने) (समस्य) सर्वस्य (यत्) यतः (असन्) लेट्। भवन्ति (मनीषाः) बुद्धयः ॥
विषय
प्रभु-जैसा बनना
पदार्थ
१. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! (कत् उ) = कब निश्चय से (द्युम्नम्) = ज्योति को आप (करसे) = करते हैं और कब कया-आनन्द को देनेवाली (धिया) = ज्ञानपूर्वक क्रियाओं से (नॄन) = हम मनुष्यों को (त्वावतः) = अपने-जैसा करते हैं। (कत्) = कब (न:) = हमें (आगन्) = आप प्राप्त होंगे। आप जैसा बनकर ही तो मैं आपको प्राप्त होने का अधिकारी होता हैं। २. हे (उरुगाय) = खूब ही स्तवन करने योग्य प्रभो! आप (मित्र: न) = मित्र के समान हैं। (सत्यः) = सत्यस्वरूप हैं। आप ही (भूत्यै) = हमारे भरणपोषण के लिए होते हैं। (यत्) = आपने यह भी अद्भुत व्यवस्था की है कि (समस्य) = सबकी (मनीषा:) = बुद्धियाँ (अन्ने) = अन्न में (असन्) हैं। जैसा अन्न कोई खाता है, वैसा ही उसकी बुद्धि बन जाती है। 'आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः'-आहार की शुद्धि पर ही अन्तःकरण की शुद्धि निर्भर करती है।
भावार्थ
बुद्धिपूर्वक अन्नों का प्रयोग करते हुए हम ज्ञानपूर्वक क्रियाओं से प्रभु-जैसा बनकर, प्रभु को प्राप्त करें।
भाषार्थ
(इन्द्र) हे परमेश्वर! (त्वावतः) आप को चाहनेवाले (नॄन्) उपासक-नेताओं को, आप की (द्युम्नम्) द्युति (कद् उ) कब (आगन्) प्राप्त होगी? तथा (कया धिया) किस विचार से आप (द्युम्नं करसे) निज उपासक में द्युति प्रकट करते हैं? (कत् नः) कब हम नवीन उपासकों को यह आपकी द्युति (आगन्) प्राप्त होगी?। (उरुगाय) हे महाकीर्त्तिवाले! आप (भृत्या) भरण-पोषण की दृष्टि से (सत्यः मित्रः न) सच्चे मित्र के सदृश हैं। हे परमेश्वर! (समस्य) सबके (अन्ने) अन्नमय मनों में (यद्) जब (मनीषाः) ऐसी मनोवाञ्छाएँ (असन्) पैदा हो जाएँगी, तब आप सबके भीतर निज द्युति प्रकट करेंगे, और सबके सच्चे मित्र हो जाएँगे।
टिप्पणी
[अन्ने=‘अन्नमयं हि सोम्य मनः’ (छान्दो০ उप০ ६.७.६)।]
विषय
आत्मा और राजा।
भावार्थ
हे (इन्द्र) आत्मन् ! (उ) बतला तू (कत्) कब (द्युम्नम्) अपने ऐश्वर्य का प्रदान (करसे) करता है ? और हे आत्मन ! (नॄन्) मनुष्यों को और (नॄन्) शरीर के नेता प्राणगण को तू (कया धिया) किस धारणशक्ति और किस बुद्धि या किस प्रकार की क्रिया से (त्वावतः) अपने जैसा (करसे) कर लेता है ? और बतला तू (कत्) कब (नः) हमें (आगन्) प्राप्त होता है ? तू (मित्रः) सबका स्नेही (सत्यः) स्वयं सत्यस्वरूप, समस्त सत्पदार्थों में विद्यमान, या (सः त्यः) वह तू (मित्रो न) सूर्य के समान स्वयंप्रकाश (उरुगायः) महान् स्तुति का पात्र है। (यत्) जब तेरी (मनीषाः) बुद्धियां (समस्य) समस्त प्राणों के (अन्ने) आहार या जीवन या अक्षय ऐश्वर्य के निमित्त (असन्) होती हैं तभी तू सबके (भृत्यै) भरण पोषण के भी समर्थ होता है। राजा के पक्ष में—हे राजन् ! तू (कद् उ द्युम्नम् करसे) कब ऐश्वर्य उत्पन्न करता है ? (कया धिया नॄन् त्वावतः करसे) और किस उपाय से तू नेताओं और प्रजा लोगों को अपने समान कर लेता है (कत् नः आगन्) हमें कब प्राप्त होता। है ये सब रहस्य ही हैं। तू (मित्र: न सत्यः) मित्र के समान सत्यवादी और सर्वस्नेही, न्यायकारी (उरुगायः) महान् कीर्त्ति वाला है। और (यत्) जब भी तेरी (मनीषाः) इच्छाएं (असन्) होती हैं तभी तू (अन्ने) अन्न द्वारा (समस्य भृत्या) सबके भरण पोषण करने में समर्थ होता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
वसुक ऐन्द्रो ऋषिः। इन्द्रो देवता। त्रिष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
Indra, when shall we have the light, power and honour of prosperity in life? What is that order of intelligence by which you transform humans to divine consciousness of your presence? When would you reveal your presence to us in direct experience? O lord adorable ever true as friend, when would our thoughts and actions be fruitful and win your favour of food, sustenance and stability for all mankind in peace and prosperity? Indra, when shall we have the light, power and honour of prosperity in life? What is that order of intelligence by which you transform humans to divine consciousness of your presence? When would you reveal your presence to us in direct experience? O lord adorable ever true as friend, when would our thoughts and actions be fruitful and win your favour of food, sustenance and stability for all mankind in peace and prosperity?
Translation
O Almighty God, when will you give your splendour (to us) by what procedure and act you make the men desirous of you or like you ? When will you come to us ? You are as true as sun and you are highly praised, When your wisdom tend towards the material cause (Anna) of the collective cosmic order you work out with the protective forces.
Translation
O Almighty God, when will you give your splendor (to us), by what procedure and act you make the men desirous of you or like you ? When will you come to us ? You are as true as sun and you are highly praised, When your wisdom tend towards the material cause (Anna) of the collective cosmic order you work out with the protective forces.
Translation
O Adorable Lord: of fortunes, when wilt Thou shower Thy riches? With what sort of intelligence or act or sustaining energy dost Thou turn people like Thyself (i.e., raise them to be Sachchidanand in the sate of salvation) when will Thou be achieved by us? Steadfast like a friend, Worthy of High praise, the controlling powers of the self-same Thee rightly remain the nourishing and developing ones in the eatables of all animals.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(कत्) कस्मै मनुष्याय (उ) एव (द्युम्नम्) अ० ६।३।३। द्योतमानं यशः (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् राजन् (त्वावतः) त्वत्सदृशस्य (नॄन्) सप्तम्यर्थे द्वितीया। नेतृषु (कया) कीदृश्या (धिया) प्रज्ञया (करसे) करोतेर्लेट्। कर्तव्यं करिष्यसि (कत्) कथम् (नः) अस्मान् (आ अगन्) प्राप्तवानसि (मित्रः) सखा (न) यथा (सत्यः) सत्यशीलः (उरुगाय) अ० २।१२।१। बहुकीर्ते (भृत्यै) भरणाय। पोषणाय (अन्ने) (समस्य) सर्वस्य (यत्) यतः (असन्) लेट्। भवन्ति (मनीषाः) बुद्धयः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
রাজকর্তব্যোপদেশঃ
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে ইন্দ্র ! [পরম ঐশ্বর্যযুক্ত রাজন্] (ত্বাবতঃ) তোমার সদৃশ (দ্যুম্নম্) যশ (নৄন্) শাসকদের মধ্যে (কৎ উ) কার আছে? (কয়া ধিয়া) কিরূপ বুদ্ধির সহিত (করসে) তুমি তোমার কর্তব্য পালন করবে? (উরুগায়) হে বহু কীর্তিমান ! (কৎ) কি উপায়ে (নঃ) আমাদের (সত্যঃ) সত্য (মিত্রঃ ন) মিত্রের ন্যায় (ভৃত্যৈ) ভরণ-পোষণের জন্য (আ অগন্) তুমি প্রাপ্ত হয়েছো, (যৎ) কেননা (অন্নে) অন্নে (সমস্য) সকলের (মনীষাঃ) বুদ্ধি (অসন্) বিদ্যমান থাকে ॥৪॥
भावार्थ
মনুষ্য সংসারে অত্যন্ত কীর্তি প্রাপ্ত হয়ে নিজ পুরুষার্থ সিদ্ধ করার জন্য প্রজাদের রক্ষা করার বিচার উৎকৃষ্ট হৃদয়ে করে ॥৪॥
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে পরমেশ্বর! (ত্বাবতঃ) আপনাকে প্রাপ্তির অভিলাষী (নৄন্) উপাসক-নেতাদের, আপনার (দ্যুম্নম্) দ্যুতি (কদ্ উ) কখন (আগন্) প্রাপ্ত হবে? তথা (কয়া ধিয়া) কোন বিচারে আপনি (দ্যুম্নং করসে) নিজ উপাসকের মধ্যে দ্যুতি প্রকট করেন? (কৎ নঃ) কখন আমাদের [নবীন উপাসকদের] আপনার দ্যুতি (আগন্) প্রাপ্ত হবে?। (উরুগায়) হে মহাকীর্ত্তিমান! আপনি (ভৃত্যা) ভরণ-পোষণের দৃষ্টিতে (সত্যঃ মিত্রঃ ন) বাস্তবিক মিত্রের সদৃশ। হে পরমেশ্বর! (সমস্য) সকলের (অন্নে) অন্নময় মনের মধ্যে (যদ্) যখন (মনীষাঃ) এমন মনোবাঞ্ছা (অসন্) উৎপন্ন হবে, তখন আপনি সকলের মধ্যে নিজ দ্যুতি প্রকট করবেন, এবং সকলের মিত্র হবেন।
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