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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 8 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 1
    ऋषिः - भरद्वाजः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-८
    82

    ए॒वा पा॑हि प्र॒त्नथा॒ मन्द॑तु त्वा श्रु॒धि ब्रह्म॑ वावृ॒धस्वो॒त गी॒र्भिः। आ॒विः सूर्यं॑ कृणु॒हि पी॑पि॒हीषो॑ ज॒हि शत्रूँ॑र॒भि गा इ॑न्द्र तृन्धि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ए॒व । पा॒हि॒ । प्र॒त्नऽथा॑ । मन्द॑तु । त्वा॒ । श्रुधि॑ । ब्रह्म॑ । व॒वृ॒धस्व॒ । उ॒त । गी॒ऽभि: ॥ आ॒वि: । सूर्य॑म् । कृ॒णु॒हि ।पी॒पि॒हि । इष॑: । ज॒हि । शत्रू॑न् । अ॒भि । गा: । इ॒न्द्र॒ । तृ॒न्द्धि॒ ॥८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृधस्वोत गीर्भिः। आविः सूर्यं कृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रूँरभि गा इन्द्र तृन्धि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    एव । पाहि । प्रत्नऽथा । मन्दतु । त्वा । श्रुधि । ब्रह्म । ववृधस्व । उत । गीऽभि: ॥ आवि: । सूर्यम् । कृणुहि ।पीपिहि । इष: । जहि । शत्रून् । अभि । गा: । इन्द्र । तृन्द्धि ॥८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 8; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (2)

    विषय

    मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (इन्द्रः) हे इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] (प्रत्नया) पहिले के समान (एव) ही [हमारी] (पाहि) रक्षा कर, (ब्रह्म) ईश्वर वा वेद (त्वा) तुझे (मन्दतु) हर्षित करे, [उसे] (श्रुधि) सुन (उत) और (गीर्भिः) वेदवाणियों से (वावृधस्व) बढ़। (सूर्यम्) सूर्य [सूर्यसमान विद्याप्रकाश] को (आविः कृणु) प्रकट कर, (इषः) अन्नों को (पीपिहि) प्राप्त हो, (शत्रून्) शत्रुओं को (जहि) मार और [उसकी] (गाः) वाणियों को (अभि) सर्वथा (तृन्धि) मिटा दे ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य ईश्वर और वेद में श्रद्धा करके विद्या और पुरुषार्थ द्वारा अन्न आदि से परिपूर्ण होकर शत्रुओं का नाश कर उनकी कुमर्यादाओं को हटावे ॥१॥

    टिप्पणी

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है-६।१७।३ ॥ १−(एव) अवधारणे (पाहि) रक्ष, अस्मान् (प्रत्नथा) प्रत्नपूर्वविश्वेमात्थाल् छन्दसि। पा० ।३।१११। इवार्थे थाल्प्रत्ययः। पूर्वं यथा (मन्दतु) आमोदयतु। हर्षयतु (त्वा) त्वाम् (श्रुधि) शृणु (ब्रह्म) परमेश्वरो वेदो वा (वावृधस्व) शपः श्लुः। वर्धस्व (उत) अपि च (गीर्भिः) वेदवाणीभिः (आविः) प्राकट्ये (सूर्यम्) सूर्यवद् विद्याप्रकाशम् (कृणुहि) कुरु (पीपिहि) पि गतौ-शपः श्लुः। तुजादित्वादभ्यासस्य दीर्घश्च। प्राप्नुहि (इषः) अन्नानि (जहि) नाशय (शत्रून्) (अभि) सर्वथा (गाः) शत्रूणां वाचः (इन्द्रः) हे परमैश्वर्यवन् पुरुष (तृन्धि) उतृदिर् हिंसानादरयोः। हिन्धि। नाशय ॥

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    विषय

    ज्ञानसूर्य का आविर्भाव

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! (प्रत्नथा एव) = सदा की भौति ही आप (पाहि) = हमारा रक्षण कीजिए, अथवा हमारे शरीर में सोम का रक्षण कीजिए। (त्वा मन्दतु) = यह उपासक आपका स्तवन करे। आप ब्रह्म उससे की जानेवाली स्तुतियों को (श्रुधि) = सुनिए, (उत) = और (गीर्भि:) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (वावृधस्व) = उसके अन्दर खूब ही बढ़िए, अर्थात् वह उपासक ज्ञान-प्राप्ति में लगा हुआ, अधिकाधिक आपके प्रकाश को हृदय में देखे। २. हे प्रभो! आप (सूर्यम्) = ज्ञान के सूर्य को उसके मस्तिष्करूप गगन में (आविः कृणुहि) = प्रकट कीजिए। (इषः पीपिहि) = प्रेरणाओं को बढ़ाइए. अर्थात् यह उपासक सदा आपकी प्रेरणा के अनुसार कार्यों को करनेवाला हो। (शत्रून् पीपिहि) = इस उपासक के वासनारूप शत्रुओं को आप विनष्ट कीजिए तथा (गा:) = इन्द्रियों को (अभितृन्धि) = [to set free] बासनाओं के आवरण से मुक्त कीजिए।

    भावार्थ

    हम प्रभु-स्तवन करें। ज्ञान-प्राप्ति में लगकर प्रभु के प्रकाश को अपने में अधिकाधिक देखने का प्रयत्न करे। प्रभु-कृपा से हमारा ज्ञान बढ़े। हम हृदयों में प्रभु-प्रेरणा को सुनें, वासनारूप शत्रुओं को विनष्ट करें और दीस इन्द्रियोंवाले बनें।

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    इंग्लिश (2)

    Subject

    Indr a Devata

    Meaning

    Thus protect and promote life and humanity as ever before, and let the adventure give you the pride of pleasure. Listen to the Veda, protect the Word of knowledge, and be exalted by our songs of celebration. Uncover the light of the sun, enjoy food and drink, destroy the hostilities, release the speech of humanity to freedom, and unshackle the lands from bondage into liberty.

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    Translation

    O Almigty God, you protect us as previously, this world pleases you, you hear of my prayers and you strengthen us through our supplication. You manifest the sun, preserve the knowledge, dispel away our foes the aversion, passion etc. and directing us towards the rays of spiritual wisdom destroy them.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    यह मन्त्र ऋग्वेद में है-६।१७।३ ॥ १−(एव) अवधारणे (पाहि) रक्ष, अस्मान् (प्रत्नथा) प्रत्नपूर्वविश्वेमात्थाल् छन्दसि। पा० ।३।१११। इवार्थे थाल्प्रत्ययः। पूर्वं यथा (मन्दतु) आमोदयतु। हर्षयतु (त्वा) त्वाम् (श्रुधि) शृणु (ब्रह्म) परमेश्वरो वेदो वा (वावृधस्व) शपः श्लुः। वर्धस्व (उत) अपि च (गीर्भिः) वेदवाणीभिः (आविः) प्राकट्ये (सूर्यम्) सूर्यवद् विद्याप्रकाशम् (कृणुहि) कुरु (पीपिहि) पि गतौ-शपः श्लुः। तुजादित्वादभ्यासस्य दीर्घश्च। प्राप्नुहि (इषः) अन्नानि (जहि) नाशय (शत्रून्) (अभि) सर्वथा (गाः) शत्रूणां वाचः (इन्द्रः) हे परमैश्वर्यवन् पुरुष (तृन्धि) उतृदिर् हिंसानादरयोः। हिन्धि। नाशय ॥

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