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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 91 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 91/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अयास्यः देवता - बृहस्पतिः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - सूक्त-९१
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    ऋ॒तं शंस॑न्त ऋ॒जु दीध्या॑ना दि॒वस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्य वी॒राः। विप्रं॑ प॒दमङ्गि॑रसो॒ दधा॑ना य॒ज्ञस्य॒ धाम॑ प्रथ॒मं म॑नन्त ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ऋ॒तम् । शंस॑न्त: । ऋ॒जु । दीध्या॑ना: । दि॒व: । पु॒त्रास॑: । असु॑रस्य । वी॒रा: ॥ विप्र॑म् । पद॑म् । अङ्गि॑रस: । दधा॑ना: । य॒ज्ञस्य॑ । धाम॑ । प्रथ॒मम् । म॒न॒न्त॒ ॥९१.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ऋतं शंसन्त ऋजु दीध्याना दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः। विप्रं पदमङ्गिरसो दधाना यज्ञस्य धाम प्रथमं मनन्त ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ऋतम् । शंसन्त: । ऋजु । दीध्याना: । दिव: । पुत्रास: । असुरस्य । वीरा: ॥ विप्रम् । पदम् । अङ्गिरस: । दधाना: । यज्ञस्य । धाम । प्रथमम् । मनन्त ॥९१.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 91; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    परमात्मा के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (ऋतम्) सत्य ज्ञान की (शंसन्तः) स्तुति करते हुए, (ऋजु) ठीक-ठीक (दीध्यानाः) ध्यान करते हुए, (दिवः) विजय चाहनेवाले (असुरस्य) बुद्धिमान् पुरुष को (वीराः) वीर (पुत्रासः) पुत्र (विप्रम्) विविध प्रकार पूर्ण (पदम्) पद [पाने योग्य वस्तु] को (दधानाः) धारण करते हुए (अङ्गिरसः) ज्ञानी ऋषियों ने (यज्ञस्य) पूजनीय व्यवहार के (प्रथमम्) मुख्य (धाम) स्थान [परब्रह्म] को (मनन्त) पूजा है ॥२॥

    भावार्थ

    सत्यग्राही ऋषि महात्मा लोग माता-पिता आदि विद्वानों से उत्तम शिक्षा पाकर परब्रह्म परमात्मा के ज्ञान में लवलीन होकर आत्मा की उन्नति करते हैं ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(ऋतम्) सत्यज्ञानम् (शंसन्तः) स्तुवन्तः (ऋजु) सरलम्। यथार्थम् (दीध्यानाः) ध्यै चिन्तायाम्-कानच्। तुजादीनां दीर्घोऽभ्यासस्य। पा० ६।१।७। इति दीर्घः। ध्यायन्तः (दिवः) विजिगीषोः (पुत्रासः) पुत्राः (असुरस्य) प्रज्ञायुक्तस्य (वीराः) विक्रान्ताः (विप्रम्) विविधपूरकम् (पदम्) प्रापणीयं वस्तु (अङ्गिरसः) ज्ञानिनः। ऋषयः (दधानाः) धारयन्तः (यज्ञस्य) पूजनीयव्यवहारस्य (धाम) धारकं स्थानम् (प्रथमम्) मुख्यम् (मनन्त) मन्यतेरर्चतिकर्मा-निघ० १।४। अमनन्त। अस्तुवन्त ॥

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    विषय

    असुरस्य वीराः [प्रभु के पुत्र]

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र के अनुसार तुरीयावस्था की ओर चलनेवाले लोग (ऋतं शंसन्त:) = सदा ऋत का ही शंसन करते है-इनके जीवन से अन्त का उच्चारण नहीं होता। (ऋजु दीध्याना:) = ये सदा सरलता से कल्याण का ही ध्यान करनेवाले होते हैं-कभी किसी के अमंगल का विचार नहीं करते। (दिव:-पुत्रासः) = ज्ञान के द्वारा ये अपने जीवन को पवित्र बनाते हैं और (आधि) = व्याधियों से इसका रक्षण करते है [पुनाति त्रायते]। (असुरस्य वीरा:) = ये उस [असून राति] प्राणशक्ति को देनेवाले प्रभु के वीर सन्तान बनते हैं। प्रभु से शक्ति को प्राप्त करके सब बुराइयों को विनष्ट करनेवाले होते हैं। २. (अंगिरस:) = अंग-प्रत्यंग में रसवाले ये वीर पुरुष (विप्रं परम्) = विशेषरूप से अपना पूरण करनेवाले [वि-प्रा] सर्वोच्च स्थान को (दधाना:) = धारण करने के हेतु से (यज्ञस्य) = उस यज्ञरूप प्रभु के (प्रथमं धाम) = सर्वोत्कृष्ट तेज का मनन्त-मनन करते हैं। प्रभु के तेज को अपना लक्ष्य बनाकर ये भी अपने जीवन को यज्ञमय बनाते हैं और उन्नति को प्राप्त करते हुए विप्र पद' को धारण करनेवाले बनते हैं।

    भावार्थ

    ऋत का शंसन करते हुए और प्रभु के तेज का स्मरण करते हुए हम उन्नत होने के लिए यत्नशील हों। ऊपर-और-ऊपर उठते हुए हम 'शूद्र से वैश्य', 'वैश्य से क्षत्रिय' व 'क्षत्रिय-पद से विप्र-पद' को प्राप्त करें।

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    भाषार्थ

    (दिवः) प्रकाशमान, तथा (असुरस्य) प्रज्ञानवान् परमेश्वर के (अङ्गिरसः) प्राणाभ्यासी (वीराः पुत्रासः) धर्मवीर उपासक-पुत्र—(ऋतम्) सत्य और (ऋजु) सरल वेदज्ञान का (शंसन्तः) प्रकथन करते हुए, (दीध्यानाः) समाधि में मग्न होकर (पदं विप्रम्) प्रापणीय मेधावी पद को (दधानाः) अपनी-अपनी आत्माओं में धारण करते हुए, (यज्ञस्य) उपासना-यज्ञ की (प्रथमं धाम) सर्वोत्कृष्ट ज्योति अर्थात् परमेश्वर का (मनन्त) मनन करते हैं।

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    विषय

    विद्वन्, राजा ईश्वर।

    भावार्थ

    (असुरस्य) ‘असु’ समस्त संसार के प्रेरक बल में रमण करने वाले (दिवः) तेजोमय, सूर्य के समान, तेजस्वी, परमेश्वर के (पुत्रासः) मानो पुत्र के सम्मान उसी से उत्पन्न (वीराः) वीर्यवान् महान् सामर्थ्यवान् विद्वान् लोग (ऋतम्) उस सत्य ज्ञान का (शंसन्तः) उपदेश करते हुए, उसी की स्तुति करते हुए (ऋजु) नित्य कल्यमाणमय स्वरूप का (दीध्यानाः) ध्यान करते हुए और स्वयं (विप्रम्) विविध ज्ञानों से पूर्ण (पदम्) ज्ञानगम्य, प्राप्तव्य परमपद को (दधानाः) धारण करते हुए उसका अभ्यास करते हुए (अङ्गिरसः) अग्नि के अङ्गिरों के समान तेजस्वी ज्ञानी विद्वान पुरुष (यज्ञसा) उस सब में पूजनीय उपास्य परमेश्वर के (धाम) धारण सामर्थ्य एवं तेज को (प्रथमं) सर्वश्रेष्ठ रूप से (मनन्त) मनन करते या उसका अभ्यास करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अयास्य आङ्गिरस ऋषिः। बृहस्पति देवता। त्रिष्टुभः। द्वादशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Brhaspati Devata

    Meaning

    Speaking the Word of eternal knowledge, meditating on the natural, eternal spirit of omniscience, the Rshis, children of light, brave offsprings of divine virility, self-disciplined souls established in the position of vibrant sages among humanity, realise in direct experience the first and original presence of the adorable lord Supreme. Speaking the Word of eternal knowledge, meditating on the natural, eternal spirit of omniscience, the Rshis, children of light, brave offsprings of divine virility, self-disciplined souls established in the position of vibrant sages among humanity, realise in direct experience the first and original presence of the adorable lord Supreme.

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    Translation

    The men of austerity and compitent in the sience and procedures of Yajna praising the truth, adopting the easy way of life, possessing dexterity and bold in performing the Yajna and occupying the rank of most wise one give first place to practice of Yajna.

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    Translation

    The men of austerity and competent in the science and procedures of Yajna praising the truth, adopting the easy way of life, possessing dexterity and bold in performing the Yajna and occupying the rank of most wise one give first place to practice of Yajna.

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    Translation

    The Mighty God or the yogi of high spiritual power, tearing off the bonds of stony walls of black actions, as if through the friendly and the spiritual-knowledge-preaching, perfect yogis, throws open the flood gates of spiritual light. Thereafter the learned person heartily praises Him and loudly sings the praises.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(ऋतम्) सत्यज्ञानम् (शंसन्तः) स्तुवन्तः (ऋजु) सरलम्। यथार्थम् (दीध्यानाः) ध्यै चिन्तायाम्-कानच्। तुजादीनां दीर्घोऽभ्यासस्य। पा० ६।१।७। इति दीर्घः। ध्यायन्तः (दिवः) विजिगीषोः (पुत्रासः) पुत्राः (असुरस्य) प्रज्ञायुक्तस्य (वीराः) विक्रान्ताः (विप्रम्) विविधपूरकम् (पदम्) प्रापणीयं वस्तु (अङ्गिरसः) ज्ञानिनः। ऋषयः (दधानाः) धारयन्तः (यज्ञस्य) पूजनीयव्यवहारस्य (धाम) धारकं स्थानम् (प्रथमम्) मुख्यम् (मनन्त) मन्यतेरर्चतिकर्मा-निघ० १।४। अमनन्त। अस्तुवन्त ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    পরমাত্মগুণোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (ঋতম্) সত্যজ্ঞান এর (শংসন্তঃ) স্তুতি পূর্বক (ঋজু) যথার্থ (দীধ্যানাঃ) ধ্যানপূর্বক (দিবঃ) বিজয় অভিলাষী (অসুরস্য) বুদ্ধিমান্ পুরুষকে (বীরাঃ) বীর (পুত্রাসঃ) পুত্র, (বিপ্রম্) বিবিধ প্রকারে পূর্ণ (পদম্) পদকে [প্রাপ্তি যোগ্য বস্তুকে] (দধানাঃ) ধারণপূর্বক (অঙ্গিরসঃ) জ্ঞানী ঋষিগণ (যজ্ঞস্য) পূজনীয় ব্যবহারের (প্রথমম্) মুখ্য (ধাম) স্থানকে [পরব্রহ্মকে] (মনন্ত) পূজা করেছে ॥২॥

    भावार्थ

    সত্যগ্রাহী ঋষি মহাত্মাগণ মাতা-পিতা আদি বিদ্বানদের দ্বারা উত্তম শিক্ষা প্রাপ্ত করে পরব্রহ্ম পরমাত্মার জ্ঞানে লীন হয়ে আত্মার উন্নতি করে ॥২॥

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    भाषार्थ

    (দিবঃ) প্রকাশমান, তথা (অসুরস্য) প্রজ্ঞানবান্ পরমেশ্বরের (অঙ্গিরসঃ) প্রাণাভ্যাসী (বীরাঃ পুত্রাসঃ) ধর্মবীর উপাসক-পুত্র—(ঋতম্) সত্য এবং (ঋজু) সরল বেদজ্ঞানের (শংসন্তঃ) প্রকথন/প্রশংসা/স্তুতি করে, (দীধ্যানাঃ) সমাধিতে মগ্ন হয়ে (পদং বিপ্রম্) প্রাপণীয় মেধাবী পদ (দধানাঃ) নিজ-নিজ আত্মায় ধারণ করে, (যজ্ঞস্য) উপাসনা-যজ্ঞের (প্রথমং ধাম) সর্বোৎকৃষ্ট জ্যোতি অর্থাৎ পরমেশ্বরের (মনন্ত) মনন করে।

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